शोक संदेश पर माकपा पोलित ब्यूरो व राज्य कमेटी में अलगाव
Updated at : 14 Aug 2018 5:21 AM (IST)
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कोलकाता : लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को माकपा से बहिष्कृत किये जाने के फैसले को लेकर जिस तरह से माकपा पोलित ब्यूरो व बंगाल राज्य कमेटी में विवाद था. श्री चटर्जी के निधन के बाद भी यह विवाद कायम रहा. श्री चटर्जी के निधन के बाद माकपा पोलित ब्यूरो द्वारा जारी शोक संदेश […]
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कोलकाता : लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को माकपा से बहिष्कृत किये जाने के फैसले को लेकर जिस तरह से माकपा पोलित ब्यूरो व बंगाल राज्य कमेटी में विवाद था. श्री चटर्जी के निधन के बाद भी यह विवाद कायम रहा. श्री चटर्जी के निधन के बाद माकपा पोलित ब्यूरो द्वारा जारी शोक संदेश में श्री चटर्जी को न तो कॉमरेड के रूप में उल्लेख किया गया और न ही माकपा के पूर्व सांसद के रूप में उनका उल्लेख किया गया.
पोलित ब्यूरो के शोक संदेश में दिवंगत चटर्जी को लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष व 10 बार लोकसभा के सांसद रहे श्री चटर्जी को श्रद्धांजलि दी गयी. शोक संदेश में कहा कि वह एक वरिष्ठ सांसद रहे थे, जिन्होंने भारतीय संविधान के मूल तत्वों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी तथा वह एक नामी गिरामी वकील थे, लेकिन माकपा पोलित ब्यूरो के शोक संदेश में माकपा सांसद के रूप में उनका उल्लेख नहीं किया गया था.
इसे लेकर विभिन्न हलकों में काफी आलोचना शुरू हुई. उसके बाद शाम को माकपा राज्य कमेटी की बैठक हुई. माकपा राज्य कमेटी द्वारा जारी शोक संदेश में श्री चटर्जी को माकपा केंद्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य, वरिष्ठ सांसद कॉमरेड के रूप में संबोधित किया गया. शोक संदेश में कहा गया कि वरिष्ठ कानूनविद् कॉमरेड सोमनाथ चटर्जी ने 1971 में बर्धमान लोकसभा केंद्र से माकपा के सांसद के रूप में निर्वाचित हुए थे. 1977 में जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से विजयी हुए. 1985 से 2009 तक बोलपुर लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया.
2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष पद पर रहे. राज्य कमेटी द्वारा जारी बयान में कहा गया कि कॉमरेड सोमनाथ चटर्जी गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता व मानवाधिकार के प्रश्न पर वामपंथियों के साथ रहे. विशेष कर राज्य में गणतंत्र पर हमले की आलोचना की और राज्य में गणतांत्रिक अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठायी. बाद में माकपा राज्य सचिव डॉ सूर्यकांत मिश्रा ने कहा कि स्वीकार किया कि कॉमरेड सोमनाथ चटर्जी केवल बंगाल ही नहीं, वरन पूरे भारत वर्ष के थे और गणतांत्रिक आंदोलन व प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कायम करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
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