सहरसा का सलखुआ: घर से निकलते ही शुरू हो जाता है जान का जोखिम, कोसी तटबंध के अंदर की इस बेबसी को देखकर कांप उठेगा दिल
फोटो - छमता से अधिक लोगों को सवार करते नाविक | Prabhat Khabar Network
सहरसा के सलखुआ प्रखंड में कोसी तटबंध के अंदर बसे लोगों की जिंदगी मुसीबतों से भरी है. बरसात और बाढ़ में सड़कों के डूबने से ग्रामीणों को जान हथेली पर रखकर नावों से आवागमन करना पड़ रहा है. बीमारों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और भी जानलेवा बन जाती है.
सहरसा, सलखुआ. कोसी तटबंध के अंदर बसे लोगों की जिंदगी इन दिनों मुसीबतों के बीच गुजर रही है. बरसात और बाढ़ के मौसम में सलखुआ प्रखंड के दर्जनों गांवों के ग्रामीणों के लिए आवागमन सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. कहीं सड़क डूब गयी है तो कहीं गांवों के बीच पानी फैल जाने से लोगों को एक टोले से दूसरे टोले तक पहुंचने के लिए भी नाव का सहारा लेना पड़ रहा है. ऐसे में ग्रामीण कोसी की तेज धारा के बीच जान हथेली पर लेकर आवागमन करने को मजबूर हैं.
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जरूरी काम के लिए घर से निकलते ही शुरू हो जाता है जोखिम
पंचायत समिति सदस्य प्रतिनिधि रमन कुमार सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि जरूरी काम हो, इलाज कराना हो, बच्चों को पढ़ाई के लिए बाहर जाना हो या रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करनी हों, घर से निकलते ही जोखिम शुरू हो जाता है. कोसी की तेज धारा के बीच नाव से नदी पार करना लोगों की मजबूरी बन गया है. ग्रामीणों का कहना है कि कई बार नाव पर क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाकर नदी पार कराया जाता है. इससे किसी भी समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. नाव पर सवार लोगों को हर समय यह चिंता सताती रहती है कि तेज धारा के बीच कहीं कोई अनहोनी न हो जाए.
एक तरफ कोसी की धारा, दूसरी तरफ गांवों में जलजमाव
कोसी तटबंध के अंदर की समस्या केवल नदी पार करने तक सीमित नहीं है. कई गांवों और टोलों के बीच जलजमाव के कारण आवागमन पूरी तरह प्रभावित हो गया है. स्थिति यह है कि ग्रामीणों को अपने ही गांव में एक टोले से दूसरे टोले तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ रहा है. बाढ़ के दिनों में यह समस्या और अधिक विकराल हो जाती है. ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से इसी तरह की परेशानी झेल रहे हैं. हर साल बाढ़ आती है, नावें चलती हैं और लोग जोखिम उठाकर आवागमन करते हैं, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित पहल नहीं हो पाती.

बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं के सामने सबसे बड़ी मुश्किल
बाढ़ के दौरान सबसे अधिक परेशानी गंभीर मरीजों, बुजुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को होती है. अचानक किसी की तबीयत बिगड़ने पर मरीज को नाव के सहारे बाहर निकालना पड़ता है. खराब मौसम और कोसी की तेज धारा के बीच समय पर अस्पताल पहुंचना बड़ी चुनौती बन जाता है.
ग्रामीणों का कहना है कि आपात स्थिति में सुरक्षित और त्वरित आवागमन की व्यवस्था नहीं होने से मरीजों की जान भी जोखिम में पड़ सकती है. इसलिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है.
पर्याप्त नाव, प्रशिक्षित नाविक और लाइफ जैकेट की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से बाढ़ प्रभावित गांवों में पर्याप्त संख्या में नाव उपलब्ध कराने की मांग की है. साथ ही प्रशिक्षित नाविकों की व्यवस्था और यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट उपलब्ध कराने की भी मांग की गयी है.
लोगों का कहना है कि सुरक्षित आवागमन के लिए प्रशासनिक स्तर पर तत्काल व्यवस्था की जानी चाहिए. इसके साथ ही गांवों के बीच स्थायी संपर्क मार्ग और सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था की दिशा में भी ठोस पहल जरूरी है.
आखिर करें तो क्या करें, ग्रामीणों की बेबसी में छिपा बड़ा सवाल
ग्रामीणों की बेबसी उनके एक सवाल में साफ झलकती है कि जाना जरूरी है, लेकिन जाएं तो जाएं कैसे. रोजमर्रा की जरूरतों के लिए घर से निकलना मजबूरी है और कोसी पार करना जोखिम भरा सफर. लोग जान हथेली पर लेकर नाव के सहारे आवागमन करने को विवश हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि बाढ़ और बरसात के इस कठिन दौर में उनकी समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है. लोगों ने प्रशासन से तत्काल राहत और सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है, ताकि किसी अनहोनी के बाद प्रशासन को जागने की नौबत नहीं आए.
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