गोपाल दास नीरज स्मृति शेष : लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में...

Updated at : 20 Jul 2018 7:38 AM (IST)
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गोपाल दास नीरज स्मृति शेष : लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में...

हिंदुस्तान में कवि सम्मेलन एक परंपरा का नाम रहा है. महानगरों में रहने वाले युवाओं को शायद उस परंपरा का अंदाजा नहीं होगा. छोटे शहरों और कस्बों में रात-रात भर कवि सम्मेलन और मुशायरे चलते थे. कड़कती ठंड में दरी पर बैठकर लोग सुना करते थे. माइक पर संचालक बारी-बारी से कवियों को आमंत्रित करता […]

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हिंदुस्तान में कवि सम्मेलन एक परंपरा का नाम रहा है. महानगरों में रहने वाले युवाओं को शायद उस परंपरा का अंदाजा नहीं होगा. छोटे शहरों और कस्बों में रात-रात भर कवि सम्मेलन और मुशायरे चलते थे.

कड़कती ठंड में दरी पर बैठकर लोग सुना करते थे. माइक पर संचालक बारी-बारी से कवियों को आमंत्रित करता था. सबसे बड़े कवि को आखिर में बुलाया जाता था.

एक कवि ऐसा था, जिसे आखिर के लिए हमेशा रखा जाता था. वह कवि आता था. खरज भरी आवाज में कविता पाठ शुरू करता था. …और उसके बाद उसे माइक से हटने का मौका नहीं मिलता था. सिलसिला जारी रहता था. घनघोर अंधेरा यह संकेत लेकर आता था कि बहुत जल्दी सूर्योदय होने वाला है. लेकिन, इस कवि को जैसे लोग सुनते ही रहना चाहते थे.

उन्हें मंच से हटने का मौका ही नहीं देना चाहते थे. आप समझ गये होंगे कि गोपाल दास सक्सेना का जिक्र हो रहा है, जिन्हें दुनिया नीरज के नाम से जानती है. इटावा में चार जनवरी 1925 को जन्मे नीरज शायद अपने में ऐसे अकेले कवि या शायर थे, जिनकी एक नज्म या गीत की वजह से फिल्म बन जाती थी. ‘नयी उमर की नयी फसल’ फिल्म में उनकी इसी नज्म का इस्तेमाल हुआ. फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई, लेकिन गीत हिट हो गया.

देवानंद के साथ नीरज के जुड़ने की दास्तान

यह वह दौर था, जब देवानंद, मनोज कुमार या राज कपूर जैसे लोग गीतकारों का बड़ा सम्मान करते थे. देवानंद और मनोज कुमार तो नियमित रूप से कवि सम्मेलन सुनने जाते थे. देवानंद ने इसी तरह नीरज को सुना था. वह वर्ष 1967 था. देवानंद ही थे, जो नीरज को सही मायने में मुंबई लेकर आये थे. नीरज के मुताबिक, देवानंद ने उन्हें बर्मन दा (सचिन देव) से मिलाया. बर्मन दा ने उन्हें एक सिचुएशन दे दी. सिचुएशन एक पार्टी की थी. इसमें एक लड़की है, जो ब्वॉयफ्रेंड को किसी और लड़की के साथ देख रही है. वह दुखी, हताश है. उसे जलन हो रही है. इस पर गाना लिखना है.

एक रात में नीरज ने लिखा था वो यादगार गीत

नीरज अपने होटल लौटे. रात भर में उन्होंने एक गाना लिखा. अगली सुबह देवानंद को सुनाया. देव साहब ने उन्हें गले से लगा लिया और साथ लेकर एसडी बर्मन के पास गये. बर्मन दा से कहा कि देखिए, क्या कमाल का गाना लिखा है.

बर्मन दा ने गाना सुना. बर्मन दा ने देव से कहा कि हां, अब मैंने गाना सुन लिया है. अब आप जाइए. हम दोनों साथ बैठना चाहते हैं. बाद में एसडी बर्मन ने स्वीकार किया कि जानबूझकर इतनी मुश्किल सिचुएशन दी थी. वह गाना था रंगीला रे, तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन…यह गाना लिखने के लिए नीरज कॉलेज से छुट्टी लेकर गये थे. उसके बाद तो देव आनंद, एसडी बर्मन और नीरज की तिकड़ी ने बड़े कमाल किये.

नीरज के लिखे गाने हुए सुपर-डुपर हिट

‘पहचान’ फिल्म का गीत ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं’ और ‘मेरा नाम जोकर’ का ‘ए भाई! ज़रा देख के चलो’ ने नीरज को कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचाया. कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे, ‘कहता है जोकर सारा ज़माना’ जैसे यादगार गीत उन्होंने लिखे. फूलों की बगिया महकेगी.. मेघा छाये आधी रात… लिखे जो खत तुझे.. ए भाई, जरा देख के चलो… आज मदहोश हुआ जाए रे.. हां, मैंने कसम ली… बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं… गाने सुपर डुपर हिट रहे.

उनका यह शेर हर बार मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता था

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