बिहार में खोयी विरासत की वापसी के लिए नयी रणनीति की तैयारी में कांग्रेस, इन कारणों से दूर हुए पारंपरिक मतदाता

Updated at : 20 Sep 2018 5:45 AM (IST)
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बिहार में खोयी विरासत की वापसी के लिए नयी रणनीति की तैयारी में कांग्रेस, इन कारणों से दूर हुए पारंपरिक मतदाता

कृष्ण कुमार पटना: बिहार में अपनी खोयी विरासत की वापसी के लिए कांग्रेस नयी रणनीति की तैयारी में है. कभी इस पार्टी का वोट बैंक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम होते थे. इस वोट बैंक से पार्टी के दूर होने के बावजूद ब्राह्मण और मुस्लिम की सहानुभूति अब भी दल के साथ है. इसी सहानुभूति को […]

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कृष्ण कुमार
पटना: बिहार में अपनी खोयी विरासत की वापसी के लिए कांग्रेस नयी रणनीति की तैयारी में है. कभी इस पार्टी का वोट बैंक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम होते थे. इस वोट बैंक से पार्टी के दूर होने के बावजूद ब्राह्मण और मुस्लिम की सहानुभूति अब भी दल के साथ है.
इसी सहानुभूति को फिर से वोट बैंक में तब्दील करने के लिए प्रदेश में सवर्ण नेताओं को पार्टी की कमान सौंपी गयी है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद मदन मोहन झा और प्रदेश चुनाव प्रचार समिति की कमान अखिलेश सिंह को दी गयी है. पार्टी अब भाजपा के रणनीति की तर्ज पर वीआईपी कल्चर तोड़कर आम जनता से सीधा संवाद करने की रणनीति पर काम कर रही है.
जानकारों का कहना है कि वर्ष 1951 से 1971 तक बिहार में कांग्रेस का ही दबदबा रहा. कोई भी एक बड़ी विपक्षी पार्टी नहीं थी, जो इस समयावधि में किसी भी विधानसभा चुनाव में 100 का आंकड़ा पार कर सकी हो. वर्ष 1977 में कांग्रेस को जयप्रकाश आंदोलन से कड़ी टक्कर मिली और कांग्रेस हार गयी. जनता पार्टी ने 324 सीटों में से 214 पर जीत दर्ज की. हालांकि, 1980 के दशक में जनता पार्टी बिहार में भी टूटनी शुरू हो गयी और इससे कई ग्रुप निकले.
राज्य में मौजूदा दो प्रमुख पार्टियां राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) इसी से निकले थे और 1990 के दशक में राज्य स्तर की महत्वपूर्ण पार्टी के रूप में उभरे. ये दोनों पार्टियां जाति आधारित वोट बैंक और एक-दूसरे की विरोधी के रूप में जानी जाती रही हैं.
कई कारणों से कांग्रेस से दूर हुए पारंपरिक मतदाता
वर्ष 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में 324 में से कांग्रेस को सिर्फ 71 सीटों पर जीत मिली. यह पिछले चुनाव से 125 सीटें कम थीं. इस चुनाव में लालू प्रसाद ने जगन्नाथ मिश्रा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर किया था.
इसका कारण अक्तूबर-नवंबर 1989 में हुए भागलपुर दंगे और मंडल कमीशन को बताया जाता है. इससे सवर्ण और मुस्लिम मतदाता कांग्रेस से दूर होते चले गये. वर्ष 1990 में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकी. वर्ष 1995 में इसे 29 और वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में इसे 23 सीटें ही हासिल हो सकीं.
वर्ष 2000 में बिहार का विभाजन हो गया. इसके बाद यहां विधानसभा की 324 से घटकर 243 सीटें रह गयीं. वर्ष 2000 में लोजपा के गठन के बाद से दलित भी उसके साथ हो गये.
प्रदेश में पार्टी की क्या होगी रणनीति
प्रदेश में कांग्रेस की आगे की रणनीति के बारे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि राज्य में सामूहिक नेतृत्व के साथ आगे बढ़ने का प्रयास होगा. सभी जाति के लोगों को पार्टी से जोड़ने का प्रयास किया जायेगा.
पार्टी के परंपरागत मतदाता जो किसी अन्य पार्टी में गये हैं वे भी फिर से कांग्रेस में वापसी के इच्छुक हैं. सभी पंचायतों में पार्टी अध्यक्ष बनाये जायेंगे. साथ ही गांव और बूथ कमेटी का गठन किया जायेगा. कमिश्नरी की जिम्मेदारी पार्टी के वरिष्ठ लोगों को दी गयी है.
पुरानी टीम की छुट्टी
कौकब कादरी के नेतृत्व वाली पुरानी टीम की छुट्टी किये जाने के बारे में पूछने पर कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि कौकब कादरी बिहार कांग्रेस के प्रभारी अध्यक्ष थे. उनके पहले अशोक चौधरी प्रदेश अध्यक्ष थे, लेकिन पार्टी छोड़ने के बाद से यह पद खाली था. इसलिए इस पद पर मदन मोहन झा की नियुक्ति की गयी है. वहीं, कौकब कादरी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. पार्टी को उनके अनुभव का लाभ मिलेगा.
क्या कहते हैं…
पार्टी के नये प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा ने कहा कि कांग्रेस करीब 125 साल पुरानी पार्टी है. इसकी पहुंच गांव-गांव तक है. पिछले पांच महीने से अपने पुराने मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाने के लिए पार्टी नयी रणनीति पर काम कर रही है. सभी नेताओं के साथ मिलकर संगठन को मजबूत करने का काम किया जायेगा.
सभी को दी गयी है जिम्मेदारी
पार्टी की कमान सवर्ण नेताओं को सौंपने के बारे में पूछे जाने पर बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि सभी जाति के नेताओं को जिम्मेदारी दी गयी है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा ब्राह्मण हैं.
चुनाव प्रचार कमेटी की कमान अखिलेश सिंह को सौंपी गयी है वे भूमिहार जाति से हैं. कार्यकारी अध्यक्ष समीर सिंह राजपूत समाज से हैं. वहीं, कार्यकारी अध्यक्ष श्याम सुंदर सिंह धीरज भूमिहार समाज से हैं. कार्यकारी अध्यक्ष डॉ अशोक कुमार दलित समाज से हैं. कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी अल्पसंख्यक समाज से हैं.
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