गणतंत्र दिवस पर परेड स्थगित करने की सिफारिश सेना ने की थी!

Updated at : 30 Jun 2014 9:31 AM (IST)
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गणतंत्र दिवस पर परेड स्थगित करने की सिफारिश सेना ने की थी!

नयी दिल्ली:सेना ने 1972 में गणतंत्र दिवस की परेड को रद्द करने की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग में भारतीय सेना की शानदार जीत का उत्सव मनाना चाहती थीं. सेना के करिश्माई प्रभाव वाले अधिकारी फील्ड मार्शल सैम मानेकशा पर लिखी एक पुस्तक में ऐसे कई […]

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नयी दिल्ली:सेना ने 1972 में गणतंत्र दिवस की परेड को रद्द करने की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग में भारतीय सेना की शानदार जीत का उत्सव मनाना चाहती थीं.

सेना के करिश्माई प्रभाव वाले अधिकारी फील्ड मार्शल सैम मानेकशा पर लिखी एक पुस्तक में ऐसे कई किस्सों का उल्लेख है. सेना में लंबे समय तक मानेकशा के सहयोगी रहे ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) बेहराम पांथाकी और उनकी पत्नी जेनोबिया ने नयी किताब ‘फील्ड मार्शल सैम मानेकशा : द मैन एंड हिज टाइम्स’ लिखी है. देश में 1971 के युद्ध में जीत के बाद उल्लास का माहौल था. किताब में लिखा गया है, ‘भारतीय सेना ने खुद को साबित कर दिया था और 1962 में चीन से मिली हार के बादल छंट गये थे.

सेना की इकाइयों के अग्रिम क्षेत्रों में ही रहने के कारण सेना मुख्यालय ने सिफारिश की थी कि उस साल गणतंत्र दिवस परेड रद्द कर दी जाये, लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जश्न मनाना चाहती थीं. भारत की जीत का जश्न मनाना था और श्रद्धांजलि भी अर्पित करनी थी.’ पुस्तक में जिक्र मिलता है कि अल्पकालिक नोटिस पर इंडिया गेट के नीचे अमर जवान ज्योति प्रज्ज्वलित की गयी. 26 जनवरी, 1972 को परेड शुरु होने से पहले इंदिरा गांधी खुली जीप में राजपथ पहुंचीं, जिसके बाद शहीदों को श्रद्धांजलि देने तीनों सेनाओं के प्रमुख वहां पहुंचे. इसके बाद संक्षिप्त रूप में परेड निकाली गयी.

बाबूजी ने किया था विरोध
लेखकों के मुताबिक, इंदिरा गांधी 1972 में गणतंत्र दिवस के दिन मानेकशा को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त करने पर विचार कर रहीं थीं, लेकिन रक्षा मंत्री जगजीवन राम के नेतृत्व में कांग्रेस के नेताओं और एयर चीफ मार्शल पीसी लाल ने इस कदम का विरोध किया. पुस्तक के अनुसार, ‘इस प्रस्ताव को वापस ले लिया गया.’ नियोगी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक मानेकशा से जुड़ी घटनाओं पर आधारित है, जिन्होंने उपमहाद्वीप का नक्शे को बदला था. उन्होंने इसे तसवीरों, उल्लेखों, जानकारियों और निजी संदेशों से परिपूर्ण बनाया, जो मानेकशा के चरित्र, उनके हास्यबोध, नैतिक और पेशेवर साहस, ईमानदारी, विनम्रता तथा जवानों के प्रति सम्मान को दर्शाता है.

घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए नेहरू को मना लिया था सरदार
किताब बयां करती है कि जब 1947 में पाकिस्तानी घुसपैठिये घाटी की ओर बढ़ रहे थे, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सेना को कश्मीर भेजने के बारे में संयुक्त राष्ट्र से परामर्श लेना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें सैनिकों को भेजने का आदेश देने के लिए मना लिया. घटनाक्रम के अनुसार, सरदार ने प्रधानमंत्री से पूछा, ‘जवाहर तुम कश्मीर चाहते हो या उसे अपने हाथ से जाने देना चाहते हो? इस पर जब नेहरू ने सख्त लहजे में जवाब दिया, ‘जाहिर है, मैं कश्मीर चाहता हूं.’

तो सरदार पटेल सैम मानेकशा की ओर मुखातिब हुए और कहा, ‘आपको मार्चिग आदेश मिल गया है.’ 26 अक्तूबर को पूर्वाह्न् 11 बजे दिल्ली के सफदरजंग हवाई अड्डे से वायुसेना के छह और 50 डकोटा विमानों ने उड़ान भरी. एक पखवाड़े तक कुल 800 उडानें संचालित की गयीं. 16 नवंबर तक घाटी से घुसपैठियों को खदेड़ दिया गया था और श्रीनगर तथा हवाई अड्डे को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन शेष कश्मीर में और सीमा के आसपास घुसपैठियों से संघर्ष 14 महीने तक चलता रहा.

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