Cyclone: नवंबर 2013 में भी एकसाथ आए थे हेलेन और लेहर, आखिर बंगाल की खाड़ी में एक के बाद एक क्यों बनते हैं चक्रवात?
चक्रवात की सांकेतिक तस्वीर (PC : AI)
बंगाल की खाड़ी में एक चक्रवात के गुजरने के कुछ ही दिनों बाद दूसरा तूफान विकसित हो गया. पहले चक्रवात अर्नब ने आंध्र प्रदेश के तट पर दस्तक दी और अब मुरासु ने इसी क्षेत्र की ओर रुख किया. अर्नब के कारण तटीय इलाकों में पेड़ उखड़े, घरों और फसलों को नुकसान पहुंचा तथा बिजली और परिवहन सेवाएं प्रभावित हुईं. ऐसे में मुरासु को लेकर भी लोगों की चिंता बढ़ गई है.
अर्नब के खत्म होते ही मुरासू ने दस्तक दे दी. सवाल है कि आखिर एक तूफान के गुजरने के बाद दूसरा चक्रवात इतनी जल्दी कैसे बन जाता है? क्या समुद्र का बढ़ता तापमान इसकी वजह है या Madden-Julian Oscillation (MJO) जैसी मौसमी गतिविधियां इसके लिए जिम्मेदार हैं? दरअसल, चक्रवात बनने के लिए समुद्र का गर्म होना ही काफी नहीं है. इसके लिए हवा, नमी और वायुमंडल की कई परिस्थितियों का एक साथ अनुकूल होना जरूरी है.
2013 में भी आए थे हेलेन और लेहर
बंगाल की खाड़ी में एक के बाद एक चक्रवात बनने का यह पहला मामला नहीं है. नवंबर 2013 में भी हेलेन और लेहर नाम के दो चक्रवाती तूफान लगभग लगातार विकसित हुए थे.
IMD की 2013 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, चक्रवात हेलेन 19 नवंबर को डिप्रेशन बना और 20 नवंबर को चक्रवाती तूफान में बदल गया. 22 नवंबर को इसने आंध्र प्रदेश के तट पर दस्तक दी. उस समय हवा की रफ्तार 80 से 90 किलोमीटर प्रति घंटे थी.
इसके ठीक अगले दिन यानी 23 नवंबर की शाम दक्षिण अंडमान सागर में लेहर का डिप्रेशन बना. 24 नवंबर को यह चक्रवाती तूफान में बदल गया और 26 नवंबर को बहुत गंभीर चक्रवाती तूफान बन गया. हालांकि, 28 नवंबर को आंध्र प्रदेश के तट के पास पहुंचने से पहले यह कमजोर होकर डिप्रेशन रह गया. दिसंबर 2013 में माडी नाम का एक और चक्रवात भी विकसित हुआ था.
साल 2020 में भी ऐसा ही हुआ था. चक्रवात निवार 25-26 नवंबर की रात तमिलनाडु और पुडुचेरी के तट से टकराया था. इसके कुछ दिन बाद बंगाल की खाड़ी में नया कम दबाव का क्षेत्र बना, जो 1 दिसंबर को चक्रवात बुरेवी में बदल गया.
एक तूफान के बाद दूसरा कैसे बन जाता है?
अक्टूबर और नवंबर उत्तर हिंद महासागर में चक्रवात बनने के लिहाज से सक्रिय महीने होते हैं. इस दौरान बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के क्षेत्र विकसित हो सकते हैं. अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर ये पहले डिप्रेशन और फिर चक्रवाती तूफान में बदल जाते हैं.
अर्नब के गुजरने के बाद भी समुद्र और वातावरण में चक्रवात बनने की परिस्थितियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई थीं. 31 अक्टूबर को दक्षिण-पूर्वी बंगाल की खाड़ी और आसपास के अंडमान क्षेत्र में कम दबाव का क्षेत्र बना. यह धीरे-धीरे मजबूत हुआ और आगे चलकर मुरासु में बदल गया.
इसके पीछे चार प्रमुख कारण हो सकते हैं.
1. समुद्र का गर्म पानी देता है चक्रवात को ताकत
समुद्र की सतह का तापमान चक्रवात बनने में अहम भूमिका निभाता है. गर्म पानी से ज्यादा वाष्पीकरण होता है. इससे हवा में नमी बढ़ती है और बादल बनते हैं. जब यह नमी ऊपर जाकर संघनित होती है, तो गर्मी निकलती है. यही ऊर्जा चक्रवात को मजबूत बनाने में मदद करती है.
2. MJO से बढ़ सकती है बादलों और बारिश की गतिविधि
Madden-Julian Oscillation यानी MJO उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादलों, बारिश और हवाओं से जुड़ी एक मौसमी गतिविधि है. यह पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ती है. जब इसका प्रभाव बंगाल की खाड़ी के लिए अनुकूल होता है, तो वहां बादल बनने और बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं. इससे कम दबाव का क्षेत्र मजबूत होने में मदद मिल सकती है.
हालांकि, हर चक्रवात के पीछे MJO की भूमिका हो, यह जरूरी नहीं है. मुरासु के मामले में भी IMD के उपलब्ध बुलेटिन से इसकी सीधी पुष्टि नहीं होती.
3. ऊंचाई पर तेज हवाओं का कम अंतर
इसे विंड शियर (Vertical Wind Shear) कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो समुद्र के पास और आसमान की ऊपरी परतों में चलने वाली हवाओं की दिशा और रफ्तार में बहुत ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए. कम विंड शियर होने पर चक्रवात की संरचना बनी रह सकती है और वह मजबूत हो सकता है.
4. वातावरण में पर्याप्त नमी
चक्रवात को लगातार ऊर्जा और नमी की जरूरत होती है. अगर समुद्र से नमी मिलती रहे और वातावरण भी अनुकूल हो, तो एक तूफान के गुजरने के बाद उसी क्षेत्र में नया सिस्टम विकसित हो सकता है.
अर्नब और मुरासु में कितना अंतर है?
दोनों चक्रवात बंगाल की खाड़ी में विकसित हुए और आंध्र प्रदेश के तट की ओर बढ़े. हालांकि, इनकी तीव्रता और हवा की रफ्तार अलग-अलग रही.
| तुलना का आधार | चक्रवात अर्नब | चक्रवात मुरासु |
| विकास | 25 अक्टूबर 2026 | 31 अक्टूबर 2026 को डिप्रेशन |
| लैंडफॉल/तट पार | 28 अक्टूबर | 2-3 नवंबर के बीच अनुमान |
| श्रेणी | बहुत गंभीर चक्रवाती तूफान | गंभीर चक्रवाती तूफान |
| हवा की रफ्तार | करीब 130 Kmph | 100-110 Kmph अनुमानित |
| प्रभावित क्षेत्र | आंध्र प्रदेश और आसपास के तटीय इलाके | आंध्र प्रदेश और आसपास के राज्य |
नासा अर्थ ऑब्जर्वेटरी की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, अर्नब के तट पार करते समय हवा की रफ्तार करीब 130 किलोमीटर प्रति घंटे थी. वहीं, IMD ने मुरासु के लिए 100 से 110 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने और झोंकों के 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंचने का अनुमान जताया था.
इसलिए शुरुआती आंकड़ों के आधार पर अर्नब की लैंडफॉल के समय की हवा मुरासु की अनुमानित रफ्तार से तेज थी. मुरासु की वास्तविक तीव्रता का आकलन तट पार करने के बाद ही किया जा सकता है.
मुरासु से किन राज्यों में बारिश का अनुमान?
IMD के 1 नवंबर के पूर्वानुमान के अनुसार, मुरासु के प्रभाव से कई राज्यों में भारी बारिश हो सकती है.
- तटीय आंध्र प्रदेश: 2 और 3 नवंबर.
- रायलसीमा: 2 और 3 नवंबर.
- तेलंगाना: 2 और 3 नवंबर.
- तमिलनाडु: 1 और 2 नवंबर.
- छत्तीसगढ़: 3 और 4 नवंबर.
- दक्षिण ओडिशा: 3 और 4 नवंबर.
तटीय आंध्र प्रदेश और यानम में कुछ स्थानों पर अत्यंत भारी बारिश की आशंका भी जताई गई थी.
क्या मुरासु, अर्नब से ज्यादा खतरनाक होगा?
फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर मुरासु को अर्नब से ज्यादा ताकतवर बताना सही नहीं होगा. अर्नब के तट पार करने के समय हवा की रफ्तार करीब 130 किलोमीटर प्रति घंटे थी, जबकि मुरासु के लिए 100 से 110 किलोमीटर प्रति घंटे का अनुमान था.
हालांकि, चक्रवात से होने वाला नुकसान केवल हवा की रफ्तार पर निर्भर नहीं करता. बारिश की मात्रा, समुद्र में उठने वाली लहरें, तूफान की दिशा और प्रभावित इलाके की आबादी भी नुकसान तय करती है. इसलिए मुरासु के वास्तविक असर का पता उसके तट पार करने के बाद ही चलेगा.
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