प्रभात खबर की खबर का असर : बेटे की मौत के बाद प्रशासन जागा, वृद्ध मां को दिया आश्रय

Updated at : 05 Dec 2018 1:30 AM (IST)
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प्रभात खबर  की खबर का असर : बेटे की मौत के बाद प्रशासन जागा, वृद्ध मां को दिया आश्रय

गुमला : गुमला के फुटपाथ पर रहने वाला मुकुल महतो आर्थिक तंगी के कारण इलाज नहीं करा पाया और उसकी मौत हो गयी. मुकुल की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन से मदद नहीं मिली. अंत में मृतक के दोस्तों ने अस्पताल में अर्थी सजायी और मुकुल का अंतिम संस्कार श्मशान घाट में किया. बेटे की […]

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गुमला : गुमला के फुटपाथ पर रहने वाला मुकुल महतो आर्थिक तंगी के कारण इलाज नहीं करा पाया और उसकी मौत हो गयी. मुकुल की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन से मदद नहीं मिली. अंत में मृतक के दोस्तों ने अस्पताल में अर्थी सजायी और मुकुल का अंतिम संस्कार श्मशान घाट में किया. बेटे की मौत
के बाद मां बेसहारा हो गयी. यह समाचार प्रभात खबर में छपने के बाद मंगलवार को गुमला प्रशासन हरकत में आया.गुमला डीसी शशि रंजन ने गुमला सीओ व नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी रामाशंकर राम को मृतक मुकुल की मां मंगरी देवी को आश्रय देने के अलावा खाने-पीने की व्यवस्था करने का निर्देश दिया.
साथ ही अस्पताल की व्यवस्था की जांच करा कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही. डीसी के निर्देश के बाद मंगलवार को दिन के 11 बजे सीओ महेंद्र कुमार, नपं कार्यपालक पदाधिकारी रामाशंकर राम बस पड़ाव स्थित सूड़ी धर्मशाला पहुंच कर वृद्ध मंगरी देवी से मुलाकात कर उसे एक कंबल दिया. साथ ही उसके रहने के लिए खड़िया पाड़ा स्थित सेंटर हाउस में व्यवस्था करायी गयी. उसे अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलो खाद्यान्न भी दिया गया.
सीओ ने प्रभात खबर को बताया कि सेंटर हाउस खड़िया पाड़ा में रहने की व्यवस्था करा दी गयी है. मंगरी देवी को प्रत्येक माह 10 किलो चावल अन्नपूर्णा योजना से दिया जायेगा. मंगरी देवी के लकवा के इलाज के संबंध में पूछने पर गुमला अस्पताल के चिकित्सकों द्वारा बात कर उसके समुचित इलाज की व्यवस्था करायी जायेगी. सदर प्रखंड प्रशासन द्वारा उसके रहने व इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित होने पर मंगरीदेवी ने प्रभात खबर के प्रति आभार प्रकट किया.
मां के इलाज के लिए रखे 20 हजार भी बेटे की नहीं बचा पायी जान
मंगरी देवी ने कहा कि उसके लकवा के इलाज के लिए बेटे मुकुल महतो ने 20 हजार रुपया जमा किया था. लेकिन खुद मेरा बेटा बीमार हो गया. जिसके इलाज में वह 20 हजार रुपया भी खत्म हो गया और उसकी जान नहीं बची. वह ललित उरांव बस पड़ाव स्थित सूड़ी धर्मशाला के बरामदे में रह कर अपना जीवन यापन करती है.
उसके पास पांच कंबल, एक डेकची, एक कड़ाही व एक थाली था. उसका बेटा उसी में उसे चावल पका कर देता था. उसका बेटा मुकुल उसकी काफी सेवा करता था. यह बात बताते बताते मंगरी रोने लगी. वहीं उसके पास कितने पैसे हैं, पूछने पर कहा कि एक रुपया भी नहीं है. वह सुबह से बस पड़ाव के दुकानदारों से मिले खाने का खाया है. वह लाचार है. कुछ बना भी नहीं सकती है.
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