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पं. दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी : छह दशक पूर्व कहा था परिवार का टूटना राष्ट्र का टूटना है

Updated at : 25 Sep 2017 6:36 AM (IST)
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पं. दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी : छह दशक पूर्व कहा था  परिवार का टूटना राष्ट्र का टूटना है

चिंतक, राजनेता और एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की आज 101वीं जयंती है. इसके साथ ही उनकी जन्मशताब्दी वर्ष का समापन होगा. दीनदयाल जी ने अपने समय की महत्वपूर्ण चुनौतियों पर लेखों के जरिये विचार रखे. उनमें से कई आज के दौर में पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं. उनकी जयंती के मौके […]

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चिंतक, राजनेता और एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की आज 101वीं जयंती है. इसके साथ ही उनकी जन्मशताब्दी वर्ष का समापन होगा. दीनदयाल जी ने अपने समय की महत्वपूर्ण चुनौतियों पर लेखों के जरिये विचार रखे. उनमें से कई आज के दौर में पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं. उनकी जयंती के मौके पर पढ़िए उनके द्वारा लिखित दो ऐसे आलेख, जो वर्तमान समय में भी समाज व राजनीति को दिशा दे सकते हैं.
अब तक अधोमुखी बनी परिवार-व्यवस्था उर्ध्वमुखी एवं राष्ट्रानुकूल नहीं बन जाती, तब तक हमारी नाना समस्याअों का समाधान नहीं हो पायेगा. उल्टे नयी-नयी समस्याएं हमारे सम्मुख मुंह बाये खड़ी होती जायेंगी. परिवार शब्द में केवल पति, पत्नी और उनकी संतान का ही समावेश नहीं होता. यह परिकल्पना इतनी सीमित नहीं है. पति और पत्नी का एक नाता होता है. किंतु उनके साथ परिवार में भाई-बहन, माता-पिता, भाभी, चाचा, ताऊ, मामा, दादा-दादी, सास-बहू, दामाद-ससुर आदि बीसियों नाते रिश्ते भी होते हैं. एक ही मनुष्य को इनमें से अनेक नाते निभाने पड़ते हैं और तदनुसार व्यवहार करना पड़ता है. ये सब आप्तजन या परिवारजन होते हैं. उनका अपना एक समष्टि जीवन होता है.
इस समष्टि-जीवन में स्नेह, सहयोग, परस्पर पूरकता दुर्बल घटकों के प्रति आत्मीय सहानुभूति, एक-दूसरे के लिए कुछ त्याग करने की प्रवृत्ति, एक दूसरे के सुख-दुखों में सहभागी होेने की स्वाभाविक तत्परता, अतिथि सत्कार की भावना आदि नाना गुणों का विकास अपेक्षित होता है.
परिवार के लोग इन गुणों से युक्त हों तो परिवार के बाहर के समाज-जीवन पर भी उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता. हमारे यहां परिवार-व्यवस्था को सामाजिक सुरक्षा योजना का ही एक भाग माना जाता है. मनुष्य अपंग हो गया, रोगग्रस्त हो गया,अस्थायी रूप से ही सही बेकार हो गया अथवा कोई अनपेक्षित विपदा आ गयी तो उसे परिवार का प्रमुख आधार रहता है. बुढ़ापे में तो उसे नयी पीढ़ी पर ही निर्भर रहना पड़ता है. आवश्यक संस्कारों एवं गुण संपदा के बिना यह सब नहीं हो सकता.
अत: समष्टि जीवन की सुव्यवस्थित रचना में परिवार-व्यवस्था की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. द्रव्यार्जन, कामतृप्ति, स्नेहाभिव्यक्ति की आंतरिक अभिलाषा, अपनेपन की सुखद भावना, व्यक्ति विकास आदि बातें पारिवारिक जीवन की प्राथमिक आधार होती हैं. इस घटक को नष्ट कर केवल शासन और प्रजा संबंध को शेष रखने का एक भी प्रयास आज तक कभी सफल नहीं रहा है.
ऐसा ही एक लक्षणीय प्रयास रूस में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद किया गया. मनुष्य-स्वभाव के सर्वथा विपरीत होने के कारण वह पूर्णत: असफल रहा. पति-पत्नी का सहजीवन, बच्चों का पालन पोषण, खाने-पीने की रुचि तथा शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार व्यवस्था, प्रवृत्ति के अनुसार कुछ उपासना, परिवार का अपना स्वतंत्र आवास आदि स्वाभाविक रचना को वहां फिर से स्वीकार करना पड़ा. वहां अनुभव किया गया कि मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं है. उसके जीवन में भावना, बुद्धि अौर आत्मा का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है.
कुछ पाश्चात्य देशों में घड़ी का लंबक दूसरे ही दौर तक ले जाने का प्रयास हो रहा है. विचारकों को वह भी समाज की सुख-शांति को ढहा देनेवाला दिखाई दे रहा है. और इसलिए चिंताजनक है. कहना न होगा कि अशास्त्रीय परिकल्पना से उत्पन्न वासना की तृप्ति के पीछे दौड़ते रहनेवाली ही यह प्रवृति है. जिस समय जो बात सुखकारी प्रतीत हो, उसे करते जाना इस प्रवृत्ति का मुख्य सूत्र है. संयम, सहिष्णुता, त्याग, स्थिरता, पारिवारिक स्नेह और दायित्व की भावना का वहां कोई मूल्य नहीं होता. व्यक्तिगत स्तर पर वासना-विकारों का ही बोलबाला होता है.
प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने स्तर पर ही आचरण करता रहता है. विवाह विच्छेदों का बढ़ता अनुपात, वत्सलता एवं सुसंस्कारयुक्त बालसंगोपन की अनास्था, परिवार में रुग्ण या अपंग हो गये सदस्यों की निराधार अवस्था, बड़े-बूढ़ों की देखभाल करने में आनाकानी आदि सामाजिक प्रश्न इसी में से उभरे हैं.
हो सकता है कि व्यक्तिगत स्तर पर संबद्ध लोगों को जीवन का आनंद लूटने का संतोष शायद मिलता हो. किंतु इसे जीवन की सुसंस्कृत या सामाजिक स्थिरता के लिए पोषक कदापि नहीं माना जा सकता. यह बोध जागने तथा मानसिक तनाव के दुष्परिणाम का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर भी पड़ने के कारण पश्चिम के सामाजिक विचारक अब सुखी एवं सुस्थिर परिवार जीवन की पुनर्रचना (रिहेबिलिटेशन ऑफ द फैमिली) की आवश्यकता का प्रतिपादन करने लगे हैं.
सामाजिक दायित्वहीनता
पुराने समय में कृषि व्यवसाय के कारण संयुक्त परिवार प्रणाली भली-भांति चली थी और घर-घर में अनेक सांस्कृतिक परंपराएं टिकी रही थीं. अब शिक्षण, व्यवसाय, बढ़ता नगरीकरण, आवास की अपर्याप्तता, आय की विषमता आदि कारणों से, अलग घर बनाने की प्रथा अधिक सुविधापूर्ण लगने लगी है. इससे निस्तार का अभी कोई उपाय नहीं है. किंतु छोटे परिवार के साथ ही मन भी स्वार्थी और संकीर्ण बन जाये और संस्कारों की धारा खंडित हो जाये तो समष्टि-जीवन पर उसका विपरीत परिणाम होकर रहेगा. फिर भी हमारे यहां बाह्य परिस्थिति के प्रभाव से परिवार-व्यवस्था में आये कुछ परिवर्तनों को अपरिहार्य मानना चाहिए. पहले जैसी संयुक्त परिवार-व्यवस्था अब संभव नहीं है.
आज हम इस परिणाम को देख रहे हैं. स्नेह सूखता जा रहा है और संबंधों में एक प्रकार का रूखापन आता जा रहा है. समष्टि की दृष्टि से इससे भी बड़ी कमी यह आने लगी है कि द्रव्यार्जन एवं अपने सीमित परिवार के परे अन्य किसी काम पर ध्यान देने, उसके लिए समय, पैसा और श्रेय देने की भावना गृहस्थों तथा गृहणियों में समाप्त सी होने लगी है. परिणामत: सामाजिक कार्य के लिए लोग नहीं मिल पा रहे हैं. साधन अपर्याप्त प्रतीत होने लगे हैं. अच्छी-भली संस्थाओं को भी धन की न्यूनता का सामना करना पड़ रहा है. कोई भी उदात्त ध्येय सामने रहना बंद सा होता जा रहा है. आर्थिक अनुकूलता हो तो धन का विनियोग घड़ी दो घड़ी का सुख लूटने के लिए ही करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है.
समाज में हमें सब कुछ प्राप्त हो, सीमित परिवार (हम दो हमारे दो) को सब प्रकार की सुविधाएं एवं भौतिक प्रगति के अवसर समाज या शासन प्रदान करे, ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगी हैं. किंतु समाज का ऋण उतारने की कल्पना मन को छूती ही नहीं. किंबहुना यह सामान्य कृतज्ञ-बोध भी हमारे मन-मानस से हटता जा रहा है कि समाज के कारण ही हमें यह सब कुछ प्राप्त हुआ है. ‘भोग’ ही सांकेतिक शब्द बन गया है. हम अपने ही समाज की अोर परायेपन की दृष्टि से देखने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं. ‘अपने’ और सामाजिक कार्य में बड़ा अंतर पड़ता जा रहा है. आत्मिक उन्नति की अपेक्षा हो रही है. वास्तव में गृहस्थाश्रम-धर्म की ही यह विडंबना ही है. इसके कारण परिवार संस्था के मूल उद्देश्य पर पानी फिर जाता है. समष्टि भावना क्षीण होती जाती है और सुसंगठित समाज-जीवन कठिन हो जाता है.
इस स्थिति से उबरना हो तो यह भावना जगानी पड़ेगी कि राष्ट्र बड़ा है, उसके कल्याण को वरीयता देनी चाहिए तथा अपने पारिवारिक जीवन में राष्ट्रानुकूल संस्कार होते रहने चाहिए. यह दृष्टि देने के लिए कुछ समय तक सोद्देश्य संगठित प्रयास करने पड़ेंगे. परिवारों, पाठशालाअों तथा समाज स्वयंसेवी संस्थाअों में यही काम करना पड़ेगा. नये मूल्य खोजने का कोई प्रश्न ही नहीं है. जो मूल्य है उन्हें व्यवहार में कैसे उतारें, यही प्रश्न है. हिंदू राष्ट्र के पुनर्निर्माण की इस प्रक्रिया को ठीक से ध्यान में लेना चाहिए.
(दीनदयाल जी ने यह आलेख 1960 के आसपास लिखा था. पाञ्चजन्य के 21 मार्च, 1993 के अंक से साभार.)
यदि हम एकता चाहते हैं तो भारतीय राष्ट्रीयता, जो हिंदू राष्ट्रीयता है तथा भारतीय संस्कृति, जो हिंदू संस्कृति है, उसका दर्शन करें. उसे मानदंड बनाकर चलें. भागीरथी की पुण्यधाराओं में सभी प्रवाहों का संगम होने दें. यमुना भी मिलेगी और अपनी सभी कालिमा खोकर गंगा में एकरूप हो जायेगी.
(पाञ्चजन्य, 24 अगस्त, 1953)
पं. दीनदयाल उपाध्याय
जीवन परिचय
पिता : भगवती प्रसाद उपाध्याय
माता : रामप्यारी
कार्यक्षेत्र : चिंतक, एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता, लेखक, संगठक, प्रखर वक्ता, समाजशास्त्री और पत्रकार
प्रारंभिक जीवन
दीनदयाल उपाध्याय का बचपन अत्यंत कठिनाइयों में बीता. पिता रेलवे में कर्मचारी थे. दीनदयाल मात्र ढाई वर्ष के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया. फिर सात साल की उम्र में मां का साया भी सिर से उठ गया. पढ़ाई के लिए नाना के पास चले गये, जो धनिकया, राजस्थान में रेलवे मास्टर थे. लेकिन जब दीनदयाल की आयु 10 वर्ष थी, तभी उनके नाना का भी निधन तब हो गया. मामा ने लालन-पोषण किया.
शिक्षा
हाइ स्कूल की शिक्षा राजस्थान के सीकर में प्राप्त की. उनकी प्रतिभा को देखकर सीकर के तत्कालीन नरेश ने उन्हें एक स्वर्ण पदक, किताबों के लिए 250 रुपये और दस रुपये की मासिक छात्रवृत्ति से पुरस्कृत किया था. दीनदयालजी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पिलानी में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की. कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की. एमए के पढ़ाई के लिए आगरा आये, लेकिन परेशानियों की वजह से परीक्षा नहीं दे सके. मामा जी के कहने पर वह प्रशासनिक परीक्षा में बैठे. चयनित कर लिये गये, लेकिन नौकरी में रूचि ना होने के कारण वे एल टी की पढ़ाई करने प्रयाग (इलाहाबाद) चले गये. 1942 में उन्होंने यह परीक्षा पास की.
राष्ट्र को समर्पित जीवन
1937 में कानपुर में स्नातक की पढ़ाई के दौरान दीनदयाल उपाध्याय का संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक डॉ हेडगेवार व संघ कार्यकर्त्ता भाऊराव देवरस से हुआ. बालूजी महाशब्दे और सुंदर सिंह भंडारी उनके सहपाठी थे. उन्होंने समाज सेवा में हिस्सा लेना शुरू किया. फिर 1939 में वह आरएसएस से पूरी तरह जुड़ गये. 1939 में संघ के 40 दिवसीय नागपुर शिविर में उन्होंने भाग लिया. उन्होंने न तो शादी की और न ही धनोपार्जन के लिए कोई कार्य किया. अपना संपूर्ण जीवन उन्होंने राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया.
राजनीति से जुड़ाव
वर्ष 1951 में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) की स्थापना की. दीनदयाल उपाध्याय को इसका प्रथम महासचिव नियुक्त किया गया. 1953 में डॉ मुखर्जी के निधन से पूरे संगठन की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के युवा कंधों पर आ गयी. 1967 तक वह महासचिव रहे. दिसंबर, 1967 में कालीकट के अधिवेशन में दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया.सिर्फ तीन माह ही अध्यक्ष रह पाये.
लेखन व पत्रकारिता
1940 में ‘राष्ट्रधर्म’ (लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका) में कार्य किया. संघ में सक्रियता के दौरान उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्र ‘पांचजन्य’ और दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ शुरू किया था.
कृतियां
‘चंद्रगुप्त मौर्य’ (नाटक), हिंदी में शंकराचार्य की जीवनी. डॉ के बी हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद. ‘सम्राट चंद्रगुप्त’, ‘जगतगुरू शंकराचार्य’, ‘अखंड भारत क्यों हैं’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं’, ‘राष्ट्र चिंतन’ और ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ आदि पुस्तकों के लेखक.
निधन
11 फरवरी, 1968 को पंडित दीनदयाल का शव मुगलसराय रेलवे यार्ड में मिला था. वह ट्रेन से लखनऊ से पटना जा रहे थे. उनकी रहस्यमय मौत की गुत्थी आज तक नहीं सुलझी. इसकी सीबीआइ और फिर न्यायिक जांच भी हुई.
राजनीतिक दलों के लिए आचार-संहिता
भारत में राजनीतिक दलों के लिए एक आचरण संहिता बनाने की दीर्घकाल से अनुभूत आवश्यकता की पूर्ति के लिए अनेक सम्मेलन आयोजित किये जा चुके हैं. इन सम्मेलनों में कुछ प्रायोगिक निर्णय भी किये गये हैं. वहां हुए विचार-विमर्शों के वृत्तों (रिपोर्ट) से ऐसा प्रतीत होता है कि संहिता के व्याप्तिक्षेत्र और स्वरूप का निर्धारण होना अभी भी शेष है. लिये जा रहे विभिन्न निर्णयों का पालन करने के लिए नैतिक बंधन के अतिरिक्त और कोई बंधन नहीं है. फिर भी यदि लोगों को समुचित शिक्षा प्राप्त हो, तो वे निश्चित रूप से राजनीतिक दलों पर प्रभाव डालेंगे, और इस प्रकार संहिता के जानबूझ कर उल्लंघन के अवसर कम कर देने में सहायक होंगे.
जनता तथा अन्य राजनीतिक दलों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने का मुख्य दायित्व कांग्रेस पर है, क्योंकि वह न केवल सबसे पुराना दल है, अपितु सबसे बड़ा दल भी है और सत्तारूढ़ भी है. दुर्भाग्यवश, गत कुछ वर्षों से कांग्रेसियों का राजनीतिक आचरण कुछ श्लाघ्य नहीं रहा है. कांग्रेस का परित्याग करनेवालों के जो दल गठित हुए हैं, वे भी उसी रोग से ग्रस्त हैं, विशेषकर इसलिए कि जो लोग कांग्रेस का परित्याग करते हैं, वे शायद ही कभी सैद्धांतिक आधार पर वैसा करते हैं.
इसलिए गैर-कांग्रेसी दलों के लिए यह आवश्यक है कि वे एक ऐसी संहिता का निर्माण करने की जागरूक चेष्टा करें, जो स्वस्थ हो और जिससे इस देश में राजनीतिक जनतंत्र का सुगठन हो सके.
उन्हें बहुत-सी बुराइयों को दूर करना होगा, जिन्हें कांग्रेस और कांग्रेसियों ने पैदा किया है. इन बैठकों में किये गये कुछ निर्णयों से केवल कांग्रेस और उनके सदस्यों को ही लाभ होगा. उदाहरण के लिए उस व्यक्ति को टिकट नहीं देना, जिसे टिकट देने से किसी अन्य दल ने इनकार कर दिया हो, या व्यक्तिगत तथा निजी त्रुटियों की चर्चा न करते हुए केवल राजनीतिक बातों तक की आलोचना को सीमित रखना. फिर भी, इन बातों में कांग्रेस को अनुगृहित करना ही अधिक अच्छा होगा, क्योंकि यदि इसके द्वारा वह अपने घर को सुव्यवस्थित करने में सक्षम हो सके, तो उसका परिणाम राष्ट्र के सामान्य राजनीतिक स्वास्थ्य पर भी अच्छा ही पड़ेगा.
आवेदन देने से लेकर सामूहिक सत्याग्रह तक, और धरना से लेकर विवश करनेवाले अनशनों तक – ये सभी आज की सामान्य बातें हो गयी हैं. प्राय: जनमत-संग्रह करने (Plebiscite) और लोकेच्छा जानने (Refrendum) तक की बातें की जाने लगी हैं. कुछ लोग, विशेषत: कम्युनिस्ट, हिंसात्मक उपायों की भी चर्चा करते हैं.
सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा व्यवहार में लाये जानेवाले साधनों के बारे में भी एक आचरण-संहिता का विकास करने की आवश्यकता है. आज हमारा राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन स्वातंत्र्य-संघर्ष का ही एक विस्तार मात्र रह गया है. इसलिए, लोग सामान्यतया उन सारे साधनों का सहारा लेना उचित समझते हैं, जिनका उपयोग हम विदेशी शासकों के विरुद्ध करते थे.
अपने अभाव-अभियोगों को दूर कराने के लिए आंदोलन करनेवाली जनता के प्रति प्रशासन के दृष्टिकोण में भी कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं आया है. प्रशासन जनता द्वारा चलाये जानेवाले किसी भी आंदोलन को कुचल देने के लिए, बिना हिचकिचाहट के तत्क्षण अपनी पूरी शक्ति लगा देता है और जब सरकार जनता को दबा देने में विफल हो जाती है, तभी वह उनकी मांगें सुनने के बारे में विचार करती है. इस प्रकार आंदोलन एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देता है, जहां सरकार की स्थिति दुर्बल पड़ जाती है.
दलीय सरकार होने के कारण दल के स्वार्थ भी बीच में आ जाते हैं. और, इस प्रकार उन प्रसंगों में भी, जिनमें जनता अपनी मांगें सरकार से मनवा लेती है, शालीनता नहीं रहती. कटुता की भावना रह जाती है. इस प्रकार जनता की दृष्टि में सरकार धीरे-धीरे एक भयजनक पिशाच का प्रतीक बन जाती है. दोनों के बीच खाई बढ़ती जाती है. यह सुखकर स्थिति नहीं है.
जनतंत्र में विश्वास करनेवाले सभी राजनीतिक दलों और सरकार को विशिष्ट प्रश्नों के बारे में जनता के दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति संबंधी समान संहिता मान्य करनी चाहिए. सरकार को प्रस्तावों और आवेदनों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनना चाहिए. यदि सरकार गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग करनेवाले दो करोड़ से भी अधिक लोगों के हस्ताक्षरों को रद्दी की टोकरी में फेंक देती है, किंतु उसी प्रश्न पर सत्याग्रह के सामने झुक जाती है, तो इसे सरकार की जनतांत्रिक भावना का परिचायक नहीं कहा जा सकता.
प्रधानमंत्री चाहे तो कह सकते हैं, परंतु यह सर्वमान्य भावना है कि आंध्र प्रदेश का निर्माण पोत्ती श्रीरामुलु के अनशन और उनकी मृत्यु के बाद व्यापक पैमाने पर घटित तोड़फोड़ एवं हिंसात्मक घटनाओं का प्रत्यक्ष परिणाम था. इस भावना को दूर किया जाना चाहिए.ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री अब अकाली नेता के अनशन के प्रति कठोर रुख अपना कर शायद वही कर रहे हैं.
परंतु यदि मास्टर तारा सिंह की मृत्यु हो जाती है, तो जनता की उस भावना को दूर करने का सरकारी प्रयास बहुत महंगा पड़ेगा. वस्तुत: कुछ ठोस कार्य होना चाहिए, ताकि ऐसे अनशनों तथा सत्याग्रहों के अवसर ही न आने पायें. हम सब एक निश्चय करें कि दो चुनावों के बीच किन प्रश्नों पर आंदोलन किया जा सकता है.
दो आम चुनावों के बीच केवल छोटे प्रश्नों के लिए सरकार पर दबाब डालना चाहिए और बड़े प्रश्नों को चुनाव के समय जनता के निर्णय के लिए छोड़ देना चाहिए. चुनाव में सरकार को बदल देने के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय से सरकारी नीति में बड़े परिवर्तन के लिए हठपूर्ण आग्रह करना अप्रजातांत्रिक होगा.
(चार सितंबर, 1961. ‘पोलिटिकल डायरी’ से साभार)
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