किसानों का लगान माफी आंदोलन

Updated at : 31 May 2018 6:51 AM (IST)
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किसानों का लगान माफी आंदोलन

II मनींद्र नाथ ठाकुर II एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू manindrat@gmail.com कोसी नदी को बिहार का अभिशाप कहा जाता था. लेकिन उस अभिशाप से निकालने का जो प्रयास आधुनिक विकास के माॅडल के द्वारा किया गया, वह उस इलाके के किसानों के गले का फंदा बन गया है. किसान न तो खेती कर पाते हैं, न ही […]

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II मनींद्र नाथ ठाकुर II
एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
manindrat@gmail.com
कोसी नदी को बिहार का अभिशाप कहा जाता था. लेकिन उस अभिशाप से निकालने का जो प्रयास आधुनिक विकास के माॅडल के द्वारा किया गया, वह उस इलाके के किसानों के गले का फंदा बन गया है. किसान न तो खेती कर पाते हैं, न ही ठीक से जीवन-यापन के अन्य साधनों का ही विकास कर पाते हैं.
कौन जिम्मेदार है उनकी बदहाली का? राज्य और समाज का दायित्व क्या है? ऐसे में उनके द्वारा किया जानेवाला ‘लगान माफी आंदोलन’ क्या उचित नहीं है?
जिन लोगों ने फणीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा है, उन्हें ‘कोसिका महारानी’ और इस नदी के किनारे जलाये जानेवाले दीपकों के बारे में पता होगा. यह पुराना और स्थानीय तरीका था प्रकृति को समझने का और उससे संबंध स्थापित करने का. इन लोक कथाओं के माध्यम से हर समाज इन नदियों के चरित्र का ज्ञान आनेवाली पीढ़ियों तक पहुंचाता था.
विकास की आधुनिक अवधारणा ने प्रकृति पर विजय पाने के लिए ज्ञान सृजन किया और नदियों को बांधकर अपने तरीके से उसके जल का उपयोग करना चाहा. लेकिन ‘कोसिका महारानी’ को बांधना भी कोई आसान काम नहीं है. समय-समय पर वह तटबंधों को तोड़कर आधुनिक तकनीकी के महान विश्वकर्माओं को ठेंगा दिखाते रहती हैं.
लेकिन इस खेल में सबसे ज्यादा तबाह हो गये हैं नदी के आसपास रहनेवाले लोग, खासकर किसान और मजदूर. हजारों हेक्टेयर जमीन बेकार हो गयी है.
बाढ़, बहाव और कटाव के कारण कोई खेती संभव नहीं है. हर साल पानी के साथ-साथ बालू का नया परत जमीन को किसी काम के लायक नहीं रहने देता है. ऐसे में किसान और मजदूर दोनों ही काम की खोज में महानगरी की ओर पलायन करते हैं.
इस इलाके में न तो स्वास्थ्य की सुविधा है और न ही शिक्षा की. प्रकृति के बारे में जो कुछ ज्ञान यहां के लोगों के जीवन यापन के काम आता था, सब बेकार हो गया है. मनुष्य की अधोगति हो गयी है. 21वीं सदी में इतनी अधोगति शायद ही किसी और देश में हो रही है, जितनी इस इलाके में है.
अधोगति केवल इसलिए नहीं है कि यहां के लोगों के लिए जीवन यापन के साधन समाप्त कर कर दिये गये हैं, बल्कि इसलिए भी है कि जिन साधनों से उन्हें कुछ भी नहीं मिलता है, उस पर भी सरकार टैक्स बढ़ाती जा रही है.
लगान का दर विगत वर्षों में दसगुना बढ़ चुका है. 50 प्रतिशत शिक्षा सेस है, 50 प्रतिशत स्वास्थ्य सेस है, 25 प्रतिशत सड़क और 20 प्रतिशत कृषि विकास का सेस है. कुल लगभग 145 प्रतिशत सेस लिया जा रहा है. वह भी तब, जब इनमें से कोई सुविधा उन्हें न मिल रही है, न ही मिलने की उम्मीद की जाती है.
क्या ऐसा करना उचित है? यह मानवकृत विपदा है. सरकार की नीतियों से उत्पन्न संकट है. क्या इसकी तुलना नील की खेती करनेवाले किसानों से नहीं की जानी चाहिए? किसानों की आमदनी है नहीं और उनसे कर उगाही की जाती है.
इस इलाके में जनांदोलन के एक कार्यकर्ता ने बताया कि कास्तकारी अधिनियम में यह प्रावधान है कि किसानों की जमीन नदी की धारा में जाती है, तो किसान अंचल अधिकारी से लगान माफी के लिए आवेदन कर सकते हैं.
लेकिन लगान माफी के बाद जमीन की मलकियत सरकार की हो जायेगी. क्या यह विचित्र नियम नहीं है? यदि यह सच है तो निश्चित रूप से स्वतंत्रता के पूर्व का प्रावधान होगा. आधुनिक जनतंत्र में यदि एसा नियम बना है, तो किसानों के साथ अन्याय है. यह तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है. आश्चर्य यह है कि इस इलाके के किसानों में राज्य के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला नहीं भड़क रही है, कोई हिंसक आंदोलन नहीं चल रहा है.
कुछ उत्साही युवा कार्यकर्ताओं ने किसानों को संगठित करने का जिम्मा लिया है. गांधी के चंपारण आंदोलन के तर्ज पर उन्हें आंदोलित करने का प्रयास किया जा रहा है. वहां के बच्चों की शिक्षा के लिए जीवनशालाएं खोली जा रही हैं. हाल में उन्होंने जनसुनवाई का सफल आयोजन किया. अब कई चरणों में पदयात्राएं आयोजित की जा रही है.
पंचायतों से लगान माफी के लिए प्रस्ताव पारित करने का अनुरोध किया जा रहा है. चंपारण सत्याग्रह के सौवें साल में भी ऐसा लगता है भारत वहीं है. केवल सरकारें बदल गयी हैं, लेकिन किसानों को लेकर नीतियों में कोई खास बदलाव नहीं है.
जनतंत्र को राजनीतिक पार्टियों ने बंदी बना रखा है. ये मुद्दे चुनाव के समय दब जाते हैं. जाति, धर्म और जुमलों के सहारे यहां जनतंत्र का जादू चल रहा है.
लगान मुक्ति आंदोलन इस यांत्रिक युग में सत्याग्रह का नया प्रयोग है. सरकार तो सत्याग्रह को भी गांधी के सामानों के साथ संग्रहालय में रखने की योजना बना रही है.
कभी खादी की तरह उसे भी नुमाइश की चीज बनाने का प्रयास किया जा सकता है. योग दिवस की तरह सत्याग्रह दिवस भी मनाया जा सकता है. लेकिन, गांधी का सत्याग्रह सरकार के इन प्रयासों को झुठला देने की क्षमता रखता है. गांधी के शरीर की हत्या भले ही हो गयी हो उनकी आत्मा इन किसानों के लिए अभी जीवित है.
गांधीवादियों और समाजवादियों को सत्याग्रह की शताब्दी मनाने के लिए चंपारण नहीं, बल्कि कोसी इलाके में जाना चाहिए. सत्याग्रह को सौ साल पुराना करने का प्रयास नहीं, बल्कि उसके नये अवतार का प्रयास करना चाहिए. यदि इन किसानों का सत्याग्रह सफल होता है, तो दुनियाभर में मानवता के बचे रहने की उम्मीद जागेगी. अन्यथा जिस तरह सता और सुख-सुविधाएं कुछ लोगों के पास सिमटती जा रही हैं, लोकशाही तानाशाही में बदलती जा रही है, ऐसे में हम हिंसा में वृद्धि की संभावनाओं से इनकार नहीं कर सकते हैं.
लेकिन, सत्याग्रहियों को यह समझना होगा कि समय बदल गया है. जिनके विरोध में सत्याग्रह किया जा रहा है, उनका स्वभाव भी बदल गया है. यह जनतंत्र के नाम पर हमारी चुनी हुई सरकार है. इनके विरोध में सफल सत्याग्रह के लिए गांधी की तुलना में कहीं ज्यादा लोकसंग्रह की जरूरत है. उन्हें हर वर्ग के लोगों तक अपनी बातों को लेकर जाना होगा.
अलगाव के इस युग में लोगों में संवेदनाएं कम हो गयी हैं, उसे जगाना होगा. सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग आम लागों से कट गया है. विश्वविद्यालयों में जनहित के शोधों की कमी हो गयी है. सत्याग्रहियों को छात्रों, शिक्षकों के साथ-साथ शहरी मध्यम वर्ग को भी साथ लेना होगा. इसके लिए गांधी से रचनात्मक ऊर्जा उधार लेने की जरूरत है.
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