UP News: क्या गांव के विकास के लिए वायरल होना जरूरी? बलिया की रागिनी का वीडियो सामने आया तो पहुंच गए DM, अब सड़क बनाने का भी निर्देश
क्या गांव के विकास के लिए वायरल होना जरूरी?
UP News: एक मासूम बच्ची के जज्बे ने प्रशासन को जगाया, लेकिन क्या सिस्टम की संवेदनशीलता वायरल वीडियो पर ही निर्भर है? बलिया के रानीपुर गांव की रागिनी की कहानी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है.
UP News: एक मासूम बच्ची एक पैर पर कूद-कूदकर करीब 400 मीटर दूर स्कूल जाती रही. उसकी परेशानी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो प्रशासन की नजर उस तक पहुंची. जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह खुद रागिनी के घर पहुंचे, ट्राईसाइकिल और पढ़ाई का सामान दिया, इलाज का भरोसा दिलाया और अब उसके गांव की जर्जर सड़क का एस्टीमेट तैयार कराने का निर्देश भी दिया है. लेकिन रागिनी की कहानी सिर्फ एक बच्ची के संघर्ष और प्रशासन की संवेदनशीलता की कहानी नहीं है. यह एक बड़ा सवाल भी छोड़ जाती है—क्या बलिया के गांवों की बदहाल सड़कें, गरीब परिवारों की समस्याएं और बच्चों की परेशानियां तब तक प्रशासन तक नहीं पहुंचेंगी, जब तक उनका वीडियो वायरल न हो जाए?
रागिनी की मजबूरी कैमरे में कैद हुई, तब पहुंचा सिस्टम
मनियर ब्लॉक की दिघेड़ा ग्रामसभा के रानीपुर गांव की सात वर्षीय रागिनी प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा में कक्षा एक की छात्रा है. बचपन में हुए हादसे के बाद उसके एक पैर में गंभीर समस्या है. इसके बावजूद पढ़ाई के प्रति उसका जज्बा ऐसा है कि वह एक पैर के सहारे कूदते हुए स्कूल पहुंचती रही. उसका यह संघर्ष वीडियो में सामने आया और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया. वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ. डीएम ने पहले अधिकारियों और डॉक्टरों को रागिनी के घर भेजा और फिर खुद गांव पहुंचे. इस दौरान रागिनी को ट्राईसाइकिल, किताबें और पढ़ाई की सामग्री उपलब्ध करायी गयी. उसकी पढ़ाई बाधित नहीं होने देने का भरोसा भी दिया गया.
डीएम को खुद करीब एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ा
रागिनी के गांव तक पहुंचने का रास्ता भी प्रशासन के सामने सवाल बनकर खड़ा हो गया. जर्जर और कीचड़ भरे रास्ते के कारण जिलाधिकारी को अपना वाहन छोड़कर करीब एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. रागिनी के घर से स्कूल तक जाने वाले खराब मार्ग को देखने के बाद डीएम ने प्रधान, सचिव और बीडीओ को सड़क का एस्टीमेट तैयार कर भेजने का निर्देश दिया. यानी जिस सड़क पर रागिनी रोज अपनी मजबूरी के साथ चलती थी, उसकी बदहाली अब प्रशासन की फाइल तक पहुंच गई है.
सवाल रागिनी से बड़ा है...
रागिनी को मदद मिलना निश्चित तौर पर राहत और उम्मीद की बात है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है. अगर रागिनी का वीडियो वायरल नहीं होता तो क्या डीएम को उस गांव की बदहाल सड़क दिखाई देती? क्या गांव की सड़क, नाली, बिजली, पानी और गरीब परिवारों की समस्याओं के समाधान के लिए सोशल मीडिया पर वायरल होना जरूरी है? क्या हर उस बच्चे की समस्या प्रशासन तक पहुंचने के लिए कैमरे के सामने आना जरूरी है, जो संसाधनों के अभाव में भी पढ़ने की कोशिश कर रहा है? ये सवाल किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत आरोप नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल हैं जिसमें अक्सर कोई मामला सुर्खियों में आने के बाद तेजी से कार्रवाई होती दिखाई देती है.
रागिनी की कहानी व्यवस्था के लिए आईना
रागिनी ने तो अपनी मजबूरी को एक अपील में बदल दिया. उसका वीडियो सामने आया और मदद के हाथ बढ़ने लगे. लेकिन गांव में ऐसे कितने रागिनी होंगे, जिनकी समस्याएं कैमरे तक नहीं पहुंचतीं? रागिनी को ट्राईसाइकिल मिल गयी, पढ़ाई में मदद का भरोसा मिल गया और गांव की सड़क को लेकर भी प्रक्रिया शुरू हुई है. अब उम्मीद यही है कि वायरल वीडियो का असर सिर्फ रागिनी तक सीमित न रहे, बल्कि उसके गांव की दूसरी समस्याओं का भी स्थायी समाधान हो. क्योंकि किसी गांव को विकास के लिए वायरल होने की नहीं, नियमित सरकारी निगरानी और जिम्मेदार प्रशासन की जरूरत होती है.
सबसे बड़ा सवाल
रागिनी का वीडियो वायरल हुआ, डीएम गांव पहुंचे और सड़क का एस्टीमेट बनाने का निर्देश हुआ. अब सवाल यह है—बलिया के कितने और गांव ऐसे हैं, जिन्हें अपनी समस्या बताने के लिए अगली बार किसी रागिनी के वायरल होने का इंतजार करना पड़ेगा?
यह भी पढ़ें: UP में कहां कितनी सरकारी जमीन और किसका है कब्जा? योगी सरकार ने पूरे यूपी में सर्वे का दिया आदेश
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए