शिशु और मातृ-मृत्यु दर की चिंता

Published at :30 May 2014 5:24 AM (IST)
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शिशु और मातृ-मृत्यु दर की चिंता

।। अंजलि सिन्हा।। (महिला मामलों की लेखिका) आम चुनाव की आपाधापी के दौरान रांची के पास नामकुम की चंद्रमुनि (25 वर्ष) की इलाज के अभाव में हुई मौत सुर्खियां नहीं बन सकीं. विडंबना है कि चंद्रमुनि खुद राज्य में सहिया अर्थात् गर्भवती महिलाओं के लिए अक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट थीं, जिसने 15-20 महिलाओं की स्वास्थ्य […]

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।। अंजलि सिन्हा।।

(महिला मामलों की लेखिका)

आम चुनाव की आपाधापी के दौरान रांची के पास नामकुम की चंद्रमुनि (25 वर्ष) की इलाज के अभाव में हुई मौत सुर्खियां नहीं बन सकीं. विडंबना है कि चंद्रमुनि खुद राज्य में सहिया अर्थात् गर्भवती महिलाओं के लिए अक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट थीं, जिसने 15-20 महिलाओं की स्वास्थ्य प्रसूति में सहायता प्रदान की थी. चंद्रमुनि ने एक स्वस्थ्य बच्ची को जन्म दिया था, पर उसके बाद उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गयी. झारखंड सरकार ने गर्भवती महिलाओं के लिए चिकित्सकीय सेवा मुफ्त की है, पर उसे न तो वक्त रहते रांची के अस्पताल में पहुंचाया जा सका, न ही समय पर वाहन मिला और न ही अस्पताल ले जाने पर वहां डॉक्टर मौजूद थे.

एक अंगरेजी दैनिक के संपादकीय के मुताबिक मातृ-मृत्यु दर में भारत सबसे आगे है. हालांकि, 1990 में जहां प्रति लाख जीवित जन्म पर 569 महिलाओं की मृत्यु होती थी, वहीं 2013 में यह आंकड़ा घट कर प्रति लाख 190 पर आया है, लेकिन दुनिया भर में मातृ-मृत्यु का 17 फीसद यहीं है. इसी अखबार में ‘लॉन्सेट’ पत्रिका को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि नवजातों की मृत्यु के मामले में भारत आज भी अव्वल है. यदि दुनिया भर में 55 लाख नवजातों की मृत्यु होती है, तो इसमें से भारत के 7 लाख 79 हजार हैं. ‘सेव द चिल्ड्रेन’ की रिपोर्ट के मुताबिक ओड़िशा व मध्य प्रदेश नवजात मृत्यु दर में अव्वल हैं. राजस्थान तीसरे नंबर पर है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक ने एक रिपोर्ट में बताया है कि 2012 में 10 लाख बच्चे जन्म के पहले दिन ही मर गये. कारण- चिकित्सकीय सुविधाओं में कमी तथा माताओं का कमजोर स्वास्थ्य.

हमारे समाज में मातृत्व प्रतिष्ठित और उपेक्षित दोनों है. मातृत्व का गुणगान पुराने ग्रंथों से लेकर आधुनिक साहित्य तक में मिलता है. जो औरत मां नहीं बन पाती है, वह समाज में उपेक्षित होती है. स्त्री के लिए यह दुख अतुलनीय है. मां का दर्जा ऊंचा है, लेकिन इस प्रतिष्ठा का फल बच्चा पैदा करनेवाली औरत के वास्तविक जीवन में नहीं दिखता है.

कुछ साल पहले प्रकाशित यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक हर 7 मिनट में एक औरत हमारे देश में जचगी संबंधी बीमारियों-असावधानियों से मरती है. हर साल 78 हजार महिलाएं गर्भसंबंधी कारणों से मरती हैं. भारतीय महिलाएं अमेरिका और इंग्लैंड की तुलना में तीन सौ गुना अधिक गर्भसंबंधी बीमारियों तथा मौतों की शिकार बनती हैं. यानी जचगी के समय मौत का कारण पूरी तरह से सामाजिक हालात हैं न कि प्राकृतिक. हमारे देश में जितनी औरतें हर रोज बच्चा पैदा करने के कारण मरती हैं, उससे बीस गुना अधिक गर्भसंबंधी बीमारियों की शिकार होती हैं, जिसका खामियाजा वे ढलती उम्र में ङोलती हैं. कैल्शियम की कमी के कारण हड्डियों का कमजोर हो जाना या गर्भाशय का बाहर आना तथा इन्फेक्शन हो जाना आदि आम बीमारी है. इन समस्याओं का गहरा कारण गरीबी, पिछड़ापन, अज्ञानता तथा सरकारी निकम्मापन है.

मातृ-शिशु मृत्यु दर के कारणों को तीन तरह से बांट कर देख सकते हैं. एक- इसके लिए सरकारी नीतियां तथा प्रशासनिक लापरवाही प्रमुख कारण है. आज भी कई इलाके ऐसे हैं, जहां कोई अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र दूर-दूर तक नहीं है. दूसरा है गरीबी. संसाधनविहीन लोगों का न तो ठीक से भरण-पोषण होता है न ही मेडिकल जांच. जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में लगा परिवार प्रसूति में विशेष इंतजाम कहां से करेगा. तीसरा है समाज का पिछड़ापन. दुनिया के 40 फीसदी बाल-विवाह हमारे देश में होते हैं. विवाह बाद परिवार की अपेक्षा होती है कि बच्चा नहीं हुआ तो कोई समस्या है. बच्चों की संख्या को लेकर भी हमारे समाज का बड़ा हिस्सा अभी सचेत नहीं है. समाजशास्त्रियों के अनुसार, गरीबी का जनसंख्या वृद्धि से गहरा रिश्ता होता है. बाल-मृत्यु दर असुरक्षा बोध भी पैदा करता है, जो ज्यादा बच्चों का कारण बनता है.

पुरुषों का उपेक्षापूर्ण रवैया भी गर्भवती महिलाओं की मृत्यु में इजाफा करता है. पुरुष नसबंदी नहीं कराना चाहता है तथा वह निरोध जैसे साधनों के इस्तेमाल के प्रति भी उदासीन रहता है, लिहाजा औरत को ही इसका खामियाजा ङोलने के लिए बाध्य होना पड़ता है. दरअसल, हमारी सरकारें किसी भी गंभीर समस्या से टुकड़ों-टुकड़ों में समाधान निकालने लगती है और मूल कारण को संबोधित नहीं करती हैं. सिर्फ सुरक्षा के कुछ उपाय या जननी सुरक्षा दिवस मनाना अपर्याप्त है. स्वास्थ्य एजेंसियों को सेवा देने के लिए बाध्य करने के साथ ही लोगों को जागरूक बनाना भी जरूरी है. हर नागरिक के स्वास्थ्य की फाइल होनी चाहिए. जब भी ऐसी समस्या पर सरकार काम करने चलती है, तो मंत्रलय जिम्मेवारी का बड़ा हिस्सा स्वयंसेवी संस्थाओं को सौंप कर उन्हें सेवा के लिए धन उपलब्ध करा देता है. इन संस्थाओं की जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती है. वे तो बस रिपोर्ट तैयार कर दाता एजेंसी को सौंप देती हैं.

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