राष्ट्रपति की जाति

Updated at : 28 Jun 2017 6:20 AM (IST)
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राष्ट्रपति की जाति

भारतीय क्रिकेट में सर्वशक्तिमान दिखनेवाले विराट कोहली भी जो नहीं कर सके, राजनीति के खिलाड़ियों ने वह कर दिखाया! अब राष्ट्रपति चुनाव का टॉस कोई भी जीते, मैच कोई दलित ही जीतेगा! यह लिखते हुए मानो मेरे हाथ गंदले हो गये हैं अौर मन खट्टा हो गया है. कहां से गिर कर हमारे राजनीतिज्ञ कहां […]

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भारतीय क्रिकेट में सर्वशक्तिमान दिखनेवाले विराट कोहली भी जो नहीं कर सके, राजनीति के खिलाड़ियों ने वह कर दिखाया! अब राष्ट्रपति चुनाव का टॉस कोई भी जीते, मैच कोई दलित ही जीतेगा! यह लिखते हुए मानो मेरे हाथ गंदले हो गये हैं अौर मन खट्टा हो गया है. कहां से गिर कर हमारे राजनीतिज्ञ कहां पहुंचे हैं, अौर एक राष्ट्र के रूप में किस हद तक अपमानित किये जायेंगे, इसकी पीड़ा इतनी गहरी है कि ‘दुखवा मैं कासे कहूं’ जैसा हाल है.

भाजपा अध्यक्ष ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए तीन-चार बार रेखांकित किया कि वे दलित समुदाय से अाते हैं! जिसके बारे में अापके पास बताने की सबसे बड़ी पहचान उसकी जाति ही है, इससे उस अादमी का कोई परिचय मिलता हो या नहीं, अापकी जाति का परिचय तो मिल ही जाता है. संविधान हमें ऐसे भारत की तरफ बढ़ने का निर्देश देता है, जिसमें जाति-धर्म-भाषा-संप्रदाय-लिंग का नहीं, योग्यता का अाधार लिया जायेगा. वह हमें सावधान भी करता है कि जो वर्ग, जो वर्ण अौर जो अवर्ण पीछे छूट गये हैं, उन्हें बराबरी में लाने की हर संभव व्यवस्था समाज व सरकार करेगी. जाति, धर्म, संप्रदाय जैसे तत्व समाज में रूढ़ तो हैं. इनके उन्मूलन की जरूरत है, ताकि समाज यहां से अागे देख सके अौर चल सके. हमारी सत्ताकेंद्रित व्यवस्था ऐसे गर्हित खेल में बदल गयी है, जो मानव-मन की अौर सामाजिक चलन की हर कमजोरी को भुना कर सफलता पाने में हिचकती नहीं है. एक शताब्दी से भी अधिक पहले मोहनदास गांधी ने सामाजिक व राजनीतिक संदर्भ में इसे ही ‘वेश्यावृत्ति’ कहा था.

जब भाजपा यह गंदा खेल खेल चुकी, तो सबसे पहले दलित राजनीति की सूखी हड्डी चूसने में लगी मायावती का बयान अाया कि अगर विपक्ष भी किसी दलित को ही अपना उम्मीदवार घोषित नहीं करता है, तो उनकी पार्टी भाजपा का ही समर्थन करेगी. अब वही मायावती उसी भाजपा को मजबूत बनाने की धमकी देती हैं, क्योंकि दलितों का मानमर्दन करने से ही अब सत्ता की निकटता पायी जा सकती है. नरेंद्र मोदी ऐसी राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं. उन्हें पता था कि कोविंद-गुगली के अागे टिक सकनेवाला कोई बल्लेबाज सोनिया-एकादश में नहीं है. विपक्ष के पास न शक्ति बची है अौर न सत्व, अौर उसका मुकाबला मोदी-मायावती से एक साथ हो गया, तो उसने हथियार डाल देने में ही खैर समझी! इसलिए मोदी के दलित के सामने सोनिया का दलित खड़ा कर दिया गया! मीरा कुमार के पास इसके अलावा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है कि वे दलित-नेता जगजीवन राम की बेटी हैं!

अब तसवीर यह बनी कि मोदी के दलित से सोनिया के दलित की हार अटल है. यह हार इसलिए होगी कि विपक्ष के पास लड़ने का कलेजा ही नहीं है. यदि कलेजा हो, तो लड़ कर हारना, हमेशा ही बिना लड़े हार जाने से बेहतर होता है. मोदी-मायावती के दलित से बगैर डरे यदि विपक्ष ने अपना योग्य उम्मीदवार खोजा व खड़ा किया होता, तो उसकी पराजय में भी सत्व की जीत तो होती! दलित समाज से ही खोजा होता, तो भी कई योग्य उम्मीदवार मिल जाते जो कम-से-कम ‘दलित’ तो होते! कोविंद हों कि मीरा कुमार, ये दोनों इस दुर्घटना के अलावा किसी कोने से दलित नहीं हैं कि इनका जन्म दलित परिवार में हुअा है. जन्मना श्रेष्ठता का सिद्धांत यदि सवर्णों के लिए गलत है, तो दलितों के लिए भी गलत है. कोविंद अौर मीरा कुमार दोनों ही उस ‘क्रीमी लेयर’ के प्रथम ‘लेयर’ में अाते हैं, जिन्हें अारक्षण की सुविधा से वंचित करने की सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय ने कर रखी है.

देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में महात्मा गांधी ने किसी राजेंद्र प्रसाद की नहीं, किसी दलित लड़की की कल्पना की थी. मतलब साफ था, वे दूसरों की राजनीतिक चालों, विद्वता की डिग्रियों अौर पदों के जंगलों में ‘अपनी वह बेटी’ नहीं तलाश रहे थे. वे तो चारित्र्य को ही कसौटी बना रहे थे, जिसमें वे अपने दलित समाज को निर्विवाद रूप से बाकी समाज से श्रेष्ठ पाते व मानते अाये थे. हम याद रखें कि आंबेडकर अादि जैसे पेशेवर दलित राजनीतिज्ञों द्वारा की जा रही अपनी लगातार ‘चारित्र्य-हत्या’ के बीच भी अपनी दलित बेटी की बात कहने का नैतिक साहस उनमें था. विपक्ष ने यदि उम्मीदवार की योग्यता को अपने चयन का अाधार बनाया होता, तो वह चुनाव तो हारता, लेकिन मौका जीत जाता. यहां तो उसने दोनों तरह की हार कबूल कर ली है. संविधान राष्ट्रपति की कल्पना ऐसे व्यक्ति के रूप में करता है, जो सत्ता के खेल में शामिल नहीं है, जिसके चारित्र्य, ज्ञान अौर गरिमा का देश कायल है. जो पक्ष-विपक्ष की सत्तालोलुपता के बीच तटस्थता से राष्ट्र-प्रमुख की भूमिका निभा सकता है. कोविंद हों कि मीरा कुमार, हम इनकी जाति भर याद रख सकते हैं, क्योंकि इन्होंने लोकतंत्र का ककहरा तो पढ़ा ही नहीं है.

कुमार प्रशांत

गांधीवादी विचारक

k.prashantji@gmail.com

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