Toxic Review: ‘जब तक सह पाओगी, रह पाओगी’, कहकर कूल बने यश, लेकिन महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई क्यों किया?
टॉक्सिक, फोटो - इंस्टाग्राम
Toxic Review: Yash की फिल्म के intimate scenes और महिलाओं के objectification ने खड़े किए सवाल. थिएटर के reaction से लेकर Kabir Singh और Animal तक, जानिए क्यों फिर बहस में आया male dominance.
“ये देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा.”
फिल्म खत्म होने के बाद थिएटर से बाहर निकलते हुए मेरे मुंह से सबसे पहले यही निकला. मैं ‘Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups’ देखने गई थी. यश की चार साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी थी. फिल्म को लेकर पहले से ही काफी excitement थी. Action, style और Yash का नया अंदाज देखने की उम्मीद थी. लेकिन फिल्म खत्म होने तक मेरे दिमाग में इन सब चीजों से ज्यादा कुछ और रह गया.
फिल्म देखते हुए कई ऐसे scenes आए, जिन्हें देखकर मैं uncomfortable हो गई. खासकर वे scenes, जहां महिलाओं को जिस तरह से present किया गया, वह मुझे परेशान करने लगा. कई जगह मुझे लगा कि महिला किरदार कहानी का हिस्सा कम और sex object ज्यादा नजर आ रहा है.
लेकिन मुझे सबसे ज्यादा uncomfortable सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई दे रही चीज ने नहीं किया.
कुछ scenes के दौरान मेरे आसपास बैठे लड़कों की hooting और सीटियां सुनाई देने लगीं. स्क्रीन पर महिला का शरीर दिख रहा था और थिएटर में उस पर सीटियां बज रही थीं. उस वक्त मेरे मन में सवाल आया कि जिस चीज को देखकर मैं असहज महसूस कर रही हूं, वही चीज कुछ लोगों के लिए entertainment कैसे बन गई?
फिल्म देखते हुए यह feeling लगातार बनी रही.
कहानी शुरू हुए 15 मिनट भी नहीं होते कि एक car scene आता है. Raya एक अनजान लड़की के साथ intimate नजर आता है. इसी intimacy की rhythm को फिल्म एक bomb blast के scene के साथ connect करती है. स्क्रीन पर intimacy और blast को जिस तरह साथ रखा जाता है, वह फिल्म के dark और bold tone को शुरू में ही establish कर देता है.
लेकिन मेरे लिए सवाल यहीं से शुरू हो गया. क्या female sexuality को इस तरह shock value और visual impact पैदा करने के लिए इस्तेमाल करना जरूरी था?
कहानी आगे बढ़ती है. फर्स्ट हाफ में Kiara और Yash के बीच एक ऐसा scene आता है, जो मेरे लिए फिल्म के सबसे uncomfortable moments में से एक था. राया अब कियारा आडवानी के किरदार संग इंटीमेट होना चाहता है, लेकिन एक्ट्रेस का consent नहीं है. Kiara का विरोध साफ है. आखिर में उसका अपनी कलाई काट लेना उसके ‘No means No’ को बेहद कठोर तरीके से सामने रखता है.
यहां मेरे मन में सीधा सवाल आया. जब महिला का ‘No’ इतना साफ है, तो पुरुष की इच्छा को बार-बार इतना बड़ा क्यों बनाया जाता है?
फिल्म आगे बढ़ती है. Second half में Raya दस लड़कियों के साथ intimate नजर आता है. यहां तक आते-आते sexuality सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं लगती. वह Raya के character को powerful, desirable और dominant बनाने का एक visual tool बन जाती है.
जितनी महिलाएं उसके आसपास दिखाई देती हैं, उतना ही उसका ‘alpha’ image मजबूत होता जाता है.
और फिर आता है फिल्म का वह dialogue, जिस पर थिएटर का reaction सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है.
‘जब तक सह पाओगी, रह पाओगी.’
Dialogue खत्म होते ही hall में मौजूद कुछ लड़के सीटियां बजाने लगते हैं. Hooting शुरू हो जाती है. कुछ लड़कियां भी अपनी मुस्कुराहट रोक नहीं पातीं. शायद उस पल उन्हें यह सिर्फ एक ‘cool’ dialogue लगता है. लेकिन मेरे लिए यही सबसे uncomfortable moment था.
जिस बात पर सीटियां बज रही हैं, क्या वह असल में male dominance को celebrate नहीं कर रही?
एक पुरुष का controlling behaviour. एक महिला को अपनी शर्तों पर स्वीकार करने का attitude. और उसे hero के swag की तरह पेश करना.
शायद उस पल मुस्कुराती लड़कियों को भी इसका अंदाजा नहीं था कि जिस behaviour पर वे react कर रही हैं, उसमें male-dominated patriarchal सोच की एक परछाईं भी छिपी है.
और शायद यही वजह है कि ‘Toxic’ को सिर्फ एक फिल्म की तरह देखना मुश्किल है.
‘Toxic’ में आखिर ऐसा क्या दिखा कि लोग भड़क गए?
‘Toxic’ की कहानी में Yash Raya के किरदार में हैं और फिल्म का tone शुरू से ही dark और bold रखा गया है. फिल्म में कई ऐसे visuals हैं, जिनमें sexuality, violence और महिलाओं के treatment को लेकर दर्शकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं.
फिल्म के promotional phase में भी ‘Ladies & Ladies’ जैसे content को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठे थे कि महिला किरदारों को कहानी के हिस्से से ज्यादा visual object की तरह पेश किया जा रहा है. अब फिल्म सामने है, तो बहस और तेज होना स्वाभाविक है.
यहां सवाल यह नहीं है कि फिल्म में bold scenes क्यों हैं. सवाल यह है कि उन scenes में महिलाओं को किस नजर से दिखाया गया है और पुरुष किरदार की बदतमीजी को किस तरह पेश किया गया है.
Kabir Singh: ये प्यार था या पार्टनर पर पूरा कंट्रोल?
याद कीजिए ‘Kabir Singh’. Shahid Kapoor का किरदार गुस्सैल था, violent था और अपनी girlfriend पर अधिकार जताता था. फिल्म रिलीज होने के बाद आलोचकों और relationship experts ने सवाल उठाया था कि क्या ऐसे behaviour को जुनूनी प्यार की तरह दिखाना सही है.
उस समय भी बहस यही थी कि किरदार खराब है, यह बताना काफी है या फिल्म को उसके खराब behaviour की कीमत भी दिखानी चाहिए?
क्योंकि एक तरफ किरदार violent और controlling है. लेकिन दूसरी तरफ वही किरदार stylish है. उसके dialogues पर तालियां बजती हैं और उसका attitude लोगों को आकर्षित करता है.
यही वह जगह है जहां समस्या शुरू होती है.
Animal: गुस्सा ज्यादा तो मर्दानगी भी ज्यादा?
फिर आई ‘Animal’. Ranbir Kapoor का Ranvijay और भी ज्यादा violent, गुस्सैल और aggressive किरदार था. फिल्म में sexuality और महिलाओं के treatment को लेकर भी काफी बहस हुई.
आलोचना सिर्फ इस बात की नहीं थी कि Ranvijay ऐसा क्यों है. बल्कि सवाल था कि फिल्म उसके इस behaviour को किस तरह package करती है.
महंगी गाड़ियां. शानदार कपड़े. जबरदस्त background music. दमदार entry और एक ऐसा hero, जिसके सामने बाकी सब छोटे लगें.
ऐसे में उसका गुस्सा सिर्फ गुस्सा नहीं रह जाता. वह ‘attitude’ बन जाता है.
और यहीं से ‘Toxic masculinity’ वाली बहस शुरू होती है.
हीरो बदतमीज है तो क्या वह कूल भी होना चाहिए?
यही सबसे बड़ा सवाल है.
हम फिल्मों में villain को violent देखते हैं तो समझते हैं कि वह गलत है. लेकिन जब वही violence hero करता है, तो उसे कई बार ‘मर्दानगी’, ‘swag’ और ‘passion’ के नाम पर बेच दिया जाता है.
लड़की को control करना - attitude.
गुस्से में violence करना - power.
हर महिला को अपनी नजर से देखना - style.
‘ना’ को नजरअंदाज करना - जुनून.
सवाल यह है कि हम इन चीजों को कितनी बार अलग-अलग नाम देकर स्वीकार करते रहेंगे?
हीरो की कहानी में महिलाएं सिर्फ ‘दिखने’ के लिए क्यों?
क्या एक पुरुष के ताकतवर होने के लिए उसका महिलाओं पर हक जताना जरूरी है? महिलाएं कहानी का हिस्सा हैं या सिर्फ हीरो की दुनिया का हिस्सा?
यह सवाल और भी जरूरी है. जब किसी फिल्म में महिला किरदारों की पहचान बार-बार उनके look, शरीर, sexuality या पुरुष किरदार के साथ उनके रिश्ते से तय होती है, तो दर्शक पूछेंगे ही कि आखिर उनकी अपनी कहानी कहां है.
‘Kabir Singh’ को लेकर भी आलोचना में यह बात सामने आई थी कि Preeti का किरदार काफी हद तक Kabir की कहानी और उसके development के लिए इस्तेमाल होता है.
‘Animal’ में भी महिला किरदारों के treatment को लेकर इसी तरह की बहस हुई. और अब ‘Toxic’ के सामने आने के बाद सवाल फिर वही है. महिला किरदारों को मजबूत बनाने के लिए उन्हें अपनी कहानी क्यों नहीं दी जा सकती?
Bold scenes से दिक्कत नहीं, उन्हें दिखाने के तरीके से है
यह भी साफ कर देना चाहिए कि हर sexual scene अपने आप में गलत नहीं है. Cinema में sexuality कहानी का हिस्सा हो सकती है. समस्या तब पैदा होती है जब महिला को सिर्फ देखने की चीज बना दिया जाए या उसकी मौजूदगी का मकसद पुरुष किरदार की छवि को और ‘cool’ बनाना रह जाए.
यानी मुद्दा boldness versus संस्कार का नहीं है. मुद्दा है representation और respect का.
मुझे bold scenes से दिक्कत नहीं है. सवाल यह है कि महिला को दिखाते वक्त कैमरे की नजर क्या है. क्या वह एक किरदार है. या सिर्फ एक ऐसा शरीर, जिसे देखकर दर्शक reaction दें?
क्योंकि अगर स्क्रीन पर महिला को देखने की चीज की तरह पेश किया जाए और उसी पल थिएटर में सीटियां बजने लगें, तो मुझे लगता है कि हमें सिर्फ दर्शकों के reaction पर नहीं, पर्दे पर बनाई गई उस image पर भी सवाल करना चाहिए.
आखिर एक हीरो की ताकत साबित करने के लिए महिला को बार-बार कमजोर, sexualized या सिर्फ देखने की चीज बनाना क्यों जरूरी है?
और अगर कोई महिला दर्शक फिल्म देखकर थिएटर से बाहर निकलते हुए यह महसूस करे कि उसे पर्दे पर सिर्फ एक शरीर की तरह पेश किया गया, तो क्या उस feeling को सिर्फ यह कहकर खारिज कर देना चाहिए कि ‘यह तो फिल्म है’?
यही वह uncomfortable सवाल है, जो ‘Toxic’ एक बार फिर हमारे सामने रखती है.
ये भी पढ़ें- Toxic X Review: टिकट लेने से पहले जान लें पब्लिक का मूड, किसी ने कहा 'टॉर्चर' तो कोई बोला 'ब्लॉकबस्टर'
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Loading Review Hub...
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए