जाति में ही रहना पर जातिवाद को न!

पंकज कुमार पाठक प्रभात खबर, रांची हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और.. यह मुहावरा किन परिस्थितियों में गढ़ा गया होगा, यह तो नहीं कह सकता, लेकिन आज इसका मतलब सब जानते हैं. हम भारतीयों के चरित्र-चित्रण के लिए इससे बढ़िया मुहावरा शायद ही मिले. जो भी हो, इसके लिए हाथी धन्यवाद का […]
पंकज कुमार पाठक
प्रभात खबर, रांची
हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और.. यह मुहावरा किन परिस्थितियों में गढ़ा गया होगा, यह तो नहीं कह सकता, लेकिन आज इसका मतलब सब जानते हैं. हम भारतीयों के चरित्र-चित्रण के लिए इससे बढ़िया मुहावरा शायद ही मिले. जो भी हो, इसके लिए हाथी धन्यवाद का हकदार तो है ही. इसी तर्ज पर मैंने भी एक मुहावरा बनाया है- जाति की बात करने के लिए और, मानने के लिए और. इस मुहावरे को पहचान मिलनी और मुङो इस तरह का ‘मैगी’ टाइप (जिसे मैं दो मिनट में बना सकता हूं) चमत्कार करने के लिए ‘भारत रत्न’ मिलना अभी बाकी है.
मान लेते हैं कि हाथीवाला मुहावरा, दिखने और करने में फर्क के आधार पर बना होगा, लेकिन मेरेवाले मुहावरे का क्या आधार है? तो यह किस्सा सुनिए.. हाल ही में, मेरे एक मित्र कुछ दिनों पहले एक काम से सरकारी दफ्तर गये. दफ्तर के बाबू आदतन देर से पहुंचे. दूसरे शब्दों में कहें, तो भारतीय समयानुसार पहुंच कर उन्होंने अपने कार्यालय पर उपकार किया. चपरासी ने आधे घंटे तक उन्हें चाय-पानी कराया, फिर बाहर निकला और मित्र की तरफ इशारा करते हुए बोला- ‘शर्माजी, आपको बाबू बुला रहे हैं.’
मिलने आये लोगों की सूची चपरासी ने अपने पास पहले से लिख रखी थी. सरकारी कार्यालय में अपने उपनाम के साथ ‘जी’ सुन उनका सीना भी छप्पन इंच का हो गया. वह फौरन अंदर पहुंचे. नमस्कार किया. कुरसी तोड़ रहे बाबू ने उनसे कहा- आइए शर्माजी, बैठिए. फिर बाबू ने बातों-बातों में मित्र से उनका पूरा बायोडाटा पूछ लिया. जैसे- घर कहां है? पिताजी क्या करते हैं? कितने भाई-बहन हैं आप? बाबू सवालों के तीर उन पर छोड़ता रहा और वह मजबूरीवश उन तीरों को ङोलते गये.
बाद में उन्हें पूरा माजरा समझ में आया. मित्र ने बताया कि ‘गनीमत है कि मैं शादीशुदा निकला, नहीं तो यकीन मानिए, वह शर्मा उपनामधारी बाबू अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में देने के बाद ही मुङो अपने दफ्तर से जाने देता.’ पेश से बिजली इंजीनियर, मेरे मित्र ने बताया कि जो भी हो, अगर मेरा उपनाम ‘शर्मा’ नहीं होता, तो मेरा छोटा-सा काम महीनों तक सरकारी टेबलों पर घूमता ही रहता. दरअसल, ये जातिवाद, गांववाला, परिवारवाला, सगावाला, चचेरा, ममेरा फुफेरा.. की चाहत हमारे खून में ही हैं.
हम जातिवाद के खिलाफ चाहे जितना भाषण करें, पर अपने बच्चों की शादी जाति-बिरादरी में ही करना पसंद करते हैं. अपने आसपास हम अपनी ही जातिवालों या परिवारवालों को बैठाये रखना चाहते हैं. एक जगह (खास कर सरकारी) निकलती नहीं है कि हम अपनी पसंद के आदमी को लाने की कोशिश में एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं. (पसंदीदा होने के कई कारण हैं, लेकिन सभी किसी न किसी रूप से जातिवाद के पर्यायवाची शब्द हैं). योग्यता गयी तेल लेने. यह मानस कभी देश से जातिवाद खत्म होने देगा, कहना मुश्किल है.
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