मां भूखे-प्यासे सदर अस्पताल में काट रही िजंदगी

Published at :28 Nov 2016 5:44 AM (IST)
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मां भूखे-प्यासे सदर अस्पताल में काट रही िजंदगी

सहरसा : अस्सी वर्षीया विंधेश्वरी देवी पति गदाधर कुंवर जिले के सत्तरकटैया प्रखंड के सिहौल गांव की रहनेवाली हैं. पुत्र बीसीसीएल में अधिकारी हैं. पौत्र अभिषेक व नीरज विदेश में अपनी सेवा दे रहे हैं. इसके बावजूद विंधेश्वरी देवी विगत चार साल से सदर अस्पताल के बेड नंबर चार को अपना घर मान जीवन बसर […]

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सहरसा : अस्सी वर्षीया विंधेश्वरी देवी पति गदाधर कुंवर जिले के सत्तरकटैया प्रखंड के सिहौल गांव की रहनेवाली हैं. पुत्र बीसीसीएल में अधिकारी हैं. पौत्र अभिषेक व नीरज विदेश में अपनी सेवा दे रहे हैं. इसके बावजूद विंधेश्वरी देवी विगत चार साल से सदर अस्पताल के बेड नंबर चार को अपना घर मान जीवन बसर कर रही हैं. बुजुर्ग महिला अपनी बेबसी की कहानी कहते रुआंसी हो जाती है. इन चार वर्षों में परिवार का कोई सदस्य उन्हें देखने भी नहीं आया है. अस्पताल के डॉक्टर व कर्मियों की मेहरबानी पर माता जी पल-पल अपनों को देखने के लिए रो रही हैं. शहर की सड़कों पर भटकती इस बुजुर्ग महिला को बीमार अवस्था में देख स्थानीय लोगों ने

मां भूखे-प्यासे…
चार वर्ष पूर्व सदर अस्पताल में भरती कराया था. इसके बाद महिला का इलाज लगातार सरकारी खर्च व स्थानीय लोगों की मदद से की जाने लगी, लेकिन इन वर्षों में परिवार का कोई सदस्य विंधेश्वरी देवी को देखने तक नहीं आया. पीड़िता बताती हैं कि बेटा प्रमोद कुंवर बीसीसीएल में अधिकारी है. पहले धनबाद में पोस्टेड था, लेकिन इन दिनों सपरिवार नागपुर में रह रहा है. पति भी बेटे के साथ ही रहते हैं.
बनगांव है पीड़िता का मायका :
सदर अस्पताल के बेड नंबर चार पर भरती पीड़िता बताती हैं कि कोई देखनेवाला नहीं है. उन्होंने बताया कि बनगांव पोस्टऑफिस के समीप उनके पिता का घर है. वह बताती हैं कि भाई पंडित सुरेंद्र मिश्र हैं, जिनका निधन हो चुका है. हालांकि मायका में भतीजा पंडित चुन्नू बाबू व उनका परिवार रहता है, लेकिन कोई सुधि लेने नहीं आया है.
एक कंबल के सहारे गुजरती रात :
इन दिनों ठंड भी दस्तक दे चुकी है. पीड़िता अस्पताल के बेड पर कभी साड़ी, तो कभी कंबल बिछा कर सोती हैं. वह बताती हैं कि रात में ठंड लगने पर उसी कंबल को ओढ़ भी लेती हूं. बेटा बड़ा अधिकारी है. उसके घर में बहुत कंबल है. कभी आयेगा, तो मेरे लिए कंबल जरूर लेकर आयेगा. इसी उम्मीद पर यह बुजुर्ग महिला अस्पताल में रह रही हैं.
कहां जा रहा है समाज
…फिर भी बच्चों की सलामती के लिए करती है पूजा
भूख लगती है, तो रो लेती हूं
पीड़िता ने बताया कि अस्पताल में जब मरीजों के लिए खाना दिया जाता है, तो उसी कतार में लग कर ले लेती हूं. लेकिन, कभी नहीं मिलने पर भूखे ही रहना पड़ता है. उन्होंने बताया कि भूख जब बहुत लगती है, तो रोने लगती हूं. सबका बेटा अपने मां-बाप को लेकर अस्पताल आते हैं, लेकिन मैं रोज सवेरे अस्पताल के गेट पर बैठ अपनों का इंतजार करती रहती हूं.
दूय हाथ कपड़ा देब बौआ
सदर अस्पताल में महिला को अकेले देख जब कोई व्यक्ति उनसे बात करता है, तो वह फफक कर रोने लगती हैं. वह मौजूद लोगों से दो हाथ कपड़ा व साड़ी देने की गुहार लगाने लगती हैं. मैले-कुचले कपड़ों से स्वयं को ढंक बूढ़ी मां अब भी इस हालत में अपने बच्चों की सलामती के लिए समीप के मंदिर में पूजा करने जाती हैं.
एक बुजुर्ग महिला काफी दिनों से अस्पताल में रह रही हैं. मानवता के नाते उन्हें रहने व भोजन की सुविधा दी जा रही है. उनके घर के लोगों से संपर्क की कोशिश की गयी, लेकिन कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई है. अस्पताल के सभी कर्मी उन्हें दादी कह कर बुलाते हैं.
विनय रंजन, अस्पताल प्रबंधक, सदर अस्पताल
क्या कहते हैं लोग
स्थानीय युवा रौशन कुंवर ने बताया कि गांव में विंधेश्वरी देवी को अकेला छोड़ सभी लोग चले गये. शुरुआती दिनों में कभी कभार खोज खबर लेते रहते थे, लेकिन इन चार वर्षों में कोई देखने भी नहीं आया है.
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