जानें नार्वे क्यों देता है नोबेल शांति पुरस्कार

Published at :10 Dec 2014 4:58 PM (IST)
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जानें नार्वे क्यों देता है नोबेल शांति पुरस्कार

स्टॉकहोम : क्या आपने कभी सोचा है कि नार्वे की एक कमेटी नोबेल शांति पुरस्कार ओस्लो में ही क्यों देती है जबकि दूसरे नोबेल पुरस्कार स्वीडन की राजधानी में दिए जाते हैं ? सन् 1901 में जब से नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाने लगा, उसी समय से इसके संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल की इच्छा के मुताबिक […]

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स्टॉकहोम : क्या आपने कभी सोचा है कि नार्वे की एक कमेटी नोबेल शांति पुरस्कार ओस्लो में ही क्यों देती है जबकि दूसरे नोबेल पुरस्कार स्वीडन की राजधानी में दिए जाते हैं ? सन् 1901 में जब से नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाने लगा, उसी समय से इसके संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल की इच्छा के मुताबिक नार्वे की संसद स्टॉर्टिंग द्वारा नियुक्त पांच लोगों की कमेटी शांति पुरस्कार देती है.

अल्फ्रेड नोबेल ने कभी इस रहस्य से पर्दा नहीं हटाया कि शांति पुरस्कार प्रदान करने का जिम्मा उन्होंने स्वीडिश संस्था को क्यों नहीं सौंपा. बहरहाल, इस बारे में कयास ही लगाए जाते रहे हैं. एक दलील है कि नोबेल ने नार्वे के देशभक्त और अग्रणी लेखक बोर्न्‍सत्जेर्ने बोर्नसन की हिमायत की थी. यह भी कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय शांति आंदोलन के समर्थन में वोट करने वाली किसी भी देश की पहली संसद स्टॉर्टिंग ही थी.
हो सकता है कि नोबेल ने स्वीडन-नार्वे यूनियन के भीतर नोबेल पुरस्कार संबंधी काम के बंटवारे का भी पक्ष लिया हो. यह भी कि, उन्हें यह डर रहा होगा कि शांति पुरस्कार की बेहद उच्च राजनीतिक प्रकृति को देखते हुए यह कहीं सत्ता राजनीति का एक औजार न बन जाए और शांति के हथियार के तौर पर इसकी महत्ता कम ना हो जाए.
नोबेल ने अपने वसीयत में लिखा ‘‘यह मेरी इच्छा है कि पुरस्कार देते वक्त उम्मीदवारों की राष्ट्रीयता नहीं देखी जाए. सुयोग्य उम्मीदवार को यह मिले, चाहे वह स्कैंडिनेवियाई हो या नहीं.’’ 20 वीं सदी में स्कैंडिनेवियाई क्षेत्र के आठ लोगों ने पुरस्कार जीता. इसमें स्वीडन के पांच, नार्वे के दो और डेनमार्क का एक पुरस्कार शामिल है.
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