कोरोना से पहले वीरान हो गया था मोहम्मदगंज का डिहई पहाड़, ग्रामीणों ने सात साल में लौटा दी हरियाली

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पलामू में मोहम्मदगंज का डिहई पहाड़. फोटो: प्रभात खबर

पलामू के डिहई पहाड़, जो कभी वीरान था, अब ग्रामीणों के संयुक्त प्रयास से सात वर्षों में फिर से हरा-भरा हो गया है. कोरोना काल में शुद्ध हवा के महत्व को समझते हुए स्थानीय लोगों ने मिलकर जंगल संरक्षण का बीड़ा उठाया, जिससे प्रकृति की रौनक लौट आई है.

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मोहम्मदगंज से कुंदन चौरसिया की रिपोर्ट

Palamu Forest Conservation: पलामू जिले के मोहम्मदगंज वन क्षेत्र का डिहई पहाड़ कभी अंधाधुंध दोहन और पेड़ों की कटाई की वजह से पूरी तरह वीरान हो गया था. मोहम्मदगंज वन परिसर से महज एक किलोमीटर दूर स्थित इस पहाड़ पर कभी सिर्फ पत्थरों के निशान ही बच गए थे. लेकिन कोरोना काल के बाद पर्यावरण को लेकर ग्रामीणों में बढ़ी जागरूकता ने इसकी तस्वीर बदल दी. आज वही डिहई पहाड़ फिर से हरियाली से ढक चुका है और आसपास के गांवों के लोगों के संयुक्त प्रयास से प्रकृति ने यहां दोबारा अपनी रंगत बिखेर दी है.

महामारी में पता चला शुद्ध हवा का महत्व

ग्रामीण बताते हैं कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों ने खुली और शुद्ध हवा का महत्व पहले से ज्यादा महसूस किया. इसी दौर में रामनगर, राजनडीह, झरिवा और करडंडा गांव के लोगों ने तय किया कि पहाड़ और जंगलों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास किया जाएगा. इसके बाद पेड़ों की कटाई और पहाड़ के दोहन पर रोक लगाने की पहल शुरू हुई.

मिट्टी और मोरम की कटाई के निशान आज भी मौजूद

एक समय डिहई पहाड़ से बड़े पैमाने पर मिट्टी और मोरम की कटाई हुई थी. इसकी तलहटी में आज भी उस दोहन के निशान साफ दिखाई देते हैं. लगातार कटाई से पहाड़ की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हुई और जंगल लगभग समाप्त हो गया. इसके साथ ही यहां रहने वाले कई जीव-जंतु भी धीरे-धीरे गायब होने लगे. ग्रामीणों का कहना है कि यदि उस समय रोक नहीं लगाई जाती, तो संभव है कि आने वाले वर्षों में यह पहाड़ पूरी तरह बंजर हो जाता.

चार गांवों के लोगों ने मिलकर संभाला जंगल

डिहई पहाड़ को बचाने में रामनगर, राजनडीह, झरिवा और करडंडा गांव के लोगों की अहम भूमिका रही. रामनगर के राम जनम राम और भिखरी राजवार, राजनडीह के सुशील कुमार मेहता, पंचायत समिति सदस्य ममता कुमारी, मंटू मेहता समेत कई ग्रामीणों ने मिलकर जंगल संरक्षण का अभियान शुरू किया. ग्रामीणों ने सामूहिक सहमति से पेड़ों की अवैध कटाई और पहाड़ के किसी भी प्रकार के दोहन पर रोक लगाने का निर्णय लिया. इसके बाद लोगों ने खुद निगरानी की जिम्मेदारी भी उठाई. बिना किसी बड़े सरकारी खर्च के स्थानीय स्तर पर शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे सफल होती चली गई.

सात वर्षों में लौट आई प्रकृति की रौनक

वर्ष 2019 के आसपास शुरू हुए संरक्षण अभियान का असर अब साफ दिखाई देता है. सात वर्षों में डिहई पहाड़ दोबारा घने जंगलों में बदलने लगा है. पहले जहां सन्नाटा पसरा रहता था, वहीं अब सुबह के समय राष्ट्रीय पक्षी मोर के झुंड दिखाई देते हैं और उनकी आवाज पूरे इलाके में गूंजती है. ग्रामीण बताते हैं कि हरियाली लौटने के साथ कई वन्यजीव भी वापस आने लगे हैं. लकड़बग्घा जैसे जंगली जानवर कभी-कभी नजर आते हैं, जबकि दुर्लभ होते जा रहे उल्लुओं ने भी यहां फिर से बसेरा बना लिया है. इससे यह संकेत मिलता है कि इलाके का पारिस्थितिक संतुलन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है.

स्टेशन से दिखती है डिहई पहाड़ की खूबसूरती

मोहम्मदगंज रेलवे स्टेशन से डिहई पहाड़ की हरियाली और ऊंची चोटी का दृश्य यात्रियों का ध्यान खींचता है. ट्रेन का इंतजार कर रहे लोग अक्सर इस पहाड़ को निहारते नजर आते हैं. ग्रामीणों के अनुसार, पहाड़ की चोटी पर एक समतल मैदान भी है, जहां लोग पूजा-पाठ के बाद झंडा लगाते हैं. उनका मानना है कि यदि यहां पर्यावरण और प्रकृति प्रेमियों के लिए सीमित सुविधाओं के साथ एक आस्था और पर्यटन स्थल विकसित किया जाए, तो यह इलाका स्थानीय पर्यटन का नया केंद्र बन सकता है.

बिना खर्च जंगल बचाने का मॉडल बना डिहई

ग्रामीणों का दावा है कि उजड़ चुके जंगलों और पहाड़ों को बचाने का सबसे आसान तरीका स्थानीय लोगों की भागीदारी है. उनका कहना है कि वन विभाग हर साल पौधरोपण पर बड़ी राशि खर्च करता है, लेकिन कई जगह प्राकृतिक जंगलों की सुरक्षा पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता. ग्रामीणों ने डिहई के साथ-साथ लकडाही पहाड़ में भी कटाई और दोहन पर रोक लगाने का प्रयास किया, जिसका सकारात्मक परिणाम आज हरियाली के रूप में दिखाई दे रहा है.

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लकडाही पहाड़ का पत्थर भी बन सकता है आकर्षण

ग्रामीणों ने लकडाही पहाड़ का भी जिक्र किया, जहां एक अनोखी चट्टान छोटे पत्थरों के सहारे हवा में खड़ी दिखाई देती है. प्रकृति प्रेमी इसे मेगालिथ जैसी प्राकृतिक आकृति मानते हैं. उनका मानना है कि यदि इस स्थल का वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण किया जाए, तो यह भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकता है. डिहई और लकडाही पहाड़ की कहानी यह दिखाती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी से भी संभव है. सात वर्षों में लौटती हरियाली इस बात का प्रमाण है कि यदि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर रोक लगाई जाए, तो प्रकृति खुद को फिर से संवारने की क्षमता रखती है.

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