आरक्षण या आर्थिक आधार? 'जिओ और जीने दो' की संगोष्ठी में उठी समीक्षा की मांग
संगोष्ठी में उपस्थित महिलाएं | Prabhat Khabar Network
बोकारो में 'जिओ और जीने दो' संगोष्ठी में आरक्षण की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया गया. वक्ताओं ने शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक जागरूकता और आर्थिक आधार पर आरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया. प्रतिभा पलायन और व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए व्यापक अध्ययन की मांग की गई.
बोकारो.‘जिओ और जीने दो’ के बैनर तले ‘देश के पिछड़े और वंचित लोगों को मुख्यधारा से कैसे जोड़ें और क्या आरक्षण का कानून कारगर सिद्ध हुआ है?’ विषय पर जनवृत्त-03 में संगोष्ठी आयोजित की गयी. कार्यक्रम की शुरुआत रंजू सिंह की गणेश वंदना से हुई. विषय प्रवेश अध्यक्षा कनक लता राय ने कराया, जबकि संचालन विभा झा ने किया.
शिक्षा की गुणवत्ता और सामाजिक जागरूकता पर जोर
सुभद्रा मिश्रा ने आरक्षण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बतायी. सुधा कुमार ने कहा कि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति कर्म आधारित व्यवस्था के रूप में हुई थी, इसलिए वर्तमान समय में जाति आधारित व्यवस्था की प्रासंगिकता पर विचार किया जाना चाहिए. उन्होंने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत की.
कस्तूरी सिन्हा ने कहा कि युवा पीढ़ी जातिवाद को नकार रही है. उन्होंने प्रतिभा को सम्मान देने और वास्तविक रूप से शोषित एवं वंचित लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने की बात कही. अनिता किरण ने कहा कि वह ओबीसी समुदाय से आती हैं, लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का लाभ देने की बात रखी.
प्रतिभा पलायन और आरक्षण की समीक्षा पर चर्चा
सत्या सिंह ने आरक्षण व्यवस्था के विरोध में तर्क रखते हुए कहा कि इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक ही पहुंचना चाहिए. उनका कहना था कि यदि प्रतिभा को पर्याप्त अवसर नहीं मिला, तो देश से प्रतिभाशाली लोगों के पलायन का खतरा बढ़ सकता है.
सीमा सिन्हा ने कहा कि आरक्षण से समाज के वंचित वर्गों को लाभ मिला है, लेकिन समय-समय पर इसकी समीक्षा नहीं होने से इसके कुछ दुष्परिणाम भी सामने आये हैं. ज्योति बिस्ट ने जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करने और आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग की. उन्होंने परिवारों से बच्चों को देशप्रेम की शिक्षा देने और उनके मन में जातिगत भेदभाव की भावना नहीं पैदा करने की अपील की.
वंचित वर्गों के हितों की सुरक्षा पर जोर
तनया घोष ने समाज के वंचित लोगों को उनकी क्षमता और रुचि के अनुरूप बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की जरूरत बतायी. वहीं, आभा जायसवाल ने कहा कि आरक्षण समाप्त होने की स्थिति में वंचित वर्गों पर दोबारा वर्चस्व कायम होने का खतरा हो सकता है. विभा झा ने भी आर्थिक आधार को अधिक उपयोगी बताते हुए व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता जतायी.
व्यापक समीक्षा रिपोर्ट तैयार करने की मांग
समापन वक्तव्य में कनक लता राय ने कहा कि पिछड़े और वंचित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आरक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर व्यापक अध्ययन और समीक्षा रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि आजादी के कई दशकों बाद भी कई जातियों और आदिवासी समुदायों तक आरक्षण का लाभ अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच पाया है. ऐसे में व्यवस्था की कमियों और प्रभाव का व्यापक मूल्यांकन जरूरी है.
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