सफर करते हैं!

रेल आदमी की जिंदगी से इस कदर जुड़ी है कि उसकी जिंदगी लेकर रहती है. रेल का ‘सफर’ अब उर्दू या अरबी का ‘सफर’ न रहकर अंग्रेजी का ‘सफर’ हो गया है. रेलयात्रियों को भी घरवाले अब इस तरह विदा करने लगे हैं, जैसे पिछले जमाने में तीर्थयात्रियों को किया करते थे- पता नहीं, लौटकर […]
रेल आदमी की जिंदगी से इस कदर जुड़ी है कि उसकी जिंदगी लेकर रहती है. रेल का ‘सफर’ अब उर्दू या अरबी का ‘सफर’ न रहकर अंग्रेजी का ‘सफर’ हो गया है. रेलयात्रियों को भी घरवाले अब इस तरह विदा करने लगे हैं, जैसे पिछले जमाने में तीर्थयात्रियों को किया करते थे- पता नहीं, लौटकर आयेंगे या नहीं! और वे खुद भी इस तरह उनसे विदा लेते हैं, मानो कह रहे हों- खुश रहो अहले-वतन, हम तो ‘सफर’ करते हैं!
रेल-कर्मचारी भी रेलवे के इस ‘मिशन-जिंदगी’ में भरसक योगदान करते पाये जाते हैं. पिछले दिनों एक के बाद एक घटी तीन घटनाएं उनके इस योगदान को रेखांकित करने के लिए काफी हैं. एक में पटरी पर मरम्मत चल रही थी, लेकिन संबंधित विभाग ने इसकी जानकारी संचालन विभाग को देना जरूरी नहीं समझा. परिणाम यह हुआ कि रेल टूटी हुई पटरी पर ही चलती रही और उचित मौका देख उसके डब्बे एक-दूसरे पर जा चढ़े. अवश्य ही मरम्मत विभाग काम करने में विश्वास रखता होगा, उसका ढिंढोरा पीटने में नहीं. रेल थोड़ी देर और उधर न आती, तो काम पूरा हो ही जाना था. वैसे तो हमेशा लेट होती रहती हैं हमारी रेलें, पर जब उनसे वाकई लेट होना अपेक्षित होता है, तो पटरी टूटी होने का भी खयाल नहीं करतीं और दौड़ी चली आती हैं. रेलों को अपनी इस धारणा पर दृढ़ रहना चाहिए कि हमारे देश में रेल-यात्री कहीं पहुंचने के लिए रेल-यात्रा नहीं करते. उनके पास समय ही समय है होता है, जिसे बिताने के लिए ही वे रेल-यात्रा करते हैं.
दूसरी घटना में एक कर्मठ ड्राइवर रेत से भरा डंपर पटरी पर ही फंसा छोड़ गया. डंपर के फंसे होने को उसने उतनी तवज्जो नहीं दी, जितनी इस बात को कि वह खुद डंपर में फंसा न रह जाये. ड्राइवर को इतनी बड़ी बाधा दूर से ही नजर अवश्य आ गयी होगी, पर उसने सोचा होगा कि जब उसे रुकने के लिए नहीं कहा गया, तो क्यों ख्वाहमख्वाह रुका जाये? और भ्रम में न पड़ते हुए उसने गाड़ी डंपर पर चढ़ा दी होगी.
तीसरी घटना मुंबई में घटी, जहां चलनेवाली लोकल ट्रेन से एक युवक गिर गया, तो होमगार्ड और स्टेशन मास्टर ने दया करके उसे अस्पताल पहुंचाने के बजाय सीधे उसके गंतव्य पर पहुंचाने के उद्देश्य से अगली लोकल ट्रेन में उठाकर फेंक दिया. आराम से चढ़ाने पर लोकल ट्रेन के चल देने का खतरा जो रहा होगा. सुना है, दोनों कर्मचारियों को उनकी इस तत्परता का इनाम सस्पेंड करके दिया गया है. लेकिन, मुझे पूरी उम्मीद है कि वे दोनों साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित की तरह ‘बेदाग’ छूट जायेंगे और सरकार उनके मामले में भी ‘जमानत पर रिहा होने के बावजूद अपराधमुक्त होने’ का-सा ही जश्न मनायेगी.
सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
drsureshkant@gmail.com
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