केंद्र vs झारखंड: क्या सच में छीन लिए गए हेमंत सरकार के अधिकार? जानिए MMDR बिल का पूरा सच

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MMDR संशोधन बिल 2026 पर झारखंड से जुड़े सवाल और उनके जवाब, Pic Credit- AI, Only for symbolism

झारखंड में MMDR संशोधन 2026 को लेकर सियासत गरमाई है. राज्य सरकार इसे 'काला कानून' बता रही है, तो केंद्र सरकार आरोपों को खारिज कर रही है. जानिए इस विवाद की पूरी सच्चाई और इसके असल प्रावधान.

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रांची : हाल ही में लोकसभा से पास हुए खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 (MMDR Amendment Bill, 2026) को लेकर झारखंड का राजनीतिक पारा गर्म बढ़ा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सत्तारूढ़ झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने इसे "काला कानून" करार दिया है. राज्य सरकार का आरोप है कि केंद्र का यह नया कानून झारखंड के राजस्व पर हर साल 14,000 करोड़ रुपये तक का आर्थिक डाका डालेगा, जिससे 'मईयां सम्मान योजना' और 'अबुआ आवास' जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं. वहीं दूसरी ओर, केंद्र सरकार इस आरोप को पूरी तरह खारिज कर रही है. आज हम इसी सवालों का पीआईबी के ऑफिशियल साइट से मिली जानकारी के अनुसार देने की कोशिश करेंगे, ताकि आम जनता का भ्रम दूर हो. तो आइये जानते हैं झारखंड के परिप्रेक्ष्य में उठ रहे तमाम आरोपों और वास्तविक प्रावधानों के बीच क्या है पूरा सच?

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क्या केंद्र सरकार ने MMDR संशोधन 2026 के जरिए झारखंड जैसे राज्यों की कमाई और अधिकार छीन लिए हैं?

ये सबसे कॉमन सवाल है जो लोगों के मन में उठ रहा है. क्योंकि कुछ दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा था कि झारखंड के खनिज फैसला दिल्ली में बैठे लोग क्यों करेंगे?" झामुमो और कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र ने राज्य के अपने अधिकार क्षेत्र में नए सेस (Cess) या टैक्स लगाने की शक्ति को बाधित कर दिया है, जिससे भविष्य में झारखंड को 14,000 करोड़ रुपये सालाना का भारी नुकसान होगा. हालांकि, ऐसा नहीं है. राज्यों की मौलिक कमाई या राजस्व अधिकार अब तक नहीं छीने गए हैं. खनन से प्राप्त होने वाले कुल राजस्व का लगभग 90% हिस्सा अब भी सीधे राज्य सरकारों (झारखंड) के खजाने में ही जाता है. 2015 से शुरू की गई पारदर्शी ई-नीलामी प्रक्रिया के बाद से राज्यों का खनन राजस्व 354% तक बढ़ा है. संशोधन का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि राज्य अपनी मर्जी से खनिज-युक्त भूमियों पर मनमाना टैक्स न लगाएं जो राष्ट्रीय स्तर पर उद्योगों और बिजली-उत्पादन को संकट में डाले. केंद्र का तर्क है कि राज्यों को मिलने वाली रॉयल्टी और नीलामियों से मिलने वाली राशि पूर्ववत मिलती रहेगी.

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क्या बालू, बजरी और गिट्टी-पत्थर जैसी रोजमर्रा की चीजों पर अब झारखंड सरकार का नियंत्रण खत्म हो जाएगा?

MMDR बिल पास होने के बाद से यह आशंका जताई जा रही है राज्य अब जमीन और बुनियादी खनिजों पर अपना नियंत्रण थोप देगा. हालांकि ये अंदेशा पूरी तरह से बेबुनियाद है. इस एक्ट के तहत खनिजों को 'मुख्य खनिज' (Major Minerals) और 'लघु खनिज' (Minor Minerals) में बांटा गया है. बालू (रेत), बजरी, संगमरमर, ईंट की मिट्टी और इमारती पत्थर जैसे लगभग 50 लघु खनिजों पर राज्य सरकार (झारखंड) का 100% अधिकार और नियंत्रण पहले की तरह ही सुरक्षित है. इनके नियम तय करने, नीलामी करने और इनसे टैक्स व राजस्व वसूलने की पूरी शक्ति राज्य के पास ही रहेगी.

झारखंड के बहुचर्चित बकाया टैक्स विवाद और 'मिनरल बियरिंग लैंड सेस' पर इस कानून का क्या असर पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2024 के फैसले के आधार पर झारखंड सरकार ने 'झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस एक्ट 2024' लागू किया था, जिससे राज्य को वित्तीय वर्ष 2026-27 में लगभग 13,000 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व की उम्मीद थी. सवाल ये है कि क्या अब इतना ही टैक्स मिलता रहेगा? तो इसका जवाब है नहीं. नए संशोधन विधेयक की धारा 9D के तहत, राज्य अब केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना खनिज-युक्त भूमि पर अलग से सेस या नया टैक्स नहीं लगा सकते. इसके साथ ही, कानून में प्रावधान किया गया है कि संशोधन लागू होने से पहले के अप्रमाणित या लंबित (Retroactive) राज्य कर दावों को अमान्य माना जाएगा. हालांकि इस संबंध में हेमंत सोरेन सरकार का कहना है कि यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना के खिलाफ है और इससे केंद्र सरकार डीवीसी, कोल इंडिया और अन्य पीएसयू पर झारखंड का बकाया वसूलने के रास्ते बंद कर रही है. राज्य सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने और सड़कों पर आंदोलन करने का ऐलान किया है. दूसरी तरफ केंद्र का मानना है कि राज्यों द्वारा अलग-अलग और अत्यधिक सेस लगाने से कोयला और इस्पात अत्यधिक महंगा हो जाता है, जिससे देश भर में महंगाई बढ़ती है और घरेलू खदानें बंद होने के कगार पर पहुंच जाती हैं. इस कानून से कानूनी अनिश्चितता खत्म होगी और निवेशक सुरक्षित महसूस करेंगे.

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