बिन सरकारी बंगला सब सून

Updated at : 23 May 2018 6:23 AM (IST)
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बिन सरकारी बंगला सब सून

दीपक गिरकर व्यंग्यकार कोई भी प्राणी सिर्फ कुछ दिन के लिए किसी कुटिया या बंगले में रहता है, तो उसका उससे भावनात्मक लगाव हो जाता है. हमें सरकारी बंगले से इतना अधिक लगाव हो गया है कि हम सपने में भी सरकारी बंगला खाली कर अन्य बंगले में रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते […]

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दीपक गिरकर

व्यंग्यकार

कोई भी प्राणी सिर्फ कुछ दिन के लिए किसी कुटिया या बंगले में रहता है, तो उसका उससे भावनात्मक लगाव हो जाता है. हमें सरकारी बंगले से इतना अधिक लगाव हो गया है कि हम सपने में भी सरकारी बंगला खाली कर अन्य बंगले में रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.

वृद्ध लोग अपने गांव के मकान और गांव की जमीन से धागे-दोरे जुड़े हुए होते हैं, ठीक इसी तरह हम और हमारे जैसे भूतपूर्व मंत्रियों के भी सरकारी बंगले से धागे-दोरे जुड़े हुए हैं.

हमारे जैसे अधिकतर मंत्री सरकारी बंगले को कुटिया ही कहते हैं और इसमें भैंस भी बांधकर रखते हैं. सरकारी बंगले में भैंस बांधकर रखने का मजा ही कुछ और है.

हमारे पिछले जन्मों के अच्छे कर्म के कारण हम इस जन्म में सेवा तो सिर्फ कुछ दिनों की करते हैं, पर सेवा प्रसाद जीवनभर प्राप्त करते हैं. हम जनप्रतिनिधि रिटायर कभी नहीं होते हैं. देश का सारा बोझ हम जनप्रतिनिधियों के कंधे पर ही तो है. इसलिए हम जैसे भूतपूर्व मंत्रियों के लिए तो ‘बिन सरकारी बंगला सब सून’ है.

हमें और हमारे जैसे जनप्रतिनिधियों को सरकारी बंगले दिये जाने का यह कतई मतलब नहीं है कि सरकारी जमीन पर हमें (भूतपूर्व) पिछले दरवाजे से कब्जा दिलवाया गया है.

हम अपने पद से हटने के बाद भी सरकारी बंगले खाली नहीं करते हैं, क्योंकि हम मंत्री नहीं हैं, लेकिन जनप्रतिनिधि तो हैं ही. हम चुनाव में हार गये, लेकिन हमें भी तो जनता ने वोट दिये थे, अत: हम भी तो जनप्रतिनिधि ही हैं.

हमारा दिमाग पंच सितारा सुविधाओं से सुसज्जित सरकारी बंगले में तेज चलता है. बंगले के हॉल में हम जनता से मिलते हैं. लॉन में झूले पर बैठकर हलका-हलका झूलते हुए जनता की समस्याओं का चुटकियों में निदान कर देते हैं. जनता की समस्याओं के निबटान के लिए सरकारी बंगले में रहना हमारी मजबूरी है.

जाहिर है, सरकारी बंगला है तो बिजली का बिल भी सरकार ही भरती है और बंगले के गेट पर गार्ड भी सरकारी ही होता है. यदि हम सरकारी बंगला खाली कर अपने निजी बंगले में चले जायेंगे, तो हम जनता को भूलकर सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में ही विचार करने लगेंगे.

यह मत भूलो कि सचिवालय में तुम्हारी नियुक्ति हमने ही कार्रवाई थी. तुम किराये के मकान में रह रहे हो. किराये के मकान को तुमने कभी भी अपना नहीं समझा.

इसलिए तुम हमारी भावनाओं को समझ नहीं पा रहे. तुम सरकारी बंगले की कीमत रुपये-पैसे में आंक रहे हो. रुपया-पैसा तो हाथ का मैल है. वैसे तुम्हारे बारे में भी हमने सोच रखा है. तुम्हारे रिटायरमेंट से पहले जुगाड़ करके तुम्हें भी सरकारी बंगला अलॉट करवा देंगे. हमारी लालबत्ती तो फ्यूज हो ही चुकी है.

अब वर्तमान सरकार हमारी कुटिया के पीछे हाथ धोकर पड़ी है. सरकारी नोटिस का हम जैसी वीआइपी हस्तियों पर असर नहीं होता है. वैसे तो हम सरकारी बंगला खाली नहीं करेंगे, लेकिन यदि कभी जोर-जबर्दस्ती से खाली करवाया गया, तो फिर हम अधिक समय तक जनता की सेवा नहीं कर पायेंगे.

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