हिंदुत्व व विकास के सहारे 2019 फतह की तैयारी में भाजपा

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नयी दिल्ली : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री के लिए किसी योग्य व्यक्ति का चयन काफी चुनौतीपूर्ण काम रहा है. पिछले 14 वर्षों से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर रहने और इस चुनाव में जनता से मिले अपार जनसमर्थन के कारण जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का […]

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नयी दिल्ली : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री के लिए किसी योग्य व्यक्ति का चयन काफी चुनौतीपूर्ण काम रहा है. पिछले 14 वर्षों से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर रहने और इस चुनाव में जनता से मिले अपार जनसमर्थन के कारण जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का दबाव भी भाजपा के उपर है, जिसके कारण भी सीएम पद के लिए नेता के चुनाव में थोड़ा विलंब हुआ है. दूसरा पार्टी में ऐसा कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं था, जिसकी स्वीकार्यता हो. पार्टी के कई कद्दावर नेता केंद्रीय राजनीति में सक्रिय है.

राजनाथ सिंह केंद्रीय गृह मंत्री हैं, तो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल. ऐसी स्थिति में पार्टी को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने के साथ ही मोदी के विकास पुरुष की छवि को मजबूत कर सके. साथ ही यह चेहरा समाज के विभिन्न वर्गों को स्वीकार्य भी हो. ऐसे में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदारों को दरकिनार कर योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गयी. हालांकि इस पसंद को लेकर कई तरह के कयास भी लगाये जा रहे हैं. इस पसंद पर यह भी बहस छिड़ी है कि क्या यह प्रधानमंत्री मोदी का नेचुरल पसंद है या फिर संघ का.

सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की पहली पसंद आदित्यनाथ नहीं थे, लेकिन संघ और विश्व हिंदू परिषद के दबाव में भाजपा को योगी का चयन करना पड़ा. मोदी और शाह की पहली पसंद मनोज सिन्हा ही थे. इसके पक्ष में अलग-अलग कारण बताये जा रहे हैं. एक वर्ग जहां यह बताता है कि मनोज सिन्हा को हरी झंडी मिल गयी थी, उसके बाद ही उन्होंने बनारस में पूजा-पाठ किया. लेकिन, जैसे ही इसकी भनक योगी समर्थकों को लगी, उन्होंने नारेबाजी शुरू कर दी. दूसरा वर्ग का यह कहना है कि पिछले हफ्ते मुंबई में आरएसएस के भैयाजी जोशी और अमित शाह के बीच हुई मुलाकात में योगी के नाम पर सहमति बनी. साल भर पहले गोरखपुर में आरएसएस के बड़े नेताओं की मौजूदगी में योगी को सीएम बनाने का फैसला लिया गया था. इतना ही नहीं यूपी में जब चुनाव पूर्व सीएम पद के नाम उजागर करने पर चर्चा हुई थी, तो उसमें भी योगी का नाम ही आया था. लेकिन सवाल यह भी उठता है कि यदि योगी को ही सीएम बनाया जाना था, तो उनके चाहने वाले इतने अधीर क्यों हो रहे थे, क्या उनको योगी शांत नहीं कर सकते थे. वहीं एक वर्ग का यह मानना है कि अंतिम समय में योगी के नाम का फैसला किया गया. इसके कई कारण बताये जा रहे हैं.

योगी की छवि एक सख्त और उग्र हिंदूवादी नेता की रही है. 2019 के चुनाव को देखते हुए पार्टी हिंदुत्व के साथ विकास को प्राथमिकता देकर समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़े रखना चाहती है. यही नहीं राज्य की कानून-व्यवस्था को बेहतर कर मोदी के विकास एजेंडे के मिश्रण को भुनाने के लिए योगी से बेहतर पार्टी में कोई दूसरा नेता नहीं हो सकता था. योगी को मुख्यमंत्री बनाने से स्पष्ट है कि पार्टी 2019 में ध्रुवीकरण के साथ ही विकास को लेकर मैदान में उतरेगी. ध्रुवीकरण से जातीय बंधन कमजोर हो जाते हैं और दिल्ली की सत्ता के लिए उत्तर प्रदेश काफी मायने रखता है. इसके साथ ही योगी की उम्र को देखते हुए इसे भविष्य के नेता के रूप में गढ़ने में भी सफलता मिलेगी. मोदी के बाद संघ को कोई वैसा नेता अभी नहीं दिख रहा है, जो हिंदुत्व के मुद्दे पर जनता को एक कर सके.

जानकारों का कहना है कि नोटबंदी के बाद योगी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंप मोदी ने दूसरा बड़ा दावं खेला है. इसके खतरे भी हैं और योगी को कमान सौंपने के बाद बिखरे विपक्ष के एकजुट होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है. गुजरात का मुख्यमंत्री बनाये जाने के समय मोदी की छवि भी उग्र हिंदूवादी नेता की थी, लेकिन सत्ता मिलने के बाद विकास को प्राथमिकता देकर उन्होंने अपनी छवि विकास पुरुष की बना ली. अब भाजपा योगी की उग्र हिंदुत्व की छवि और मोदी के विकास पुरुष की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर दोहराने की कोशिश कर रही है. इससे संबंधित एक सवाल के जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि योगी विधायकों की पहली पसंद थे, इसीलिए उनके नाम का प्रस्ताव रखा गया.

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