आधुनिकता काल की गति है

Updated at : 06 Jun 2014 5:38 AM (IST)
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आधुनिकता काल की गति है

-हरिवंश- व्यवस्था या समाज में परिवर्तन संभव है? क्या मनुष्य बदलता है? क्या सत्ता परिवर्तन से समाज परिवर्तन होता है? संस्कार, सोच, काम करने के तौर-तरीके, आदत, आचरण, ये सब चीजें कैसे बदलती हैं? पढ़िए जीवन, समाज, राजनीति से जुड़े ऐसे मूल सवालों पर बौद्ध दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनीतिक चिंतक कृष्णनाथ जी से हरिवंश की […]

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-हरिवंश-

व्यवस्था या समाज में परिवर्तन संभव है? क्या मनुष्य बदलता है? क्या सत्ता परिवर्तन से समाज परिवर्तन होता है? संस्कार, सोच, काम करने के तौर-तरीके, आदत, आचरण, ये सब चीजें कैसे बदलती हैं? पढ़िए जीवन, समाज, राजनीति से जुड़े ऐसे मूल सवालों पर बौद्ध दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनीतिक चिंतक कृष्णनाथ जी से हरिवंश की लंबी बातचीत. यह बातचीत फरवरी, 2014 में सारनाथ (बनारस) में उनके आवास पर हुई थी.

-देश, समाज की अद्भुत पुण्य प्रतिभाओं के साथ आपका बचपन-युवा दिन गुजरे हैं. संघर्ष, अध्यापन, निरंतर यात्राएं, फिर अंदर की खोज (बौद्ध धर्म के आलोक में), इतनी विविधता, समृद्ध अनुभवों के बीच जीवन को आप कैसे देखते हैं? क्या है, जीवन? क्यों है, जीवन? जीवन का मर्म क्या है? यह सोद्देश्य है या निरुद्देश्य?

यह तो बहुत गंभीर प्रश्न है. यह एक तरह की बहुत गहन और गंभीर यात्रा-खोज है. इसे मैं कैसे कहूं? जीवन तो तभी है, जब प्राण है. जब एक सांस बाहर जाये और लौटे नहीं, तो फिर वे सब शरीर के अवयव हैं. देह है, हाथ है, पैर है, आंख, कान, नाक है, ज्ञानेंद्रियां-कर्मेद्रियां सब हैं. लेकिन अगर वो प्राण निकल गया, तो वो सब मिट्टी हो जाता है. निर्जीव हो जाता है. जीवन, प्राण का अंत है. अगर मोटे तौर पर कहें, तो प्राण एक प्रकार से वायु है. वायु, प्राण है और प्राण, वायु है. प्राण ही जीवन है और जीवन ही प्राण है. आपने जो यह सब गिनाया, यह सब प्राण के आयाम हैं. प्राणायाम एक बड़ा रूढ़ अर्थ हो गया है. एक आश्रम में बैठ कर सांसों का आना-जाना और देखना. किंतु अगर इसकी गहराई में जायें, तो जो संपूर्ण जीवन है, वह प्राण के ही आयाम हैं. पहलू हैं. पक्ष हैं. इनमें अपनी-अपनी रुचि, गति, मति के हिसाब से आना-जाना लगा रहता है. ऐसा ही जीवन हमें मिला है. जिन दिनों की आपने चर्चा की, सही में वो पुण्य प्रसंग हैं. मेरे ही जीवन के नहीं, राष्ट्रीय जीवन के भी. एक अर्थ में जो विशुद्ध जीवन है, उसके वो पुण्य प्रसंग हैं, अब उनकी स्मृति ही शेष है. स्मृति की ही सुगंध है. बाकी तो आज जैसी परिस्थिति है, उसमें हर तरफ वो सुगंध, पाप से बद्ध होकर दुर्गंध में बदल गयी है. लेकिन वो सुगंध-स्मृति भूलती भी नहीं है. अब इस जीवन का कोई उद्देश्य है या यह सिर्फ एक निरुद्देश्य आना-जाना है या भटकना है. एक चक्र है, जिसमें या तो डूब जाना है या निकल जाना है या फिर लौट जाना है. यह चक्र अपनी ही गति से चलता रहता है. यह क्या है, कैसे है, इसको ठीक तरह से कह पाना सचमुच मुश्किल है.

-आप देश के उन कुछेक लोगों में से हैं, जिन्होंने आधुनिकता पर बहुत गहराई से विचार-चिंतन किया. आज बचपन से ही वजर्नाहीन जीवन हो रहा है. समाज का एक हिस्सा सब कुछ तुरंत पाने की इच्छा रखता है. क्षणभोगी जीवन. सब एक ही क्षण में हो जाये, क्षण में ही मुक्ति! क्या यही आधुनिकता है?

आधुनिकता भी काल का एक आयाम है. उस अर्थ में प्राचीन से निकल कर आधुनिक काल में प्रवेश, यह एक गति है. इस गति से कोई बच नहीं सकता. यह काल की गति है. काल, सबका कारण है. सबकी संख्या करता है. इस अर्थ में तो आधुनिकता एक तथ्य है. अगर सत्य न भी हो, तो वह है. यह फूंक मार कर उड़ा देने की चीज नहीं है. किंतु आजकल जो छाये हुए हैं, जिस पर आज अधिक जोर दिया जा रहा है कि सबकुछ अभी, यहीं है. जैसे अंग्रेजी का मुहावरा, हियर एंड नाउ (यहीं और अभी) है. सबकुछ इसी क्षण. जो न टलनेवाला वर्तमान है, उसी में जीना है. अतीत तो बीत चुका और भविष्य तो आनेवाला है. अभी तो है. इसलिए जीना तो वर्तमान में इसी क्षण में होता है. लेकिन यह क्षण कहीं आकाश से टपका हुआ नहीं है. मुझे तो आचार्य नरेंद्रदेव का एक वाक्य स्मरण होता है. वो नवसंस्कृति की व्याख्या करते हुए कहते थे कि अतीत, वर्तमान में विद्यमान रहता है और वर्तमान के गर्भ से भविष्य की उत्पत्ति होती है. तो ये त्रिकालिक गति है. इसमें से किसी को भी आप काट नहीं सकते. कभी-कभी तो स्मृति जो अभी-अभी है, उससे ज्यादा पकड़ लेती है. अपने किसी प्रिय का जो वियोग है, मृत्यु की स्मृति है, जब वो सामने आता है, तो सबकुछ जो सामने है उसमें मन नहीं रमता. उधर देखने की इच्छा नहीं होती. स्मरण से ही हम एक दूसरे को पहचानते हैं. अन्यथा मैं कहूं कि आप कौन हैं, आपको तो कहीं देखा था और आप सोचेंगे कि किससे मिलने चले आये? ये तो वो कृष्णनाथ नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं. स्मृति तो व्यक्ति की भी होती है और समूहों की होती है, समाज की होती है, राष्ट्र की होती है, जाति (कौम) की होती है. कभी-कभी तो जो है, उससे भी बड़ी हो जाती है. स्मृति से बड़ी है, आशा. भविष्य की आशा, भविष्य की कल्पना, भविष्य का सपना. वो सपना, जो कभी-कभी तृष्णा से भी प्रबल भविष्य की कल्पना-कामना में बदल जाता है. आशा, स्मृति से भी बलवान हो जाता है. अभी जो नहीं है, उसकी आकांक्षा ही आशा है. सत्य क्या है? सतोभाव: इति सत्यम् (जो सत्य है, वह तो बदल सकता है, लेकिन उसमें जो होने का भाव है, वो बना रहता है). जैसे कोई सुंदर चीज है, वह तो नष्ट हो जाती है, लेकिन उसका सौंदर्य बना रहता है. उड़ गयी फूलवा, रह गयी बास. फूल तो उड़ जाता है, लेकिन उसकी बास (सुगंध) रह जाती है. इस तरह जो होने का भाव है, जो सत्य है, वो सबसे बड़ा है. इस सत्य को जानने-महसूस करने की जरूरत है.

-भारतीय अध्यात्म को आज के संदर्भ में दुनिया के बीच आप कैसे आंकते-देखते हैं? भारतीय अध्यात्म जैसी कोई चीज है भी या नहीं?

अध्यात्म तो है. इसे मैं किसी राष्ट्रीय अहंकार की दृष्टि से नहीं कहता. आपने जिन यात्रओं का जिक्र किया, तो आपको स्मरण होगा उनमें मैंने एक बार पृथ्वी की परिक्रमा की है. उसे भी प्रकाशित कराया है. प्रकाशन में वह बात नहीं है, जो परिक्रमा में है. फिर भी एक कौम का कुछ खास मिजाज होता है. तो भारतीय जाति या कौम के मिजाज में अध्यात्म का चिंतन बैठा हुआ है. जैसे अपने को जानना. विभिन्न और खास कर प्राचीन संस्कृतियों में. मुझे सुकरात का स्मरण हो आता है, उन्होंने कहा था, अपने को जानो. खुद को जानने के लिए क्या-क्या उन्होंने नहीं झेला-किया? अंत में तो विष का प्याला पीकर उसी उम्र में जान दे दी. लेकिन यह अध्यात्म यानी अंदर, एक अंदर का लोक है, दूसरा बहिर्लोक है. वैसे इस विषय में बहुत नहीं सोचना चाहिए. यह शब्दों की मायालीला है. बाहर का प्रभाव अंदर पर या अंदर का प्रभाव बाहर पर, ये बराबर बना रहता है. लेकिन जो कुछ इस चमड़े के भीतर है और जो बाहर है, इन दोनों के बीच क्रिया-अंत:क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहती है. ये जो बाहर दिखता है, उतना ही जगत नहीं है. एक अंतर्लोक भी है. उसकी जो सुरंग है, वो आत्मसुरंग, वह देखने की चीज है. वह ध्यान करने का विषय है, मनन करने का विषय है, मंतव्य जानने का विषय है. इस तरह की चीजें जितनी भारत में हुईं, वैसा शायद ही संसार के किसी अन्य भूखंड में हुआ हो. मुझे तो ऐसा नहीं दिखा. मैंने अपनी सभी यात्राओं में गहराई में उतर कर, पैठ कर इस पर बात करने की कोशिश की और यह कोई मैं राष्ट्रीय अभिमान की दृष्टि से नहीं कह रहा हूं. उन सबने कहा कि यह सब आप हमसे क्यों पूछते हैं? यह सब तो दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट ही है. लेकिन इससे लगा कर ये जो उगते हुए सूर्य का देश, जापान, चीन, कोरिया. यहां से (भारत से) चीन, चीन से कोरिया, कोरिया से जापान. तिब्बत तो इसका बड़ा भारी भंडार था. यह सब फिर पश्चिम में गया. तो यह तो भारत की अपनी एक खासियत है, विशेषता है, और उसको कुछ ठीकरों (डॉलर) के लिए हमलोग अब बेचने पर उतर आये हैं. उसको भी हमने धंधा बना लिया है. इसे देख कर मुझे बड़ी आत्मग्लानि होती है. पूर्व जापानी मित्र कहते हैं कि हमलोग भारत को स्वर्ग से भी बड़ा मानते हैं. वहीं से हमको यह ज्ञान, प्रकाश या आलोक मिला और वहां आपलोग की क्या दशा हो गयी है? छोटी-छोटी चीजों के लिए आप हत्या तक कर सकते हैं. वो क्या है, ऐसी चीजों को तो हम कूड़े में फेंक देते हैं. उन सब चीजों के लिए और थोड़े-से चमड़े के स्पर्श के लिए क्या-क्या आपलोग करने पर उतारू हो गये हैं. उन्हें, इन चीजों का बहुत दुख होता है. तो ये तो आज के अध्यात्म की दशा है. किंतु इस दुर्दशा के कारण जो इसका गौरव है, जो इसकी महिमा है और जो इसका सौंदर्य है, सुगंध है, उसको भी भुलाया नहीं जा सकता.

-आप जिनके बड़े आत्मीय और सान्निध्य में रह चुके हैं, वह अच्युत पट्टवर्धन या अन्य जो सक्रिय राजनीति के शिखर पर थे, वहां से अध्यात्म में चले गये. समाजवादी रामनंदन मिश्र जी भी. महर्षि अरविंद के रास्ते भी वही थे. क्या आपको लगता है कि राजनीति समाज को, मनुष्य को नहीं बदल सकती. आपने दोनों क्षेत्रों को बहुत नजदीक से देखा है. आपकी निजी अनुभूति?

पहला नाम आपने अच्युत जी का लिया. इसलिए उनके बारे में बता रहा हूं. पृथ्वी पर उनकी अंतिम यात्रा में मुझे उनके साथ रहने का योगायोग हुआ. अपनी यात्रा में मुड़ कर देखते हुए वह महसूस करते थे कि राजनीति में ही उनके जीवन का सबसे सक्रिय भाग यानी युवाकाल बीता था. किंतु उन्हें ऐसा लगा कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो आवश्यक है, लेकिन वह काफी नहीं है. फिर उन्होंने सोचा कि जब यह काफी नहीं है, तब क्या हो सकता है? तत: किम् वाला प्रश्न उनके सामने था. फिर वह उस ओर मुड़े. रामनंदन जी तो काशी विद्यापीठ के ही शास्त्री थे. मेरे पिताजी और उनके बीच भी संपर्क था, जब वो समाजवादी थे. फिर अध्यात्म की ओर मुड़े गये थे. लेकिन मेरा और उनका (रामानंद मिश्र) निजी संपर्क नहीं रहा. आप उनके बारे में ज्यादा जान सकते हैं. कभी हम भी जानना चाहेंगे कि कैसे उनका लहरियासराय वगैरह का या उड़िया बाबा का वह सब कार्य है. अपने बारे में कहना-बताना कठिन है. ऐसा नहीं है कि मैं अपने बारे में सोचता नहीं हूं, इसमें थोड़ा अहंकार-अहंभाव को बढ़ावा मिलता है. यह प्रवाह है. इस प्रवाह में यह घटित होता है. इसका मैंने शुरू में जिक्र किया. इस प्रवाह में मैं क्या हूं? मैं क्या सोचता हूं, क्या देखता हूं, इसका बहुत ज्यादा महत्व नहीं है. लेकिन सहूलियत की दृष्टि से मुझे ऐसा लगा कि शुरू में यानी बचपन के दिनों में तो अंग्रेज हमारी छाती पर बैठे थे. आप लोगों का जो अंग्रेजी राज का अनुभव है, उसकी जो छवि है, आजकल लोग जैसा बताते हैं, उसमें तो बड़ी उदारता दिखती है, लेकिन वास्तव में तब भारतीयों को दूसरे दर्जे की हैसियत थी. ऊंचे-सींसियर भारतीय की भी. एक घोड़े के घसकटरे के नीचे, कैसे बड़े से बड़ा विद्धान चमड़े के रंग, शासन और सत्ता के कारण मरने को विवश था, उसको तो आपने नहीं देखा? मैंने तो वह भी देखा है. इसे मेरा दुर्योग कह सकते हैं. उस समय स्वतंत्रता की इच्छा-कामना-चेष्टा बहुत प्रबल थी. सबसे ऊपर थी. अन्य सभी चीजें छूट सकती हैं, लेकिन पराधीन को तो सपने में भी सुख नहीं है. यह दुख भी हमने झेला. जब इस पराधीन होने के दुख से बाहर निकले, तो एक क्षण के लिए, थोड़ा-सा लगा कि अब तो अंग्रेज नहीं है. लेकिन जो सत्ता-व्यवस्था अस्तित्व में आयी, उसमें शुरू के दिनों से ही यह लगने लगा कि इसमें वो बात नहीं है. वो चीज नहीं है, जिसका हम सपना देखते थे. तब हम लोगों ने उस व्यवस्था से नाता तोड़ा. अकेले नहीं पूरे समूह में उससे नाता तोड़ा. कांग्रेस की आजादी की लड़ाई का जो मंच था, उस पूरी परंपरा से नाता तोड़ा और अपनी पार्टी बनायी. इस तरह अपनी एक अलग कुटिया बना कर, अपनी नौका अलग दौड़ाने की कोशिश की. पहले एक समाजवादी युवक के नाते, फिर उसमें थोड़ा-बहुत समझने, लिखने और संपादन वगैरह क्रियाओं में, फिर बिहार के पलामू (अब झारखंड में) के संघर्षो में भाग लेकर. मैंने देखा कि इस नयी व्यवस्था में एक परिवार का पुश्तैनी अधिकार बनता जा रहा है. हालांकि उस परिवार से हमलोगों को कोई द्वेष नहीं था. हमारे युवा दिनों में बड़े प्रिय नेता थे, जवाहरलाल जी. कभी-कभी हमदोनों बिल्कुल आसपास बैठते थे. काशी विद्यापीठ में जन्म लेने के नाते मेरा यह सुयोग था. मैं यह भी देखता था कि मेरी खादी उनसे ज्यादा साफ-सुथरी चमकवाली होती थी. आजादी के पहलेवाला और बादवाला रूप, जब वो चूड़ीदार पैजामा और शेरवानी में रहते. गुलाब का बटन जेब में कैसे सजाया जाये, उसको खुद ही देखते. इस तरह का जब परिवर्तन आया और एक वंश से यह आगे बढ़ने लगा. बीच में थोड़े दिनों के लिए लालबहादुरजी का एक पुण्य प्रसंग हुआ. लेकिन फिर इंदिरा जी आ गयी. हमारा विरोध किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं था. लेकिन यह परंपरा, जिसमें एक वंश का राज हो, जनतांत्रिक प्रवृत्ति के विपरीत है. उन सभी परंपराओं के विपरीत है, जिसके सपने हमने देखे थे. इसलिए यथाशक्ति, यथामति से मैंने उसमें हिस्सा लिया. यह कहने में थोड़ा संकोच होता है. लेकिन नेहरूजी के काल में हम सफल नहीं हो सके. फिर जब इंदिराजी का जब शासन आया, तो हमारा इंदिरा हटाओ, देश बचाओ का एक नारा था. मंत्र जैसा. मैंने पुणे के राष्ट्रीय सम्मेलन से पहले राजनारायण जी से अलग, शांतिनायक के घर में खाना खाते समय कहा कि अब (71, 72, 73 में) इंदिरा हटाओ, देश बचाओ को हमको अपने केंद्र में रखना चाहिए. शुरू में उसमें हार हो गयी. इसके मुकाबले श्रीकांत जी ने दूसरा नारा गढ़ा कि वे कहते हैं इंदिरा हटाओ और इंदिरा जी कहती हैं, गरीबी हटाओ. आप ही चुनिये? इस तरह वह 1971 में जीत गयीं. इसके बाद हमारे मित्रों ने हमारी खिंचाई की और कहा कि कहां गया आपका इंदिरा हटाओ? उसने तो बाजी मार ली. गरीबी हटाओ चला दिया. इंदिरा हटाओ तो एक नकारात्मक नारा था. ‘गरीबी हटाओ’ कह कर वह जीत गयीं. वह बड़ी अच्छी महिला थीं. उनके साथ मैं काशी विद्यापीठ के समावर्तन संस्कार समारोह में था. इस आयोजन का मैं ही नेतृत्व कर रहा था, क्योंकि वहां अध्यापक था. इंदिरा जी को दीक्षांत भाषण देना था. मेरे ही पीछे चल कर वह आयीं. इससे पहले भी वह विद्यापीठ में आयी थीं, जब वह छोटी थीं. इसलिए उनके प्रति किसी भी तरह का दुर्व्यवहार नहीं है, लेकिन जो भ्रष्टाचार की या एक परिवार की सत्ता रूढ़ थी, हम उसके खिलाफ थे. फिर हमें लगा कि यह अकेले नहीं होगा, तब इसमें जयप्रकाश जी कूदे. उन्होंने आंदोलन शुरू किया. हालांकि शुरू तो गुजरात में लड़कों ने किया. जयप्रकाश जी ने बिहार में हिस्सा लेने का आह्वान किया. वे खुद जूझ गये, उस अवस्था में, तब जाके ‘77 में यह आंदोलन एक निष्कर्ष पर पहुंचा. ‘77 में जब इंदिरा जी का शासन खत्म हुआ और जनता पार्टी की मिलीजुली सरकार का एक क्रम शुरू हुआ, तब मैंने समझा कि यह एक समय है, जब इसमें से हट जाना चाहिए. क्योंकि सत्ता की राजनीति का तो अपना ही एक चक्र है. मैंने देखा की वह चक्र शुरू हो रहा था. फिर ‘77 में मैंने खुद को इससे अलग कर लिया और उधर मुड़ कर नहीं देखा. इस तरह इस यात्रा का एक नया मोड़, नया आयाम शुरू हुआ.

-आप शायद कुछ चुनिंदा एक-दो लोगों में से हैं, जिन्होंने कोलिशन पॉलिटिक्स (गंठबंधन राजनीति) के बारे में पहले कह दिया था. कई बार लगता है देश पीछे छूट गया है. इतने क्षेत्रीय सवाल, आइडेंटिटी की पॉलिटिक्स, निजी स्वार्थ दिखायी दे रहे हैं कि लगता है एजेंडे से देश हट रहा है, तो क्या हम पुन: कमजोर होने की स्थिति में तो नहीं बढ़ रहे है? कोलिशन पॉलिटिक्स देश को कहां ले जाती दिखायी दे रही है?

यह सही है कि यह जो साझा सरकारों का एक क्रम चला, उसको मैंने सिद्धांत और व्यवहार दोनों तरह से परखा. मुझे स्मरण है प्रो करुणाकरण, जो राजनीतिशास्त्र के देश के प्रसिद्ध ज्ञाता थे, ने शिमला के इंडियन इंस्टिट्यूट अॅाफ एडवांस स्टडीज में एक सात दिन का सेमिनार आयोजित किया. उन दिनों मैं जेल में था. उन्होंने मुझे जेल में निमंत्रण भिजवाया. मेरे इस क्षेत्र में काम को देखते हुए. उत्तर प्रदेश और बिहार में गंठबंधन की सरकारें बन गयी थीं. उनकी खींचातानी चल रही थी. उन्होंने मुझे वहां आने के लिए निमंत्रण दिया. (श्री कृष्णनाथ, राजनीतिक आंदोलन के कारण तब जेल में थे). कहा कि इसके लिए पैरोल पर छूट कर भी आप जरूर आये. फिर कुछ ऐसा योगायोग हुआ कि जस्टिस हिदायतुल्ला को यह समझ में नहीं आया कि मेरे जैसा प्राध्यापक, प्रमोद कुमार गुप्त जैसा कवि और चित्रकार, विजय नारायण जैसा एडवोकेट यहां जेल में क्यों है? राजनारायण जी हैं, मधुजी (मधु लिमये) जी हैं, वो तो ठीक हैं. वे राजनेता हैं. लेकिन मैं या मेरे जैसे लोग जेल में क्यों हैं? उन्होंने तत्काल हमें रिहा करने का संकेत दिया. हमारी रिहाई हो गयी. मैं छूट कर उस सेमिनार में गया. इसके पीछे तर्क ये था कि जो भारत देश है या एक अर्थ में पूरा विश्व, जिसे खास तौर से रवींद्रनाथ टैगोर कहते थे कि हम महामानवों के तौर पर महामनुष्यों की इतनी भीड़ वाले, इतने तरह के लोगों के सागर के किनारे हैं हम. वहीं हमारा देश है कि जहां कोई एक विचारधारा, कोई एक पंथ, कोई एक दृष्टि सबको बांध कर नहीं चल सकती. इसलिए जब आप आजादी की लड़ाईवाली कांग्रेस को देखेंगे, तो आपको नाना प्रकार की शक्लें, सूरतें, विचारधाराएं और वेशभूषाएं दिखेंगी. क्यों? क्योंकि जब तक ये एक जगह इकट्ठा नहीं होंगे, तब तक आप किसी बड़ी सत्ता को चुनौती नहीं दे सकेंगे. अंग्रेजी राज के बारे में जो सही था, वही फिर प्रकारांतर से क्रम चला (एक वंश परंपरा का जिसका मैंने जिक्र किया). अकेले एक विचारधारा, एक पक्ष, एक प्रकार का आंदोलन इस सड़ांध को दूर नहीं कर सकता था. हमलोगों ने अकेले कोशिश की. सोशलिस्ट पार्टी ने सभी तरह के प्रयोग किये. फिर ऐसा लगा कि यह अकेले के वश का नहीं है. अगर ये मालूम होता कि भारतीय जनसंघ (उन दिनों भारतीय जनता पार्टी नहीं थी, भारतीय जनसंघ ही था) अकेले यह कर सकता था, इस दुश्चक्र को अकेले तोड़ सकता होता, तो इस दुश्चक्र को तोड़ने के लिए मैं उसकी भी सहायता करने के लिए तैयार होता. किंतु अकेले उसके वश की भी बात नहीं थी. ये अनेक प्रकार की कम्युनिस्ट पार्टियां हैं, अकेले उनके वश की भी बात नहीं थी. इस तरह जब तक इनका कोई साझा मंच नहीं बनता, एक साझा शक्ति नहीं बनती, तो एक-दूसरी जो स्थापित सत्ता है और जिसका दबदबा है, उस दबदबे को हम तोड़ नहीं सकते थे. इसलिए इस व्यवस्था के कारण इस राजनीति की अवश्यकता मैंने अनुभव की और मैंने उस समय शिमला में कहा कि अभी तो यह प्रयोग राज्यों में हो रहा है. मैं इसका विस्तार केंद्र में भी चाहता हूं. इतना सुनते ही राजनीतिशास्त्र के ज्ञाताओं में खलबली मच गयी. उन्होंने कहा, यह आप क्या कह रहे हैं? जो कुछ है लखनऊ, पटना में है, उतना बस है. इसको आप दिल्ली में क्यों सोचते हैं? मैंने कहा, मैं नहीं सोचता हूं. यह जो क्रम चल रहा है, यह क्रम उधर जा रहा है. दिल्ली में भी इस व्यवस्था के मुकाबले एक साझा सरकार की कल्पना कर सकता हूं. वही हुआ. ऐसा नहीं कि मैंने कहा इसलिए हुआ. इसका एक प्रवाह था. एक तर्क था. एक नियति थी कि जो नौ राज्यों में हो चुका था, उसकी परिणति (छाया) दिल्ली में होगी. फिर ‘77 में हुआ. लेकिन इसमें एक दोष भी है कि इसमें सिद्धांतहीनता भी निहित रहती है. क्योंकि अगर हर एक अपनी-अपनी राह चलने लगे (एकला चलो, जिस पर एक समय में हमारे मित्र बहुत जोर देते थे), तो आप कहीं पहुंच नहीं सकते. लेकिन जब सबको जोड़ने-मिलाने की जरूरत है, तो वही करो, जो उस समय हमने किया. सबको मिला कर चले. चूंकि एकला चलो हमारा सिद्धांत है, सपना है, तो उससे वह दुश्चक्र टूटनेवाला नहीं था. लेकिन उसका एक बार टूटना जरूरी था. (तात्पर्य कांग्रेस की सरकार को अपदस्थ करने के लिए अलग-अलग पार्टियों का एक होना जरूरी था.) 1977 में केंद्र में यह हुआ. फिर इंदिरा जी दोबारा सत्ता में आयीं. लेकिन वो दर्प, वो अहंकार टूट गया था कि हमारे परिवार की सत्ता है. क्योंकि वो करीब-करीब ऐसा सोचने लगीं थीं कि अरे! यहां तो पापू (इंदिरा जी अपने पिताजी को पापू कहती थीं) बैठते थे. लालबहादुर शास्त्री कैसे बैठे हैं? उनके बाद, परिवार के बच्चों (संजय गांधी, राजीव गांधी वगैरह) में भी यही भावना थी कि यह तो हमारी निजी संपत्ति है. मैं नेहरू लाइब्रेरी (दिल्ली) में उन दिनों शोध के लिए जाता था. हमारे मित्र डॉ हरिदेव शर्मा वहां थे. कभी-कभार वहां तीनमूर्ति में इंदिरा जी के बच्चे होते, वह यही सोचते थे कि लाइब्रेरी से ये सभी लोग हटा दिये जायें और वे अपने मित्रों के साथ उस प्रोजेक्टर पर सिनेमा देखें, जिसे लाइब्रेरी और नेहरू मेमोरियम के म्यूजियम के खर्चे से खरीदा गया. निजी जायदाद होने की भावना उनमें थी. परिसर में तीन मूर्ति के पीछे वे ऐसे ही खेलते थे, जैसे जवाहरलाल जी के दिनों में खेलते थे. इस तरह की धारणा बन गयी थी, जो राजवंश में होती है. इसे ढाहने की जरूरत थी. उसके लिए कुछ समझौते करने पड़े. उसका फल भी मिला. इस समझौते का एक अच्छा परिणाम हुआ कि सत्ता का वह चक्र टूटा. किंतु आजकल की जो दशा है, उसको देखते हैं, तो उसके मुकाबले में तो वो फिर भी बेहतर थे. उनके परिवारों-चहेतों के जीवन में गांधीजी के साथ रहने की छाप थी. आज क्या है, इसकी तो चर्चा करना भी व्यर्थ है.

-बहुत पहले रविवार के लिए आपसे एक लंबी बातचीत की थी. तब आपके सौजन्य से विद्यापीठ में पुराने लोगों द्वारा दीक्षांत समारोहों में दिये गये भाषणों का प्रकाशित संकलन पढ़ा. इसमें भगवानदास जी द्वारा दिया गया छात्रों का संबोधन पढ़ा. मुझे दुनिया के दूसरे देशों को देखने का अवसर मिला. वहां के विश्वविद्यालयों को देखा. लेकिन जो सपना भगवानदास जी ने शिक्षा को लेकर देखा या जो उनकी उदारता-महानता दिखी, वह सब बार-बार आपके लेख में आता है. फिर आप जे कृष्णमूर्ति के भी काफी करीब रहे. जेपी-लोहिया के भी साथ रहे हैं. इतनी विलक्षण प्रतिभाओं के बीच रहते हुए आज हमारा सार्वजनिक जीवन इतना सूना क्यों दिखता है? जे कृष्णमूर्ति, जेपी-लोहिया या भगवान दास की विलक्षणता क्या थी?

इनकी अलग-अलग विशेषताओं में जाने के लिए बहुत समय चाहिए. लेकिन अगर इनको मिला कर, अपने पूरे देश का एक का परिदृश्य सामने रखें, तो बिल्कुल उसी तरह होगा, जैसे कीचड़ में कमल खिलता है. पहले इस कीचड़ से एक कली बाहर आती है और वह कली सूर्य के प्रकाश में खिल जाती है. आसपास के वातावरण में उसकी सुगंध-मकरंद फैलने लगती है. हमारे सार्वजनिक जीवन की भी दशा कुछ ऐसी है. डाक्टर साहब (डॉ लोहिया) इस कीचड़ को दलदल बताते हुए कहते थे कि जहां पैर डालो वहीं धंसने लगता है. कहीं जमीन ही नहीं है, टिकने के लिए. लेकिन फिर भी उस दलदल में कैसे कमल खिलते थे? आसपास के वातावरण में अपनी सुगंध फैलाते थे, यह कोई मामूली बात नहीं है. आप यह कह सकते हैं कि आप एक दृष्टिकोण बता रहे हैं. अगर ये दलदल या कीचड़ पटेगा नहीं, तो उसमें ये थोड़े से कमल क्या हैं? मुझे भारत रत्न- डॉ भगवानदास, आचार्य नरेंद्रदेव, डॉ लोहिया, डॉ कृष्णमूर्ति जैसे लोग भी इसी कीचड़ में कमल की तरह लगते थे. उस कमल की सुगंध आज भी मेरी स्मृति में है. लेकिन आज के समय में आसपास के वातावरण में कोई प्रभाव हुआ है, जिससे यह वातावरण सुगंधित हुआ हो? मुझे तो ऐसा नहीं लगता. आज लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थों में, एक-दूसरे की टांग खींचने में, शिकायत करने में, बदला लेने में, बरगलाने की कोशिश करने में लगे हुए हैं.

-आपके यात्रा वृत्तांतों से प्रेरित होकर मैं कैलास-मानसरोवर गया. तिब्बत की यात्रा में लगा कि यहां की हवाओं में अलग गंध है. कुछ भिन्नता है. आप तो गहराई से बौद्ध परंपरा, तिब्बत आदि को जानते हैं. उनकी क्या विलक्षणता है, जो आज की दुनिया को पता नहीं?

वैसे तो भूगोल का कितना प्रभाव, संस्कार और संस्कृति पर पड़ता है, यह तय करना कठिन है. किंतु हिमालय में कुछ विशेष जरूर है. हिमालय का जो गौरवभाव है, नगाधिराज और वह सारी कविता, उससे प्रभावित होकर मैं नहीं कहता. लेकिन जैसे ही आप चढ़ाई आरंभ करेंगे, आप अनुभव करेंगे कि उसमें वह ऊंचाई आने लगती है और वो चीड़ की गंध, वो घाटियां, और वो ढलान वो चढ़ाई, तो कुछ अलग होने लगता है. वैसे भी तिब्बत हिमालय के उस पार है. मैंने हिमालय के इस पार और उस पार दोनों ही यात्राएं की हैं. तिब्बत तो मेरे लिए प्रतिबंधित क्षेत्र हो गया, क्योंकि वहां चीन का आधिपत्य हो गया. मेरी तिब्बत के मित्रों से इतनी आत्मीयता थी कि तिब्बत जाने की इच्छा नहीं हुई. शुरू-शुरू में वह खुला हुआ था, जब मैंने ये यात्राएं शुरू कीं. लेकिन मैंने सोचा कि एक क्रम से शुरू करूं, इसलिए मैं तिब्बत गया नहीं. फिर सरकारी अनुमति लेकर कैलास-मानसरोवर जाने की मेरी इच्छा नहीं हुई. आप हो आये, आपको यह दर्शन हुआ, तो यह जान कर मुझे बहुत अच्छा लगा. किंतु वो जो हिमालय के इस पार और फिर हिमालय के शिखरों के उस पार की जो दूरी है, नीलिमा है, आकाश है, आकाश और जो धरती के छोटे-छोटे हिस्से हैं, उनसे वो बड़ा है. वो कुछ भिन्न ही है. अगर बड़ा छोटा न कहें, तो वह कुछ और ही है. तो उसका सबकुछ कुछ अलग ही है. अभाव हैं, लेकिन वैसी कोई विपन्नता नहीं है. एक उसका ठाठ है. आपने उसको देखा है, तो आपको मालूम होगा. वे सभी चीजें हिमालय के आकार की हैं. हिमालय के वर्ण की हैं. वो वर्ण और वो सुगंध किसी दूसरी जगह हो नहीं सकती. उनके (तिब्बती) यहां आने पर अच्छा ही हुआ. लेकिन जो एक मोती समुद्र के तल में बनता है और दूसरा जो कारखाने में बनता है, वैसा ही फर्क तिब्बत की मूल भूमि में और आरोपित या दुर्भाग्य से यहां उनके आने पर बसी भूमि में है. लेकिन वो तिब्बत कुछ और ही है. उसको महसूस किया जा सकता है, उसका बखान नहीं किया जा सकता.

-लामा पुनर्जन्म , भूत-भविष्य के ज्ञाता, साधक माने जाते रहे हैं. पुराने लामाओं के अनेक वृत्तांत हैं, जो जीवन को भिन्न दृष्टि से देखते हैं. वैज्ञानिक कसौटी से लोग उनकी चीजों पर बहुत शंका करते हैं. पर उनकी विलक्षणता, उनका ज्ञान, उनकी आभा बताती है कि उनमें कुछ है. आप इसे कैसे देखते हैं?

यह कोई तिब्बत की अपनी देन नहीं है. यह सब कुछ भारत से गया है, लेकिन तिब्बत में वह सुरक्षित था. वो लोग जीवन का अंत, प्राणांत से नहीं मानते. जीवन है, उसके बाद एक अंतराभाव है और पुनर्जन्म है. ये तीन की कल्पना उन्होंने की. जिसे भद्दे ढंग से, लामावाद कहते हैं, यह वैसा नहीं है. अंग्रेजों ने लामाइज्म कह कर समझने की कोशिश की. यह भारत की ही परंपरा है. विशेष रूप से बौद्ध परंपरा, जो वहां स्थापित हुई, तो उसमें जन्म है, जीवन है, मृत्यु है. फिर मृत्यु के बाद ये सब समाप्त नहीं होता. एक सूक्ष्म चित्त और उसके साथ जुड़े हुए कर्म को वह अगले जन्म के लिए अंतराभाव की दशा मानते हैं. इसमें वो जीव अधिक से अधिक गिनती भी दी है कि 49 दिनों तक रहता है. फिर अगर वह मुक्त नहीं हुआ है, उसे निर्वाण प्राप्त नहीं हुआ है, तो वह अपने कर्म के आधार पर अपने माता-पिता को चुनता है. जब वो रति में होते हैं, तो उसमें वो प्रवेश करते हैं और उसका एक नया जन्म होता है. तो ऐसे अवतारी लामाओं की एक परंपरा, कोई एक दो नहीं, कोई 500 से अधिक अवतारी लामाओं के टुलको या अवतारी लामा या रिनपोचे भी उनको कहते हैं, की परंपरा है. तो टुलको यानी अवतार, पुराने एक बड़े साधक का, बड़े विद्वान का अवतार होता है, ऐसे अवतारों की एक दीर्घ परंपरा तिब्बत में सुरक्षित रही है. जैसा आपने जिक्र किया कि उनमें कुछ विलक्षणता तो अवश्य होती है. उनमें सभी भिक्षु भी नहीं बनते. कुछ भटक भी जाते हैं. लेकिन इस भटकाव में भी एक विलक्षणता होती है. शुरू-शुरू में उनको पूर्वजन्म की कुछ स्मृति भी रहती है. ऐसा मैं किसी अंधविश्वास के आधार पर नहीं कहता. व्यक्तिगत साक्ष्य के आधार पर मैं जानता हूं कि 10-11 वर्ष तक (वह कोई आयु तय नहीं करते) पूर्वजन्म की स्मृति कुछ-कुछ रहती है. फिर धीरे-धीरे वह लुप्त हो जाती है. फिर वे उसके अवतार मान लिये जाते हैं, फिर तो उनका जीवन इस तरह चलता है. कैसे वह ढूंढ़े जाते हैं, कैसे उनकी शिक्षा होती है, कैसे उनका स्थान तय होता है, कैसे उनका आचरण होता है, यह सब तो विस्तार की बातें हैं. लेकिन इसमें सिर्फ एक रूल नहीं है. इसमें कुछ तथ्य भी हैं. और जीवन, जैसे मैंने एक आयाम का जिक्र किया, तो जीवन का आयाम सिर्फ हियर एंड नाऊ में ही नहीं है. इसके बाद की भी कुछेक इसकी संतति है. कुछ परंपरा है, इसके पर्याप्त संकेत मिलते हैं.

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