लगातार हो रहे हादसे, ट्रामा सेंटर की है दरकार

Published at :02 Jul 2016 7:53 AM (IST)
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लगातार हो रहे हादसे, ट्रामा सेंटर की है दरकार

सहरसा : शहर में बाइक, कार व व्यावसायिक वाहनों की तादाद लगातार बढ़ रही है. सड़कों पर चल रहे वाहनों की रफ्तार पर लगाम लगाने की व्यवस्था नहीं है. ऐसे में रोजाना हो रही सड़क हादसों को रोकने की कोशिश नाकाम हो रही है. सड़क हादसे में जख्मी लोगों का इलाज करने से सरकारी अस्पताल […]

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सहरसा : शहर में बाइक, कार व व्यावसायिक वाहनों की तादाद लगातार बढ़ रही है. सड़कों पर चल रहे वाहनों की रफ्तार पर लगाम लगाने की व्यवस्था नहीं है. ऐसे में रोजाना हो रही सड़क हादसों को रोकने की कोशिश नाकाम हो रही है. सड़क हादसे में जख्मी लोगों का इलाज करने से सरकारी अस्पताल स्वयं को अक्षम मान रहा है.
मरीजों को पटना स्थित पीएमसीएच रेफर कर दिया जाता है. सहरसा से पटना पहुंचने में एंबुलेंस को चार से पांच घंटे समय लग जाते हैं. इस बीच जख्मी मरीज भगवान भरोसे जीवन जीने के लिए संघर्ष करते रहते हैं. सड़क हादसे में जख्मी मरीजों के औसत पर गौर करें तो रेफर किये गये सत्तर फीसदी जख्मी ससमय नहीं पहुंचने के कारण रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं.सड़क के साथ ट्रामा भी जरूरी: देश के लगभग सभी बड़े शहरों में सुव्यवस्थित ट्रामा सेंटर संचालित किये जा रहे हैं.
सड़क हादसे की स्थिति में अनजान व्यक्ति भी घायल को अपनी गाड़ी में लेकर ट्रामा सेंटर तक पहुंचा जाता है. खास बात यह है कि विगत दस वर्षों में सूबे के गांव-गांव तक सड़कों की स्थिति ठीक हुई है. एनएच का दायरा भी बढ़ा है. फोर लेन सड़क प्रत्येक जिले से होकर गुजरने लगी है. कई जिलों में फोर लेन प्रस्तावित भी है. बेहतर सड़क देख वाहन चालक स्पीड को बढ़ाते रहते हैं. इन दुर्घटना के बाद बचाव के लिए ट्रामा सेंटर कारगर साबित होगा.
सैकड़ों बेड व बेहतर व्यवस्था: ट्रामा सेंटर में सुव्यवस्थित आइसीसीयू, आइसीयू, एनएसयू के अंदर सौ से अधिक अत्याधुनिक बेड व जांच में प्रयुक्त किये जाने वाले उपकरण लगे होते हैं.
जहां मरीजों को सरकारी दर पर सुविधा मुहैया कराया जाता है. ट्रामा सेंटर में प्रशिक्षित डॉक्टरों की टीम भी मरीजों की सेवा में लगी रहती है. जबकि वर्तमान व्यवस्था के तहत संपन्न लोग अपने जख्मी परिजनों को लेकर निजी अस्पतालों में चले जाते हैं. वहीं गरीबों पर नाकाफी व्यवस्था कहर बन टूटता है.
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