मोदी ने किया पीएमओ को सशक्त

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-इंटरनेट डेस्क-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में पीएमओ एक बार फिर सशक्त हो गया है. यही कारण है कि पीएमओ ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह, गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू और विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह के निजी सचिवों की नियुक्ति पर रोक लगा दी है. पीएमओ का कहना है कि ऐसा विभागों की कार्रवाई को गोपनीय रखने के लिए किया गया है. अब मंत्रियों को निजी सचिव की नियुक्ति के लिए कैबिनेट की नियुक्ति समिति से सहमति लेनी होगी.

लेकिन गृहमंत्री के निजी सचिव की नियुक्ति पर रोक लगाना या फिर यूं कहें कि उसे टाल देना तभी संभव है, जब पीएमओ की ताकत बढ़ी हो. पिछले दस सालों में पीएमओ का रुतबा काफी घटा था. इसका कारण यह था कि मनमोहन सिंह की सरकार में सत्ता के दो केंद्र थे और वास्तविक शक्ति दस जनपथ सोनिया गांधी में निहित थी. सोनिया और राहुल का फैसला सरकार में अहम होता था ना कि कैबिनेट का फैसला. लेकिन आज वह स्थिति नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आये हैं और इनकी सरकार में सत्ता का केंद्र कहीं और निहित नहीं है. ऐसे में पीएमओ का कद बढ़ना स्वाभाविक है.

पीएमओ का इतिहास
आजादी के बाद जब पंडित जवाहरलाल नेहरु प्रधानमंत्री बने, उस वक्त पीएमओ का रुतबा काफी सीमित था. वह मात्र प्रधानमंत्री का छोटा सा कार्यालय मात्र था. उस वक्त आईसीएस के अधिकारी एचएम पटेल इसका नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन धीरे-धीरे पीएमओ का कद बढ़ने लगा. पंडित नेहरु ने इसके लिए प्रयास भी किये. लालबहादुर शास्त्री के समय भी पीएमओ का कद बढ़ाने के प्रयास किये गये और पीएमओ सरकार का ताकतवर हिस्सा बनता गया.

इंदिरा गांधी ने भी पीएमओ को ताकतवर बनाने के काफी प्रयास किये. जब पहली बार वह प्रधानमंत्री बनीं, उस वक्त एलके झा पीएमओ का कार्य देख रहे थे. 1980 में जब इंदिरा दुबारा सत्ता में आयीं, तब पीसी अलेक्जेंडर पीएमओ के प्रधान बने. उस दौरान पीएमओ एक ऐसी संस्था के रूप में उभरा, जो प्रधामंत्री को उसके कार्यों में सलाह देता था.

राजीव गांधी के शासनकाल में भी पीएमओ का रुतबा काफी बढ़ा और यह टेक्नोक्रेट्स का गढ़ बन गया. पीवी नरसिंह राव के समय में भी पीएमओ ने अपनी ताकत दिखायी. आजादी के बाद से लेकर नरसिंह राव के शासनकाल तक पीएमओ की ताकत काफी बढ़ गयी. यह एक बड़ा कार्यालय बन गया, जहां 300 से ज्यादा लोग कार्यरत हैं. पीएमओ एक तरह से प्रधानमंत्री के लिए वह जरिया बन गया, जिसके जरिये वह अपने मंत्रियों और सरकार के कामकाज पर नजर रख सके.

1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी थी. उस वक्त पीएमओ की ताकत सबसे ज्यादा उभरकर सामने आयी. पीएमओ पर ब्रजेश मिश्र का प्रभुत्व था. उनकी दखल सरकार के हर फैसले पर थी. कारगिल युद्ध और पोखरण-2 जैसे मामलों में भी उनकी प्रभावी भूमिका थी. ऑफ द रिकॉर्ड तो यहां तक कहा जाता है कि ब्रजेश मिश्र के सामने लालकृष्ण आडवाणी की भी नहीं चलती थी. लेकिन जब भाजपा 2004 में लोकसभा का चुनाव हार गयी, तो इस ताकतवर अधिकारी ने पार्टी से अपनी दूरी बना ली.

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