हिंदुस्तान कोका कोला की विशेष परियोजना ''उन्नति'' से किसानों को होगा फायदा

नयी दिल्ली: देश में फलों के रस के बढते उपभोग को देखते हुए हिंदुस्तान कोका कोला बेवरेजेज अपनी विशेष परियोजना ‘उन्नति’ परियोजना पर काम कर रही है जिसमें वह किसानों को कम जगह पर आम के ज्यादा पौधे लगाने और बूंद-बूंद सिंचाई (टपक सिंचाई) के जरिये उपज बढाने के गुर सिखायेगी. परियोजना के जरिये जहां […]
नयी दिल्ली: देश में फलों के रस के बढते उपभोग को देखते हुए हिंदुस्तान कोका कोला बेवरेजेज अपनी विशेष परियोजना ‘उन्नति’ परियोजना पर काम कर रही है जिसमें वह किसानों को कम जगह पर आम के ज्यादा पौधे लगाने और बूंद-बूंद सिंचाई (टपक सिंचाई) के जरिये उपज बढाने के गुर सिखायेगी. परियोजना के जरिये जहां एक ओर कंपनी को अगले सात-आठ वर्ष के लिये उसके उत्पादों के लिये जरुरी आम की 70 प्रतिशत आपूर्ति मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ हजारों किसानों को परियोजना से फायदा पहुंचेगा.
कंपनी के उपाध्यक्ष (रणनीतिक परियोजना) उमेश मलिक ने बताया, ”प्रोजेक्ट उन्नति के तहत कंपनी को वर्ष 2022 तक अपने माजा पेय उत्पाद के लिए आम के गूदे की 70 प्रतिशत तक आपूर्ति होने की उम्मीद है.” उन्होंने बताया कि आंध्र प्रदेश में आम की खेती करने वाले किसानों को कम जगह में ज्यादा पौधे लगाकर बूंद-बूंद सिंचाई की व्यवस्था सिखाई जा रही है. इससे उपज 100 प्रतिशत तक बढ जाती है.
उन्होंने कहा कि जैन इरिगेशन के साथ मिलकर शुरु की गई इस परियोजना के पहले चरण में अपेक्षित परिणाम हासिल हुये हैं और दूसरे चरण में कंपनी 50,000 एकड क्षेत्र में करीब 25,000 किसानों को इसमें शामिल करेगी. कंपनी अगले 10 साल में इस पर 50 करोड रपये का निवेश करेगी. मलिक ने कहा कि पहले चरण के तहत 4,300 किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है. मलिक ने कहा कि उन्नति परियोजना के दूसरे चरण में तोतापरी आम की खेती करने वाले सभी तीन राज्यों आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक को शामिल किया जाएगा और इस दिशा में प्रशिक्षण का काम पहले ही शुरु हो चुका है.
उल्लेखनीय है कि अल्ट्रा हाई डेनसिटी प्लांटेशन (यूएचडीपी)तकनीकी के तहत पेड के झुरमुट (कैनोपी) को इस तरह से बनाए रखा जाता है कि उन पर सूरज की ज्यादा किरणें पडें और शुरुआती वर्षों में प्रति इकाई क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाए जा सकें. इससे तीन-चार साल में बागान फल के लिए तैयार हो जाता है. यूएचडीपी तकनीकी के जरिए एक एकड में 600 पेड लगाए जा सकते हैं, जबकि पारंपरिक तरीके से एक एकड में 40 पेड ही लग पाते हैं. वहीं पारंपरिक तरीके से लगाए गए पेड 7 से 9 साल में फल देते हैं, जबकि यूएचडीपी में तीन साल के बाद पेडों में फल आने लगते हैं.
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