यह कैसा ''ऑनर''

Updated at : 05 Feb 2018 6:29 AM (IST)
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यह कैसा ''ऑनर''

प्रेम संबंधों को लेकर परिवारों की नाराजगी का इस हद तक बढ़ जाना कि मामला सरेआम हत्याओं तक पहुंच जाये, निस्संदेह बहुत कारुणणिक है. यह बेहद अफसोसनाक है कि आज हमारे देश में ऐसे मामले आम हो चुके हैं. देश की राजधानी में अंकित सक्सेना की हत्या इसी सिलसिले की दुखद कड़ी है. इस घटना […]

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प्रेम संबंधों को लेकर परिवारों की नाराजगी का इस हद तक बढ़ जाना कि मामला सरेआम हत्याओं तक पहुंच जाये, निस्संदेह बहुत कारुणणिक है. यह बेहद अफसोसनाक है कि आज हमारे देश में ऐसे मामले आम हो चुके हैं. देश की राजधानी में अंकित सक्सेना की हत्या इसी सिलसिले की दुखद कड़ी है.

इस घटना ने फिर से इस बात की पुष्टि की है कि व्यक्ति की आजादी का सामुदायिक स्वीकार अभी भारत में बहुत दूर की कौड़ी है. साल 2010 में कानून विशेषज्ञों ने एक शोध में आंकड़ों के हवाले से बताया था कि भारत में हर साल 1000 से अधिक हत्याएं कथित ‘ऑनर किलिंग’ से जुड़ी होती हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े संकेत करते हैं कि देशभर में ऐसी हत्याओं की संख्या कम नहीं हो रही है.

सवाल यह है कि इस पर रोक कैसे लगे? समाज में व्यक्ति की आजादी को तरजीह देने वाली आधुनिक संवेदना का विकास राजनीतिक सक्रियता की मांग करता है. लोकतंत्र में राज और समाज का रिश्ता द्वंद्वात्मक है. किन्हीं मामलों में समाज की मांग राजनीति को आगे की राह दिखाती है और कुछ मामलों राजनीति समाज को उसकी जड़ता से निकालकर आगे के मुकाम पर ले जाने की कोशिश करती है. आजादी का आंदोलन इस बात का गवाह है.

लेकिन इस पर सोचने के बजाय दिल्ली में हुई नवयुवक की हत्या को सांप्रदायिक रंग देने की खतरनाक कोशिश हो रही है, जबकि सच्चाई यह है कि कथित ‘ऑनर किलिंग’ के मामले देश के हर इलाके तथा समुदाय में घटित होते रहे हैं. कहीं प्यार की राह में जाति, तो कहीं धर्म के आड़े आने के कई मामले हैं.

कहीं एक ही जाति या गोत्र के सवाल में लड़के-लड़की को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है. कुछ ही दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने खाप पंचायतों के फरमानों को गैरकानूनी करार देते हुए सरकारों और राजनेताओं को भी चेताया है कि वे ऐसी गिरोहबंदियों को संरक्षण न दें. केरल के बहुचर्चित हदिया मामले में भी अदालत ने कहा है कि दो बालिग लोगों के अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के बुनियादी अधिकार में अदालतें या सरकारें दखल नहीं दे सकती हैं. यह बड़े सुकून की बात है कि मृत युवक के पिता ने गुहार लगायी है कि इस मामले को सांप्रदायिक रंग नहीं दिया जाये.

आधुनिक चेतना और संसाधनों से समृद्ध होते समाज की संवेदनशीलता पर भी इस प्रकरण ने चिंताजनक प्रश्नचिह्न खड़ा किया है. जब युवक पर उसकी प्रेमिका के परिवारजन हमला कर रहे थे, तब वहां मौजूद लोगों ने न तो बीच-बचाव किया और न ही अपने तड़पते बेटे हो गोद में लिये मां की मदद की पुकार पर कोई दौड़ा. गंभीर मुश्किल में ही यदि हम एक-दूसरे की मदद के लिए तत्पर नहीं होंगे, तो फिर इस रवैये से कैसे देश और समाज का निर्माण कर सकेंगे?

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