1000 बांग्ला मीडियम स्कूल बंद होने के कगार पर

Published at :01 Aug 2018 1:53 AM (IST)
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1000 बांग्ला मीडियम स्कूल बंद होने के कगार पर

कोलकाता : ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में जहां अंग्रेजी भाषा का प्रचलन बढ़ रहा है, वहीं राज्य के सरकारी व सरकारी अनुदान प्राप्त बांग्ला मीडियम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की अभिभावकों की रुचि खत्म हो रही है. इन स्कूलों में न तो बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर है, न ही पर्याप्त शिक्षक ही उपलब्ध रहते हैं. स्थिति […]

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कोलकाता : ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में जहां अंग्रेजी भाषा का प्रचलन बढ़ रहा है, वहीं राज्य के सरकारी व सरकारी अनुदान प्राप्त बांग्ला मीडियम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की अभिभावकों की रुचि खत्म हो रही है. इन स्कूलों में न तो बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर है, न ही पर्याप्त शिक्षक ही उपलब्ध रहते हैं. स्थिति यह है कि कई स्कूलों में छात्रों की संख्या घटकर मात्र 30-40 ही रह गयी है.
यही कारण है कि अब पश्चिम बंगाल के ऐसे लगभग 1000 बांग्ला मीडियम प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक सरकारी स्कूलों को बंद करने की नौबत आ गयी है. आने वाले एक-दो महीने में ही राज्य के ऐसे कई रुग्ण स्कूलों को बंद किया जायेगा. इसमें कोलकाता के 125 व हावड़ा के 43 बांग्ला मीडियम स्कूल भी शामिल हैं.
बंद होने वाले स्कूलों में बंगवासी हाई स्कूल, कलकत्ता एकेडमी, पांचजन्य हाई स्कूल फॉर गर्ल्स, पूर्व कलिकत्ता विद्यायतन (बेलियाघाटा), नाकतला भारती विद्या भवन, जापुड़दा शारदामणि बालिका विद्यायतन (डोमजूड़) व उत्तर कोलकाता के कई स्कूल शामिल हैं. अभी तक खराब इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण ओशिकी दत्त गर्ल्स स्कूल, गौरीय विद्या मंदिर, साउथ कलकत्ता विद्या मंदिर, ओरिएंटल सेमिनरी स्कूल (कालीघाट) व नार्थ कलकत्ता के कई स्कूल बंद हो चुके हैं. शिक्षक संगठनों का कहना है कि राज्य सरकार की खराब नीतियों के कारण अब बांग्ला मीडियम स्कूल बंद होने के कगार पर हैं.
स्कूल में न तो शिक्षक हैं न ही अाधारभूत सुविधाएं. छात्रों ने स्कूल में आना बंद कर दिया है. यही कारण है कि इस बार माध्यमिक में लगभग 44 बांग्ला मीडियम स्कूलों में प्रत्येक में से केवल 5 या इससे भी कम छात्र ही परीक्षा में बैठ पाये हैं. राज्य के 152 स्कूलों‍ में से मात्र 19-20 व उससे भी कम छात्र माध्यमिक परीक्षा में बैठे.
स्थिति यह है कि कई बंद पड़े स्कूलों में अब स्थानीय असामाजिक तत्व प्रमोटरी राज चला रहे हैं. वहीं कुछ शिक्षकों का मानना है कि 1980 से 2003 तक बांग्ला मीडियम स्कूलों में अंग्रेजी बंद होने के कारण लोगों का रुझान घटा एवं निम्न मध्य वर्गीय परिवार भी निजी स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला दिलाने के लिए उन्मुख हुए हैं.
क्या कहते हैं शिक्षक संगठनों के पदाधिकारी
सेकेंडरी टीचर्स एंड इंप्लाइज एसोसिएशन के महासचिव विश्वजीत मित्र ने कहा स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं. पास-फेल प्रथा हटा दी गयी है, इसलिए अभिभावकों की इन स्कूलों में रुचि नहीं है. कलकत्ता कॉरपोरेशन के 127 प्राथमिक स्कूलों में से प्राय: 35 बंद हो गये हैं. अन्य 50 भी बंद होने के कगार पर हैं. एक समय था जब कुछ समाजसेवी मिलकर स्कूलों की स्थापना करते थे. बाद में सरकार जमीन व अन्य सुविधाएं मुहैया कराती थी. अब यह जज्बा खत्म हो गया है.
केंद्र व राज्य सरकारें शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दे रही हैं. राज्य के बांग्ला मीडियम स्कूल कि स्थिति यह है कि एक-एक स्कूल में 5-10 छात्र ही रह गये हैं. बंद पड़े स्कूलों में कुछ असामाजिक तत्व प्रमोटरी कर रहे हैं. यह भी शिक्षा केंद्रों की विडम्बना है.
बंगीय शिक्षक-ओ-शिक्षाकर्मी समिति के सहसचिव सपन मंडल ने कहा राज्य के नामी बांग्ला मीडियम स्कूल भी अब बंद होने के कगार पर हैं, क्योंकि वहां सुविधाएं नहीं हैं. शिक्षक नहीं हैं. सरकार इन स्कूलों में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कोई गंभीर काम नहीं कर रही है, यही कारण है कि यहां छात्रों की संख्या घटती जा रही है.
सरकार वित्तीय फायदे के लिए खुद इन स्कूलों को नहीं चलाना चाहती है. दूसरे, बंगाल में कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी एक ही संतान है, वे अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देने के लक्ष्य से निजी स्कूल में दाखिला दिला रहे हैं. सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि सरकारी बांग्ला मीडियम स्कूलों का सिलेबस अनसाइन्टिफिक तरीके से बनाया गया है. आजकल अभिभावकों पर भी अंग्रेजी का प्रभाव है, वे निजी स्कूलों की ओर जा रहे हैं. ऐसे में बांग्ला मीडियम स्कूलों का अस्तित्व धुंधला हो रहा है.
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