जेल में 26 साल से बंद अनिल शर्मा को झारखंड हाईकोर्ट से राहत, समयपूर्व रिहाई पर फिर होगा विचार
झारखंड हाईकोर्ट का फाइल फोटो.
झारखंड हाईकोर्ट ने 26 साल से जेल में बंद अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई पर पुनर्विचार का आदेश दिया है. अदालत ने स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड का फैसला रद्द कर कैदी के आचरण, सुधार और पुनर्वास पर नए सिरे से विचार करने को कहा है.
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई के मामले में अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने 25 मार्च 2026 को स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की ओर से उनकी रिहाई की मांग खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है. अदालत ने मामले को दोबारा विचार के लिए बोर्ड के पास भेजते हुए विस्तृत और कारणों के साथ नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है. इस फैसले से अनिल शर्मा को समयपूर्व रिहाई की मांग पर फिर से विचार होने का रास्ता खुला है. हालांकि, हाईकोर्ट ने उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश नहीं दिया है.
हत्या के मामले में सजा काट रहे हैं अनिल शर्मा
अनिल शर्मा ने झारखंड हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिट याचिका संख्या 307/2026 दायर कर समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज करने वाली अधिसूचना को चुनौती दी थी. मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने 13 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया. अनिल शर्मा को वर्ष 1999 के लोअर बाजार थाना कांड संख्या 12/99 में जेल के एक बंदी सुधीर सिंह उर्फ भोमा की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. ट्रायल कोर्ट ने 22 मार्च 2002 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी. बाद में हाईकोर्ट ने 29 नवंबर 2002 को मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया. सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल 2004 को उनकी अपील खारिज कर दी थी. अदालत के फैसले के अनुसार, अनिल शर्मा 26 साल से अधिक वास्तविक कारावास और रिमिशन सहित करीब 29 साल की अवधि जेल में बिता चुके हैं.
बार-बार खारिज हुई थी समयपूर्व रिहाई की मांग
अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई की मांग स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड ने कई बार खारिज की थी. बोर्ड ने जेल में दूसरे बंदी की हत्या, रिहाई के बाद गैंगवार की आशंका और सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना को आधार बनाया था. न्यायिक हिरासत से पहले फरार होने की घटना का भी उल्लेख किया गया था. इससे पहले हाईकोर्ट ने 19 अक्टूबर 2022 को मामले को दोबारा विचार के लिए बोर्ड के पास भेजा था. इसके बावजूद 22 जून 2023, 14 अगस्त 2024, 19 फरवरी 2025 और 1 सितंबर 2025 को उनकी रिहाई की मांग खारिज की गई. अंततः 25 मार्च 2026 की अधिसूचना को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई.
बोर्ड ने पुराने आरोपों को ही बनाया आधार
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार ने दलील दी कि अनिल शर्मा 1984 की बिहार सरकार की नीति के तहत समयपूर्व रिहाई के पात्र हैं. उन्होंने कहा कि इस नीति के अनुसार 14 साल की वास्तविक कैद और रिमिशन सहित 20 साल की अवधि पूरी करने के बाद मामले पर विचार किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि झारखंड की बाद की नीति के तहत भी वह निर्धारित अवधि से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं. राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई से गैंगवार और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका है. सरकार के अनुसार, निर्धारित अवधि पूरी कर लेने से किसी कैदी को अपने आप रिहाई का अधिकार नहीं मिल जाता. इस पर फैसला लेने का अधिकार स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड के पास है.
प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट पर भी नहीं हुआ विचार
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रोबेशन अधिकारी की 18 सितंबर 2024 की रिपोर्ट में अनिल शर्मा की उम्र, स्वास्थ्य, जेल में व्यवहार और समाज में दोबारा शामिल होने की संभावना पर सकारात्मक बातें दर्ज थीं. रिपोर्ट के अनुसार, जेल में उनका व्यवहार संतोषजनक रहा है. उन्हें कई बार पैरोल भी मिली और इस दौरान उनका आचरण ठीक रहा. रिपोर्ट में अपराध दोहराने की आशंका कम होने का भी उल्लेख था. अदालत ने कहा कि बोर्ड ने इन पहलुओं पर पर्याप्त चर्चा नहीं की. रिहाई खारिज करने वाले आदेशों में लगभग एक जैसे कारण दोहराए गए. बोर्ड ने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्रोबेशन अधिकारी की सकारात्मक रिपोर्ट के बावजूद गैंगवार और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका किस आधार पर बनी हुई है. अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि न्यायिक हिरासत से फरार होने के मामले में अनिल शर्मा को 25 फरवरी 2014 को अपीलीय अदालत से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था. इसके बावजूद बोर्ड ने इस आरोप को रिहाई खारिज करने का आधार बनाया.
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केवल अपराध की गंभीरता से नहीं होगा फैसला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रोहित चतुर्वेदी बनाम उत्तराखंड राज्य मामले के फैसले का भी उल्लेख किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि समयपूर्व रिहाई पर विचार करते समय केवल पुराने अपराध की गंभीरता देखना पर्याप्त नहीं है. कैदी के मौजूदा व्यवहार, सुधार, दोबारा अपराध करने की आशंका और समाज में लौटने की संभावना का भी आकलन जरूरी है. अदालत ने 25 मार्च 2026 की अधिसूचना रद्द करते हुए निर्देश दिया कि अनिल शर्मा का मामला स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की अगली बैठक में अनिवार्य रूप से रखा जाए. बोर्ड को हाईकोर्ट की टिप्पणियों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप विस्तृत, तर्कपूर्ण आदेश पारित करना होगा. याचिका स्वीकार कर ली गई है, लेकिन अनिल शर्मा की वास्तविक रिहाई का फैसला अब बोर्ड के नए विचार पर निर्भर करेगा.
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