भूकंप की त्रसदी: दहशत में भागते वक्त फिर टूट गया गोलू का पैर, पैसे के अभाव में कैसे हो ऑपरेशन
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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सुपौल: बड़ा सवाल यह है कि क्या ईश्वर हमेशा न्याय करते हैं! सवाल यह भी है कि जब जीने का अधिकार मौलिक अधिकार में शामिल है, तो क्यों कुछ लोगों की जिंदगी मौत से भी बदतर होती है और अधिकार देने वाली संस्था चुप देखती रहती है! यह सवाल इस लिए उठ रहे हैं कि […]
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सुपौल: बड़ा सवाल यह है कि क्या ईश्वर हमेशा न्याय करते हैं! सवाल यह भी है कि जब जीने का अधिकार मौलिक अधिकार में शामिल है, तो क्यों कुछ लोगों की जिंदगी मौत से भी बदतर होती है और अधिकार देने वाली संस्था चुप देखती रहती है! यह सवाल इस लिए उठ रहे हैं कि जिला मुख्यालय के वार्ड नंबर 22 में अपने ननिहाल में अपनी ही जिंदगी से जूझ रहे 14 वर्षीय गोलू का आज कोई हमदर्द नहीं है. प्रारब्ध की क्रूर नियति ने गोलू से उसका बचपन छीन लिया है और जिंदगी के जिस चौराहे पर वह आज खड़ा है, उसके आगे कोई राह नहीं है.
बदकिस्मती क्या है, यह गोलू से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. 2014 में छठ के बाद पिता वीरेंद्र साह की मौत हो गयी. उसके बाद परिस्थिति ऐसी बनी कि विधवा ललिता देवी को ससुराल बड़हारा कोठी (पूर्णिया) से अपने तीनों बच्चे के साथ अपने मायके सुपौल में शरण लेनी पड़ी. ननिहाल में गोलू की जिंदगी जैसे-तैसे कट ही रही थी कि जनवरी में एक दुर्घटना में गोलू का पैर टूट गया. बड़ी मुश्किल से दूर-दराज के रिश्तेदारों ने मिल कर इलाज कराया, तो वह चलने-फिरने के लायक बन सका.
अब भूकंप लेकर आया नया जख्म : इस बार फिर भूकंप के बहाने गोलू की बदकिस्मती ने दस्तक दी. नानी की टूटी-फूटी झोपड़ी में भूकंप से दहशत महसूस हुई, तो पड़ोस की इमारत में शरण ली. पर, 27 अप्रैल की शाम 06:05 बजे आये भूकंप के झटके के दौरान मची अफरातफरी में गोलू गिर गया और फिर वही पैर टूट गया, जिसमें पूर्व से स्टील जैसे बाह्य उपकरण लगे हुए थे.
किसी मसीहा का इंतजार
जख्मी गोलू को आनन-फानन में सदर अस्पताल ले जाया गया. चिकित्सकों ने पुन: ऑपरेशन की जरूरत बताते हुए रेफर कर दिया. गोलू की मां ललिता देवी की जो माली हालत है, उसमें इलाज तो मुश्किल है, बेहतर की कल्पना मिथक ही है. ललिता देवी खुद अपने तीन बच्चों के साथ अपनी पेंशनधारी मां बेचनी देवी के रहमो करम पर पल रही हैं. ऐसे में गोलू को वापस सदर अस्पताल से घर लौटना पड़ा. बहरहाल गोलू अपने नानी की फूस की झोपड़ी में किसी मसीहा का इंतजार कर रहा है, ताकि फिर भूकंप आने पर वह सुरक्षित अन्य बच्चों की तरह खाली मैदान तक पहुंच सके.
शिकायतकर्ता का आवेदन अभी मेरे पास नहीं आया है. मिलने पर जांच के बाद नियमानुकूल सहायता अवश्य दी जायेगी. इसमें किसी तरह की कोताही नहीं बरती जायेगी.
वीणा कुमारी , सीओ, सुपौल
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