One Nation, One Time : इस नये कानून से देश को मिलेगी समय सुरक्षा

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देश आजादी के बाद से ही भारतीय मानक समय पर चल रहा है, फिर सरकार को एक राष्ट्र,एक समय को कानून का रूप देने की जरूरत क्यों पड़ी! नये लीगल मेट्रोलॉजी नियमों के तहत डिजिटल वित्तीय लेन-देन,टेलीकॉम सेवाएं कैसे बदलेंगी? पूर्वोत्तर में जल्द होनेवाली सुबह और पश्चिम में देर से ढलते सूरज के बीच, यह एकीकृत कानून देश के हर कोने में कैसे तालमेल बिठायेगा? ऐसे विभिन्न सवालों के जवाब जानें टाइम एंड फ्रीक्वेंसी मेट्रोलॉजी डिवीजन, सीएसआईआर-एनपीएल के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष डॉ आशीष अग्रवाल से ...

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केंद्र ने 27 अगस्त, 2026 को विधिक माप विज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है. इसके मुख्य प्रावधान हैं-

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  • इसके तहत देश भर में सभी प्रशासनिक, कानूनी, वाणिज्यिक, वित्तीय और आधिकारिक कार्यों के लिए भारतीय मानक समय को एकमात्र प्रामाणिक समय मानक बनाया गया है.
  • यह नियम राजपत्र में प्रकाशन के 180 दिनों के बाद लागू होंगे. इस अवधि का उपयोग विभिन्न सरकारी विभागों, बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों, पावर ग्रिड और निजी संस्थानों द्वारा अपने डिजिटल क्लॉक सिस्टम को अपडेट करने के लिए किया जायेगा.
  • इसके कार्यान्वयन और सुचारु संचालन के लिए भारत सरकार ने बहु-स्तरीय ढांचा तैयार किया है, जिसमें सीएसआईआर-एनपीएल, मानक प्रयोगशालाएं (आरआरएसएल) और इसरो का नाविक अहम भूमिका में हैं.

क्यों पड़ी एक देश, एक समय कानून की जरूरत !

केंद्र सरकार की ओर से अधिसूचित 'विधिक माप विज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 की जरूरत देश को क्यों पड़ी, इसे समझने के लिए शुरुआत जीपीएस सिस्टम से करनी होगी, जिसका इस्तेमाल अभी तक हम करते आये हैं, लेकिन अब आगे नहीं करेंगे. ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) उपग्रहों का एक ऐसा समूह है, जिसमें एटॉमिक क्लॉक्स (परमाणु घड़ियां) लगी होती हैं और जिसे पूरी तरह से अमेरिका नियंत्रित करता है. कारगिल युद्ध के दौरान एन्क्रिप्टेड मिलिट्री-ग्रेड जीपीएस डेटा की अनुपलब्धता ने देश की अपनी संप्रभु समय प्रणाली की रणनीतिक आवश्यकता को रेखांकित किया था. इसके बाद भारत ने यह तय किया कि देश का अपना संप्रभु समय और नेविगेशन सिस्टम होना चाहिए, ताकि हमें किसी अन्य देश पर निर्भर न रहना पड़े.

जीपीएस पर निर्भरता होगी समाप्त

जीपीएस पर निर्भरता को खत्म करने के लिए, भारत ने सीएसआईआर-एनपीएल (नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी) में एटॉमिक क्लॉक्स (परमाणु घड़ियां) स्थापित कीं. इसके बाद देश के पांच शहरों में रीजनल रेफरेंस स्टैंडर्ड्स लेबोरेटरीज (आरआरएसएल) बनाकर वहां भी एटॉमिक क्लॉक्स लगायी गयीं और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेसेबल (यूटीसी) से सिंक किया गया. इस पूरी व्यवस्था से भारतीय मानक समय (आईएसटी) के प्रसार का एक मजबूत राष्ट्रीय तंत्र तैयार किया गया. इसका मुख्य उद्देश्य था कि देश को यूएस के जीपीएस पर निर्भर न रहना पड़े. इसलिए देश के सभी टेलीकॉम ऑपरेटर जैसे एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया, जियो आदि और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) जैसी वित्तीय संस्थाओं, जो पहले समय के सिंक्रोनाइजेशन के लिए जीपीएस का उपयोग करती थीं, अब उन्हें सीएसआईआर-एनपीएल और पांचों आरआरएसएल से ही आधिकारिक आईएसटी समय प्राप्त करने के निर्देश दिये गये हैं.

देश का अपना 'लीगल टाइम' ढांचा होगा

व्यावहारिक रूप से भारत में पहली बार 'लीगल टाइम' (कानूनी समय) का ढांचा तैयार किया गया है. अब तक ऐसा कोई नियम न होने के कारण एजेंसियां और कंपनियां किसी भी स्रोत, जैसे जीपीएस से समय लेने के लिए स्वतंत्र थीं. अब नये नियम के मुताबिक सभी प्रणालियों को केवल 'भारतीय मानक समय' से ही सिंक किया जायेगा. इसके लिए कंपनियों को समय सीमा दी गयी है, ताकि वे अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकें और जीपीएस या अन्य विदेशी स्रोतों पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त कर केवल अधिकृत आईएसटी से ही समय लें. मुख्य रूप से यही बड़ा नीतिगत बदलाव है. साइबर फॉरेंसिक्स और साइबर सुरक्षा दोनों के लिए टाइम स्टैम्पिंग यानी 'व्हाइट रैबिट, जो ऑप्टिकल फाइबर के जरिये 1 नैनोसेकंड से भी कम (सब-नैनोसेकेंड) की समय-सटीकता प्रदान करता है और पीटीपी (प्रेसिजन टाइम प्रोटोकॉल), एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस ने सभी टेलीकॉम कंपनियों और डेटा सेंटर ऑपरेटर्स के लिए टाइम स्टैम्पिंग का नियम अनिवार्य किया है, ताकि पूरा नेटवर्क सिस्टम एक ही सटीक समय से सिंक्रनाइज रहे.

आइएसटी का वैश्विक सिंक्रोनाइजेशन

भारत ने अपने 'भारतीय मानक समय' को पूरी तरह आत्मनिर्भर और सटीक बनाने के लिए वैश्विक मानक कॉर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम (यूटीसी) के साथ सफलतापूर्वक सिंक कर लिया है. फ्रांस स्थित अंतरराष्ट्रीय संस्था 'बीआईपीएम' (इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ वेट्स एंड मेजर्स) और भारत की सीएसआईआर-एनपीएल के सहयोग से यह 'ट्रेसेबिलिटी' स्थापित की गयी है. पूरी दुनिया की परमाणु घड़ियां नैनो सेकेंड के स्तर पर एक साथ ही चलती हैं. विभिन्न देशों के समय में अंतर केवल उनकी भौगोलिक स्थिति (अक्षांश और देशांतर) के 'टाइम जोन' के कारण होता है, भारत का मानक समय यूटीसी से 5:30 घंटे आगे है, जो कि एक निश्चित और स्थिर अंतर है. भारत ने एनपीएल के माध्यम से जो भारतीय मानक समय जनरेट किया, उसे यूटीसी के साथ ट्रेसेबल और सिंक किया गया है. इस सिंक्रोनाइजेशन के बाद अत्यंत उच्च नैनो-सेकंड सटीकता के साथ भारत के समय का वैश्विक संदर्भ अब आधिकारिक तौर पर यूटीसी ही है.

स्वदेशी जीपीएस का दायरा बढ़ेगा

दैनिक जीवन में कुछ सेकेंड का अंतर भले प्रभाव न डाले, लेकिन आधुनिक डिजिटल और सामरिक प्रणालियों के संचालन के लिए नैनोसेकेंड से लेकर मिलीसेकेंड स्तर की समय-सटीकता अनिवार्य है. कोई व्यक्ति जब कार से यात्रा करते हुए फोन पर बात करता है, तो उसकी कॉल बिना कटे एक टावर से दूसरे टावर पर 'हैंडओवर' होती है. यदि ये सभी टावर नैनोसेकंड स्तर पर आपस में सिंक न हों, तो कॉल तुरंत ड्रॉप हो जायेगी. टेलीकॉम और 5जी नेटवर्क में बिना कॉल ड्रॉप के टावर बदलने, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में हाइ-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग और त्वरित शेयर खरीद-बिक्री के लिए नैनोसेकेंड स्तर का सिंक्रोनाइजेशन जरूरी है. भारत ने अपना स्वयं का सेटेलाइट नेविगेशन सिस्टम भी विकसित किया है, जिसे नाविक नाम दिया गया है, इसे भारत का स्वदेशी जीपीएस कहा जा सकता है. उपग्रहों के माध्यम से सटीक लोकेशन और समय प्रदान करने के लिए नाविक सिस्टम को नैनोसेकेंड स्तर की उच्चतम समय-सटीकता की आवश्यकता होती है. इसी टाइम एक्यूरेसी के आधार पर हमारा नाविक सिस्टम संचालित होता है. आज नाविक के माध्यम से देश के सैन्य उपकरण, रडार नेटवर्क और नेशनल पावर ग्रिड आपस में सिंक हो रहे हैं. इसके अतिरिक्त, नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर एवं सरकारी व निजी क्षेत्रों के जितने भी कंप्यूटर डेटा सेंटर्स हैं, वे भी अपनी प्रणालियों और रिकॉर्ड्स को सुरक्षित व सुचारू बनाये रखने के लिए इसी सटीक टाइम-सिंक्रोनाइजेशन का उपयोग कर रहे हैं.

बनेगा डिजिटल इंडिया का सुरक्षा कवच

साइबर फॉरेंसिक्स, राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और डिजिटल इंडिया के पूरे ढांचे के लिए मिलीसेकेंड और माइक्रोसेकेंड स्तर की समय-सटीकता अत्यंत आवश्यक है. किसी भी संदिग्ध डिजिटल गतिविधि, कॉल या वेब पोर्टल एक्सेस के सटीक समय का रिकॉर्ड रखकर ही साइबर अपराधियों को ट्रेस करना संभव हो पाता है. इसीलिए दूरसंचार विभाग ने सभी टेलीकॉम ऑपरेटर्स और ऑप्टिकल फाइबर डेटा सेंटर्स के लिए इसे लागू करना अनिवार्य किया है. इस संवेदनशील प्रणाली की निर्बाध उपलब्धता (24/7) सुनिश्चित करने के लिए सीएसआईआर-एनपीएल, दिल्ली के अलावा बेंगलुरु में एक मजबूत 'डिजास्टर रिकवरी' बैकअप केंद्र भी स्थापित किया गया है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में देश का टाइम-सिंक्रोनाइजेशन प्रभावित न हो.

पूर्वोत्तर के लिए भी यह बेहतर

पूर्वोत्तर राज्यों में देश के बाकी हिस्सों की तुलना में सूर्योदय और सूर्यास्त में लगभग 2 घंटे का अंतर होता है. इसे देखते हुए सीएसआईआर-एनपीएल ने पहले दो टाइम जोन का प्रस्ताव दिया था. लेकिन, गहराई से अध्ययन करने के बाद सरकार, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं ने पाया कि दो टाइम जोन लागू करने से लाभ कम और व्यावहारिक समस्याएं अधिक होंगी. प्रशासनिक सुगमता, राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के लिए भारत में 'एकल टाइम जोन' ही सर्वोपरि है. इसके समाधान के रूप में राज्यों को अपनी भौगोलिक स्थिति के अनुसार कार्यालयों और स्कूलों का समय तय करने की छूट दी गयी है. एक ही देश में दो अलग-अलग टाइम जोन होने से रेलवे, विमानन और संचार तंत्र के संचालन में भारी भ्रम और दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है. यही वजह है कि चीन, जिसका भौगोलिक दायरा अत्यंत विशाल है, ने भी प्रशासनिक सुगमता के लिए पूरे देश में केवल एक ही आधिकारिक टाइम जोन लागू कर रखा है.

भारत तकनीकी रूप से पूरी तरह तैयार

भारत का नया आइएसटी इंफ्रास्ट्रक्चर वैश्विक मानकों के समकक्ष पूरी तरह आत्मनिर्भर और सुरक्षित हो चुका है. सीएसआईआर-एनपीएल ने 2.6 नैनोसेकंड की असाधारण समय-सटीकता हासिल की है और वैश्विक समय निर्धारण में भारत का योगदान 4 से 5 प्रतिशत हो गया है. मल्टीपल बैकअप के कारण यह सिस्टम 'सिंगल प्वॉइंट फेलियर' से मुक्त है, जिससे किसी भी आपदा में देश का टाइम-सिस्टम कभी प्रभावित नहीं होगा. टेलीकॉम ऑपरेटर्स को अब जीपीएस की बजाय भारतीय मानक समय से समय (टाइम-सिंक्रोनाइजेशन) लेना होगा. इसके लिए उन्हें अपने सेटेलाइट रिसीवर्स और नेटवर्क को 'नाविक' या 5 क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं (आरआरएसएल) के ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से सिंक करना अनिवार्य है. इस बदलाव के लिए 8 जून 2025 को नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी की अध्यक्षता में आयोजित राउंड टेबल बैठक में टेलीकॉम ऑपरेटर्स को सूचित कर उन्हें 6 महीने का अतिरिक्त समय दिया गया. वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण से भारत पूरे देश को नैनोसेकेंड स्तर की सटीकता के साथ समय प्रदान करने के लिए 100 प्रतिशत तैयार है और अब इसमें कोई तकनीकी बाधा नहीं है.

यहां दिखेगा असर

विदेशी जीपीएस के उपयोग की जगह अब सीएसआइआर-एनपीएल के एटॉमिक क्लॉक और भारत के अपने नाविक उपग्रह नेटवर्क से जोड़कर सटीक समय प्रसारित किया जायेगा. इस बदलाव के मुख्य प्रभाव इन क्षेत्रों में दिखेंगे

  • विदेशी जीपीएस पर निर्भरता खत्म होगी. किसी भी युद्ध या साइबर हमले के दौरान विदेशी एजेंसियों द्वारा जीपीएस सिग्नल बंद या खराब करने का जोखिम खत्म हो जायेगा.
  • 5जी/ 6जी नेटवर्क, डाटा ट्रांसफर और सर्वर सिंक्रोनाइजेशन बेहद सटीक समय पर निर्भर करते हैं. इससे इंटरनेट और कॉल की गुणवत्ता बेहतर होगी.
  • बिजली ग्रिडों की फ्रीक्वेंसी मैचिंग और रेलवे-हवाई यातायात के समय प्रबंधन में त्रुटि शून्य के बराबर हो जायेगी. समान टाइम-स्टैम्प मिलने से साइबर अपराधों की डिजिटल फोरेंसिक जांच अधिक सटीक और तेज हो जायेगी.
  • बैंकिंग, यूपीआइ और स्टॉक एक्सचेंज में नैनोसेकंड का अंतर भी बड़ी वित्तीय गड़बड़ी का कारण बनता है. सटीक एक समान समय से डिजिटल धोखाधड़ी की दर घटेगी.
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