पुरखों का स्मरण

Published at :15 Sep 2019 2:14 AM (IST)
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पुरखों का स्मरण

काशी प्रसाद जायसवाल (1881-1937) प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के क्षेत्र मेें किये गये अपने ऐतिहासिक कार्य के लिए जाने जाते हैं. og हिंदी नवजागरण काल के बहुआयामी व्यक्तित्व के लेखक थे. संपन्न व्यावसायिक परिवार में जन्मे जायसवाल आजीविका के लिए जीवनपर्यंत पटना में बैरिस्टरी करते रहे. उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में डूबे हुए रतन […]

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काशी प्रसाद जायसवाल (1881-1937) प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के क्षेत्र मेें किये गये अपने ऐतिहासिक कार्य के लिए जाने जाते हैं. og हिंदी नवजागरण काल के बहुआयामी व्यक्तित्व के लेखक थे. संपन्न व्यावसायिक परिवार में जन्मे जायसवाल आजीविका के लिए जीवनपर्यंत पटना में बैरिस्टरी करते रहे.

उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में डूबे हुए रतन लाल ने उनके संबंधियों, मित्रों और विद्वानों के लेखों को ‘काशी प्रसाद जायसवाल : संस्मरण, श्रद्धांजलि एवं समालोचना’ किताब में संग्रहित किया है. इसको प्रकाशित करने का काम सस्ता साहित्य मंडल ने किया है.
औपनिवेशिक शासन के दौर को समझने के लिए भी जायसवालजी के लिखे-पढ़े और और उन पर लिखे साहित्य से गुजरना जरूरी है. उनके गुजरने के लगभग अस्सी साल बाद रतन लाल के दिन-रात की मेहनत के कारण ही जायसवाल के लिखे-पढ़े का व्यवस्थित प्रकाशन संभव हो सका है.
जायसवाल ने भारतीय इतिहास, पुरात्तत्व, मुद्राशास्त्र, भाषा, लिपि संबंधी अपने अध्ययन-अनुसंधान और चिंतन से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ बौद्धिक लड़ाई लड़ी और भारतीय जनमानस को पश्चिम के सत्ता-ज्ञानमूलक वर्चस्व से मुक्त करने का प्रयास किया.
शुरुआती दौर में लेखन का अधिकांश अंग्रेजी में है, किंतु वे बालकृष्ण भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी और श्याम सुंदर दास आदि के साथ उनकी गहरी रुचि हिंदी भाषा और हिंदीभाषी समाज के बौद्धिक जागरण के लिए भी प्रतिबद्ध थे. वे रामचंद्र शुक्ल के समकालीन थे, राहुल सांकृत्यायन के मित्र रहे और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के संरक्षक व्यक्तित्व के रूप में भी उन्हें जाना जाता है.
जायसवाल के समकालीन रहे रामचंद्र शुक्ल ने उनके खिलाफ लिखने के बाद उनसे क्षमा मांगी थी. उनके एक और समकालीन और मित्र रहे राहुल सांकृत्यायन के ये शब्द ‘हा मित्र! हा बंधु! हा गुरो! अब तुम मना नहीं करनेवाले नहीं हो, इसलिए हमें ऐसा संबोधन करने से कौन रोक सकता है. हो सकता है, तुम कहते- हमने भी तो आपसे सीखा है, किंतु तुम नहीं जानते (कि) मैंने कितना तुमसे सीखा है.’ भले आज उनके लेखन और विचार लोगों को प्रासंगिक लगे या न लगे, तत्कालीन समय को समझने की दिशा में रतन लाल का यह प्रयास सराहनीय है.
मनोज मोहन
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