।। रविदत्तबाजपेयी ।।
प्रतिरोध के प्रतिमान श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज पेश है मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ की यात्रा. आमजन को सुधारवादी विचारधारा से अवगत करवाने के लिए साने गुरुजी ने 15 अगस्त , 1948 को मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ की स्थापना की.
गुरुजी ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के साथ ही पूर्ण स्वतंत्रता के लिए आजीवन संघर्ष किया. उनके नैतिक मूल्यों व तप का असर ही है कि विपत्ति के दौर में भी पत्रिका ने अपने संस्थापक को निराश नहीं किया, जबकि किसी भी संस्था का अपने संस्थापकों द्वारा स्थापित उच्च मानदंडों को लंबे समय तक बनाये रख पाना कठिन होता है.
किसी भी संस्था का अपने संस्थापकों द्वारा स्थापित उच्च मानदंडों को लंबे समय तक बनाये रख पाना बहुत कठिन कार्य है, लेकिन ‘साधना’ पत्रिका ने घोर प्रशासनिक दमन और विपत्ति के दौर में भी अपने संस्थापक को निराश नहीं किया. वर्ष 1975 में भारत में आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप की घोषणा के बाद मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ ने प्रेस सेंसरशिप के नियमों का खुल कर विरोध किया और भारी सरकारी उत्पीड़न के बावजूद भी स्वतंत्र पत्रकारिता की अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हटे बल्कि निरंकुश हो चुकी तत्कालीन सरकार को पीछे ढकेलने में सफल रहे.
24 दिसंबर 1899 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के पलगड़ गांव में जन्मे पांडुरंग सदाशिव साने, जो साने गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध हुए, ने विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए अपनी शिक्षा पूरी की और दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के बाद एक छोटे से शहर में विद्यालय शिक्षक का काम शुरू किया. अपने अध्यापन के दौरान ही साने गुरुजी ने नैतिक तथा जीवनोपयोगी शिक्षा देने के लिए ‘विद्यार्थी’ नामक एक पत्रिका की शुरु आत की.
वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह से प्रभावित होकर साने गुरुजी ने अपनी नौकरी छोड़ दी और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये. सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 18 महीने के लिए धुले जेल में डाल दिया गया, यहां पर साने गुरुजी ने विनोबा भावे के दैनिक गीता प्रवचन का संकलन किया, जिसे ‘गीता प्रवचन’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया.
एक समय स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी के कारण साने गुरुजी को गिरफ्तार करके त्रिचनापल्ली (त्रिचुरापल्ली) भेज दिया गया. अपने जेल प्रवास के दौरान साने गुरुजी ने तमिल और बांग्ला भाषा सीखी. तमिल संत कवि थिरु वल्लर के ‘कुरल’ का तमिल से मराठी में अनुवाद किया.
साने गुरुजी ने पंढरपुर के विट्ठल मंदिर में दलितों के प्रवेश दिये जाने की मांग को लेकर महात्मा गांधी के मना करने के बावजूद, 11 दिनों तक अनशन किया और मंदिर प्रवेश की इस रूढ़िवादी कुव्यवस्था का अंत किया. भारतीयों को अपने देश की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं व संस्कृतियों के बारे में सीखने में सहयोग करने के लिए साने गुरुजी ने ‘अंतर भारतीय’ नामक एक संस्था की स्थापना की थी.
समाजवादी व्यवस्था के हिमायती और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक साने गुरुजी ने भारतीय स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ 15 अगस्त 1948 को साने गुरुजी ने ‘साधना’ नामक मराठी साप्ताहिक की स्थापना की थी.
एक असाधारण लेखक के रूप में साने गुरुजी ने 73 पुस्तकों की रचना भी की. महात्मा गांधी की हत्या और भारतीय शासकों और राजनीतिज्ञों के स्वार्थी व भ्रष्ट आचरण से निराश साने गुरुजी ने वर्ष 1950 में अपने प्राण त्याग दिये. साने गुरुजी के जाने के बाद उनके सहयोगियों ने मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ के प्रकाशन के लिए साधना ट्रस्ट स्थापित किया.
वर्ष 1975 में भारत में आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप की घोषणा के समय साधना के प्रकाशक–संपादक यदुनाथ दत्तात्रेय थत्ते थे, जिन्होंने सेंसरशिप नियमों को मानने से इनकार कर दिया. आपातकाल की घोषणा के ठीक बाद ‘साधना’ के प्रकाशित पहले अंक में मुखपृष्ठ पर काला आवरण, दूसरे पृष्ठ पर साने गुरुजी का अंतिम वक्तव्य और तीसरे पृष्ठ पर साने गुरुजी की तसवीर प्रकाशित की. इसके अगले सप्ताह के अंक में मुखपृष्ठ पर काला आवरण, दूसरे पृष्ठ पर विनोबा भावे का एक भाषण और तीसरे पृष्ठ पर विनोबा भावे की तसवीर प्रकाशित की.
सेंसर अधिकारियों ने इन दोनों अंकों को व्यवस्था के लिए हानिकारक रिपोर्टिग बता कर जब्त कर लिया. ‘साधना’ ने सेंसर के विरोध का यह तरीका जारी रखा और अगले अंकों में काले मुख्य पृष्ठ के साथ भीतर के पन्नों पर बाल गंगाधर तिलक, रवींद्र नाथ टैगोर को प्रकाशित किया.
सेंसर अधिकारियों ने ये दोनों अंक भी व्यवस्था के लिए हानिकारक बता कर जब्त कर लिये और ‘साधना’ के प्रकाशकों को 1000 रुपयों की जमानत राशि देने का आदेश दिया. ‘साधना’ के अगले अंक के प्रकाशन के बाद वह अंक और जमानत राशि दोनों ही जब्त कर ली गयीं. 17 जुलाई 1975 से 11 अक्तूबर 1975 के बीच ‘साधना’ के 11 अंकों को जब्त किया गया और इसके बाद ‘साधना’ प्रेस को ही बंद करने का आदेश दे दिया गया.
‘साधना’ के प्रकाशक–संपादक यदुनाथ थत्ते ने बंबई उच्च न्यायालय में सेंसर अधिकारियों के खिलाफ याचिका दायर की. सात दिसंबर 1976 को इस याचिका पर निर्णय देते हुए न्यायमूर्ति वीडी तुलजापुरकर व बीसी गाडगिल ने सेंसर अधिकारियों की कार्यवाही को पूरी तरह से अनुचित बताया और सेंसर की ओर से ‘साधना’ में छपी 35 खबरों–लेखों को व्यवस्था के लिए हानिकारक रिपोर्टिग मानने से इनकार कर दिया.
इस अदालती फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि इसमें विधि सम्मत भारत गणराज्य को तत्कालीन मंत्रियों, राजनीतिक पदाधिकारियों से अलग माना गया और अदालत के अनुसार इन राजनीतिक व्यक्तियों की आलोचना और उनके अहिंसक –शांतिपूर्ण विरोध के लिए आह्वान को भारत राष्ट्र के लिए हानिकारक नहीं माना जा सकता. आपातकाल के दौरान प्रशासनिक दमन के विरुद्ध साधना के इस अभियान को आज भी एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जाता है.
महाराष्ट्र में समाजवादी आंदोलन के प्रमुख सदस्य, पत्रकार और अनेक पुस्तकों के लेखक यदुनाथ थत्ते का 10 मई 1998 को निधन हो गया लेकिन ‘साधना’ साप्ताहिक आज भी अपने गौरवशाली इतिहास के अनुरूप ही सामाजिक कुव्यवस्था के विरु द्ध वैचारिक–बौद्धिक अभियान में पूरी दृढ़ता से जुटा हुआ है.