पटना : लंबित मामलों के निबटारे को मिलेगी रफ्तार, 195 कोर्ट की होगी स्थापना
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Aug 2018 8:30 AM
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जल्द ही राज्य कैबिनेट की लगेगी इस पर मुहर पटना : बिहार में लंबित न्यायिक मामलों के जल्दी निबटारे को लेकर सरकार ने खाका खींच लिया है. 14वें वित्त आयोग की राशि से 195 न्यायालय की स्थापना की जायेगी. इसमें 147 फास्ट ट्रैक कोर्ट, 10 पारिवारिक न्यायालय और 38 अतिरिक्त न्यायालय (एडिशनल कोर्ट) शामिल हैं. […]
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जल्द ही राज्य कैबिनेट की लगेगी इस पर मुहर
पटना : बिहार में लंबित न्यायिक मामलों के जल्दी निबटारे को लेकर सरकार ने खाका खींच लिया है. 14वें वित्त आयोग की राशि से 195 न्यायालय की स्थापना की जायेगी. इसमें 147 फास्ट ट्रैक कोर्ट, 10 पारिवारिक न्यायालय और 38 अतिरिक्त न्यायालय (एडिशनल कोर्ट) शामिल हैं. इतना ही नहीं, 195 न्यायाधीशों के पद को भी स्वीकृति दी गयी है. कुछ औपचारिकताएं बची हैं, जिसको पूरा करने के बाद सरकार कैबिनेट में इसे रखेगी.
प्रदेश की अदालतों पर बढ़ रहे बोझ को देखते हुए राज्य सरकार ने सराहनीय पहल की है. सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो जल्दी ही न्यायालयों में बढ़ते मामलों के निबटारे में तेजी आयेगी. सूत्रों की मानें तो वित्त विभाग के प्रशासी पद वर्ग समिति ने पूरी योजना को हरी झंडी दे दी है.
अब कैबिनेट में इस मामले को रखा जाना है. करीब एक हफ्ते पहले ही वित्त विभाग में इसके लिए बैठक भी हुई थी. हालांकि, इस बारे में कोई अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं. जानकारी केमुताबिक 14वें वित्त आयोग से पूरा खर्च किया जायेगा. 185 अस्थायी जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद, 10 अस्थायी प्रधान न्यायाधीश के पद सृजित किये गये हैं.
पीयू के शोध में हुआ था खुलासा
पटना विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विधि विभाग की ओर से शराबबंदी को लेकर किये गये शोध में तमाम चौंकाने वाले तथ्य सामने आ चुके हैं. शोध में स्पष्ट किया गया था कि हालात इसी तरह के रहे तो आनेवाले दिनों में न्यायालयों पर अधिक दबाव बढ़ेगा. पटना विवि स्नातकोत्तर विधि विभाग के छात्र प्रत्युष कुमार की शोध में बताया गया है कि सरकार ने 2016 में पूर्ण शराबबंदी कानून को लागू किया.
इस कानून को लाने के पहले न्यायालयों और जेलों पर पड़ने वाले दबावों का अध्ययन नहीं किया गया. इस बीच न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर उचित संख्या में बहाली भी नहीं हुई. पोक्सो, एक्साइज, लोक सेवकों के विरुद्ध मामले, फास्ट ट्रैक कोर्ट आदि विशेष न्यायालयों के गठन से कोर्ट पर अधिक दबाव आया है.
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