GSLV-F17 की सफलता ने बदली ISRO की कहानी, Cryogenic Engine से हासिल की बड़ी कामयाबी
GSLV-F17 मिशन के जरिए EOS-05 को Geosynchronous Orbit में स्थापित किया गया, जिससे लगातार Earth Observation की नई क्षमता मिलने की उम्मीद है।
भारत का GSLV रॉकेट, जिसने कई असफलताओं के बाद क्रायोजेनिक इंजन तकनीक में महारत हासिल की। EOS-05 सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण ने इसकी विश्वसनीयता साबित की है।
भारत का Geosynchronous Satellite Launch Vehicle यानी GSLV आज एक भरोसेमंद लॉन्च सिस्टम के तौर पर अपनी पहचान बना चुका है। 4 सितंबर 2026 को GSLV-F17 ने EOS-05 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक ऑर्बिट में पहुंचाया और इसके साथ GSLV ने अपना 19वां मिशन पूरा किया।
हालांकि, GSLV का सफर इतना आसान नहीं रहा। शुरुआती नाकामियों से लेकर स्वदेशी Cryogenic Engine तकनीक में महारत हासिल करने तक, इस रॉकेट की कहानी भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तकनीकी विकास को भी दिखाती है।
शुरुआती मिशनों में मिली कई चुनौतियां
GSLV की पहली उड़ान अप्रैल 2001 में हुई थी। उस मिशन में GSAT-1 सैटेलाइट निर्धारित ऑर्बिट तक नहीं पहुंच पाया। इसके बाद कुछ मिशन सफल रहे, कुछ आंशिक रूप से सफल हुए, जबकि चार मिशन असफल रहे।
साल 2010 GSLV के लिए खास तौर पर चुनौतीपूर्ण रहा। इस दौरान दो बड़े मिशन असफल हुए और पहली बार भारत का स्वदेशी Cryogenic Upper Stage भी मिशन में सफल नहीं हो पाया।
Cryogenic तकनीक GSLV के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसमें बेहद कम तापमान पर रखे जाने वाले Liquid Hydrogen और Liquid Oxygen जैसे Propellants का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक ने भारत को भारी सैटेलाइट्स को ज्यादा ऊंची ऑर्बिट में भेजने की क्षमता विकसित करने में मदद की।
2014 में बदली GSLV की कहानी
GSLV के सफर में सबसे बड़ा मोड़ 5 जनवरी 2014 को आया। इस दिन GSLV-D5 ने GSAT-14 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया और भारत का स्वदेशी Cryogenic Engine पहली बार सफलतापूर्वक काम कर पाया।
इसके बाद GSLV की Reliability में लगातार सुधार हुआ। शुरुआती 18 मिशनों में 12 सफल, 2 आंशिक सफल और 4 असफल रहे थे। यानी सफलता दर करीब 66.7% थी।
2014 के बाद हुए 11 मिशनों में 10 सफल रहे। इससे सफलता दर बढ़कर करीब 90.9% हो गई।
| अवधि | सफल मिशन | आंशिक सफल | असफल | सफलता दर |
| शुरुआती 18 मिशन | 12 | 2 | 4 | 66.7% |
| 2014 के बाद 11 मिशन | 10 | — | 1 | 90.9% |
हर सफल उड़ान के साथ ISRO के इंजीनियरों को Engine, Stage, Guidance और Thermal Systems को बेहतर समझने और सुधारने का अनुभव मिला।
EOS-05 क्यों है खास?
GSLV-F17 मिशन की सफलता सिर्फ रॉकेट के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। इस मिशन में भेजा गया EOS-05 भी खास भूमिका निभा सकता है।
यह भारत का पहला Imaging Satellite है, जिसे Geosynchronous Orbit से Earth Observation के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। सामान्य Earth Observation Satellites किसी क्षेत्र के ऊपर से समय-समय पर गुजरते हैं, जबकि Geosynchronous Orbit से काम करने वाला सैटेलाइट बड़े क्षेत्र पर लगातार निगरानी में मदद कर सकता है।
इससे बाढ़, जंगल की आग, मौसम, खेती, प्राकृतिक संसाधनों और समुद्री गतिविधियों की निगरानी जैसे कामों में फायदा हो सकता है।
सैटेलाइट से मिलने वाले लगातार और बार-बार के डेटा का इस्तेमाल Private Space और Geospatial कंपनियां भी अलग-अलग Applications और Intelligence तैयार करने में कर सकती हैं।
सुरक्षा और Maritime Monitoring में भी मदद
EOS-05 की लगातार Imaging क्षमता का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्रों की निगरानी में भी किया जा सकता है। इसे Low-Earth Orbit और Radar Satellites से मिलने वाले डेटा के साथ इस्तेमाल करने पर Maritime Surveillance, Illegal Fishing की Tracking और प्राकृतिक आपदाओं की पहचान जैसी क्षमताओं को बेहतर किया जा सकता है।
इसके अलावा किसी खास क्षेत्र को कम अंतराल पर देखने की क्षमता Disaster Management और Security Monitoring के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
GSLV से आगे अब LVM3 की बारी
आज GSLV ISRO का सबसे शक्तिशाली रॉकेट नहीं है। LVM3 इससे ज्यादा भारी Payload को अंतरिक्ष में पहुंचा सकता है। यह Geosynchronous Transfer Orbit में करीब 4 टन और Low-Earth Orbit में करीब 10 टन तक का वजन ले जाने में सक्षम है।
GSLV में विकसित Cryogenic तकनीक का अनुभव LVM3 के CE20 Engine के विकास में भी महत्वपूर्ण रहा है। CE20 इंजन कई सफल LVM3 मिशनों में इस्तेमाल हो चुका है।
Gaganyaan में भी काम आएगी Cryogenic तकनीक
Cryogenic Engine तकनीक का इस्तेमाल भारत के Gaganyaan Programme में भी महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए Human-Rated LVM3 यानी HLVM3 का इस्तेमाल किया जाएगा।
इसमें अतिरिक्त Safety Systems और Crew Escape System शामिल होंगे। Cryogenic Engine के Human-Rating Qualification के लिए कई Hot-Firing Tests किए जा चुके हैं।
यह तकनीकी अनुभव भारत के Human Spaceflight Programme के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है।
अब NGLV पर ISRO की नजर
ISRO अब अगली पीढ़ी के Next Generation Launch Vehicle (NGLV) पर भी काम कर रहा है। प्रस्तावित NGLV आंशिक रूप से Reusable होगा और Low-Earth Orbit में करीब 30 टन तक Payload पहुंचाने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है।
इसके First Stage में LOX-Methane Engine का इस्तेमाल करने की योजना है। यह Stage वापस उतरकर दोबारा इस्तेमाल किए जाने के लिए डिजाइन किया जा रहा है।
भारत के बड़े Space Goals भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और भविष्य के Crewed Lunar Mission के लिए Heavy-Lift और Reusable Launch Systems महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी दिशा में श्रीहरिकोटा में तीसरे Launch Pad को भी मंजूरी दी जा चुकी है।
GSLV की पहली उड़ान अप्रैल 2001 में हुई थी।
Cryogenic Engine GSLV को भारी सैटेलाइट्स को Geosynchronous Orbit तक पहुंचाने के लिए जरूरी तकनीक उपलब्ध कराता है।
EOS-05 से बड़े क्षेत्रों की लगातार और बार-बार Imaging में मदद मिल सकती है, जिसका उपयोग मौसम, बाढ़, जंगल की आग, खेती, प्राकृतिक संसाधनों और Maritime Surveillance में किया जा सकता है।
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