लोहरदगा : जिले में स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर लोगों को सिर्फ छला जा रहा है. सदर अस्पताल में जो भी मरीज जाते हैं, उन्हें जांच के नाम पर इस तरह उलझा दिया जाता है कि मरीज को निजी क्लिनिक से ज्यादा खर्च हो जाता है. सदर अस्पताल में पदस्थापित कुछ चिकित्सक मरीजों का क्लिनिकल जांच भी ठीक से नहीं करते हैं और जांच लिख देते हैं. इसमें से अधिकतर जांच मरीजों के लिए जरूरी नहीं होता है. कई बार बेहतर क्लिनिकल जांच नहीं करने के कारण जरुरी जांच भी छूट जाता है. पिछले कुछ समय से सदर अस्पताल के कुछ चिकित्सक एक सामान्य मरीजों को भी अल्ट्रासाउंड कराने का निर्देश दे देते हैं.
जबकि अल्ट्रासाउंड उनके लिए जरूरी नहीं होता है. लेकिन एक मरीज के अल्ट्रासाउंड कराने के एवज में चिकित्सक को व्यक्तिगत लाभ होता है. चूंकि पिछले लगभग एक वर्षों से टेक्नीशियन के अभाव में सदर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड नहीं हो रहा है. मरीज को ऊंची कीमत पर बाहर से अल्ट्रासाउंड कराना पड़ता है. वैसे सदर अस्पताल के चिकित्सक पैथोलॉजीवालों की सुविधा के लिए ज्यादातर मरीजों को कई तरह का टेस्ट लिख देते हैं, जो कि अमूमन जरूरी नहीं होता है.
इनमें लिवर फंक्सन टेस्ट, मलेरिया एवं टाइफायड का कीट टेस्ट, रिनल फंक्शन टेस्ट, आस्ट्रेलिया एंटीजेन टेस्ट अस्ट्रासाउंड, चेस्ट एक्सरे प्रमुख हैं. यदि सभी जांच करायी जाये तो एक मरीज को लगभग 2000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. कुछ चिकित्सक तो अलग-अलग पैथोलॉजी का अड्रेस भी मरीजों को देते हैं .
50 से ज्यादा पैथोलॉजी सेंटर
लोहरदगा शहरी क्षेत्र में लगभग 50 से ज्यादा पैथोलॉजी सेंटर खुले हैं. इनमें कई ऐसे भी सेंटर हैं जो अनुभवी व्यक्तियों द्वारा संचालित नहीं है. पैथोलॉजी में चिकित्सकों की कृपा दृष्टि ज्यादा रहती है. एक मलेरिया एवं टाइफायड का कीट टेस्ट कराने की कीमत पैथोलॉजी वाले लगभग 150 रुपये लेते हैं. जबकि एक कीट की कीमत मात्र 24 रुपये है. सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बचत की राशि सिर्फ पैथोलॉजिस्ट की नहीं होती है. इसी तरह प्रेग्नेंसी टेस्ट के लिए 50 रुपये वसूला जाता है, जबकि इसके कीट की कीमत मात्र छह रुपये है.
एक्सरे प्लेट खराब
सदर अस्पताल में लंबे समय से एक्सरे का प्लेट खराब है. लेकिन इसी प्लेट से मरीजों का एक्सरे किया जा रहा है. जो कि किसी भी काम का नहीं होता है. बिल्कुल घटिया प्रिंट होता है. सिर्फ एक प्लेट बदल दिये जाने से मरीजों को सुविधा होगी.
सीएस एवं डीएस में सामंजस्य नहीं
सदर अस्पताल में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है. सीएस व डीएस में सामंजस्य नहीं है. ड्यूटी रोस्टर में भी सीएस एवं डीएस में मतैक्य नहीं होता है. हास्पीटल में बिना अस्पताल प्रशासन की जानकारी के बगैर चिकित्सक ड्यूटी चेंज करते हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती है. प्रशासनिक स्तर पर कोई संवाद नहीं होता है. यहां पदस्थापित डीएस का काम अस्पताल की साफ-सफाई एवं अन्य व्यवस्था को देखना है, लेकिन वे अपने मूल काम को छोड़ कर अन्य काम करते हैं.
खास कंपनी की दवा लिखते हैं चिकित्सक
सदर अस्पताल में पदस्थापित कुछ चिकित्सक कुछ विशेष कंपनियों की दवा लिखने में दिलचस्पी लेते हैं. यदि किसी दूसरी कंपनी की कैल्सियम की दवा प्रति गोली दो रुपये में मिलती है, लेकिन कुछ चिकित्सक दूसरी कंपनी की कैल्सियम की दवा लिखते हैं जिसकी कीमत 14 रुपये प्रति गोली है.
ड्यूटी तालिका में भी होती है गड़बड़ी
सदर अस्पताल के ड्यूटी तालिका में भी गड़बड़ी की जाती है. जिस समय सेंट्रल रिव्यू मिशन की टीम लोहरदगा आयी थी, उस समय रोस्टर ड्यूटी में 9 बजे से 3 बजे तक 6 चिकित्सको की ड्यूटी लगायी गयी थी.
इन्हें अलग-अलग जिम्मेवारी दी गयी थी. जैसे डाॅ केके सिंह को ओपीडी एवं इमरजेंसी, डॉ एसपी शर्मा को आंख ओपीडी, डॉ बीके पांडेय को चाइल्ड ओपीडी, डॉ एसके श्रीवास्तव को ओपीडी, इमरजेंसी एवं आइपीडी, डॉ एसएन चौधरी को ओटी, डॉ एके प्रसाद को एएफएचसी की ड्यूटी दी गयी थी, लेकिन टीम के जाते ही यह व्यवस्था ध्वस्त हो गयी. 29 दिसंबर को सदर अस्पताल की जो ड्यूटी तालिका बनायी गयी, उसमें 9 बजे से 3 बजे के ड्यूटी में मात्र दो चिकित्सक डॉ ए प्रसाद ओपीडी एवं डॉ स्मृति ओपीडी में हैं.
एक भी टेक्नीशियन नहीं
एक टेक्निशियन नहीं रहने के कारण पिछले एक वर्षों से सदर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड नहीं हो रहा है. जबकि वहां लाखों रुपये की लागत से खरीदी गयी मशीन बेकार पड़ी है. लगभग छह माह पूर्व राज्य के स्वास्थ्य मंत्री लोहरदगा आये थे और यहां जब लोगों ने उन्हें इस समस्या से अवगत कराया तो उन्होंने कहा था कि एक सप्ताह के अंदर अल्ट्रासाउंड सदर अस्पताल में होने लगेगा. मंत्री जी की बात भी हवा हवाई साबित हुई.