VIDEO: नेपाल का त्रिशूली बाजार हुआ तबाह, मलबे में दफन हुईं दुकानें और सपने; कुदरत के कहर ने खड़े किए विकास पर बड़े सवाल

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नेपाल का त्रिशूली बाजार अचानक आई बाढ़ की भेंट चढ़ गया. कभी गुलजार रहने वाला यह बाजार अब मलबे और कीचड़ से ढका है. दुकानें, घर और लोगों के सपने इस प्राकृतिक आपदा में दफन हो गए हैं.

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Nepal Flood Update : यह तस्वीर किसी उजड़े हुए शहर की नहीं लगती. कभी यहां बाजार था, दुकानें थीं, घरों से सुबह धुआं उठता था. लोग काम पर निकलते थे, बच्चे स्कूल जाते थे और सड़क से गुजरने वाला हर व्यक्ति यहां कुछ न कुछ खरीदता था. यह नेपाल का त्रिशूली बाजार था. आज यही बाजार एक ऐसी त्रासदी का गवाह है, जहां जिंदगी के निशान मलबे और कीचड़ के बीच दबे नजर आते हैं.

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26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ और मलबे ने त्रिशूली नदी के किनारे बसे इलाकों को तहस-नहस कर दिया. कई बस्तियां, सड़कें, पुल और बुनियादी ढांचे बाढ़ की चपेट में आ गये. जहां दुकानें थीं, वहां अब कीचड़ है. जहां घर थे, वहां मलबा है. जहां लोग अपने भविष्य की नींव रख रहे थे, वहां नदी और तबाही की नई कहानी लिखी जा चुकी है.

मलबे में सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, लोगों की पूरी जिंदगी दबी है

त्रिशूली बाजार की तबाही को सिर्फ टूटी इमारतों की तस्वीर मानना आसान होगा, लेकिन इस मलबे के पीछे एक-एक परिवार की कहानी छिपी है. किसी ने वर्षों पहले यहां दुकान शुरू की होगी. किसी ने बैंक से कर्ज लेकर कारोबार खड़ा किया होगा. किसी के बच्चों की फीस इसी दुकान की कमाई से निकलती होगी. किसी ने इसी कारोबार से अपनी बेटी की शादी की होगी.

आज इन लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब शुरुआत कहां से करें?

आपदा में मौत सबसे बड़ी त्रासदी होती है, लेकिन जो लोग बच जाते हैं, उनके लिए त्रासदी वहीं खत्म नहीं होती. उनका दूसरा संघर्ष उसी दिन शुरू हो जाता है. घर चला गया, दुकान चली गयी, सड़क चली गयी, ग्राहक चले गये और रोजगार भी खत्म हो गया. बचता है तो सिर्फ भविष्य को फिर से खड़ा करने का संघर्ष.

त्रिशूली सिर्फ नेपाल की कहानी नहीं, पूरी दुनिया के लिए चेतावनी

अगर त्रिशूली बाजार की तबाही को केवल एक स्थानीय प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाये, तो शायद इस घटना से निकलने वाले सबसे बड़े सवाल छूट जायेंगे.

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आज ऐसी तस्वीरें दिखाई दे रही हैं. देश अलग हैं, नदियां अलग हैं, मौसम अलग हैं, लेकिन कहानी कई बार एक जैसी है. प्रकृति का असाधारण प्रहार और उसके सामने इंसानी बस्तियों की कमजोरी.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने अपनी बस्तियों का विस्तार उन जगहों तक कर दिया है, जहां प्रकृति के लिए जगह ही नहीं बची? क्या हमारा विकास उस खतरे की रफ्तार को समझ पा रहा है, जो बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ रहा है?

केदारनाथ से त्रिशूली तक, क्या हमने पहाड़ की क्षमता को समझा?

नेपाल से करीब 600 किलोमीटर दूर भारत का उत्तराखंड भी ऐसी ही चेतावनी देता है. वर्ष 2013 में केदारनाथ और आसपास के क्षेत्रों में असाधारण बारिश, बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचायी थी.

यह कहना सही नहीं होगा कि उत्तराखंड की पूरी तबाही केवल निर्माण गतिविधियों के कारण हुई. प्रकृति की अपनी ताकत भी थी. लेकिन वैज्ञानिक और सरकारी अध्ययनों ने हिमालय की भौगोलिक संवेदनशीलता तथा बाढ़ और भूस्खलन के जोखिम को बार-बार रेखांकित किया है.

इसलिए सवाल बदल जाता है. जब हमें पता है कि हिमालय संवेदनशील है, तो फिर पहाड़ों में बनने वाली सड़कें, शहर, पर्यटन परियोजनाएं और ऊर्जा परियोजनाएं कितनी सुरक्षित और टिकाऊ हैं?

नदी खतरा भी है और जीवन भी

त्रिशूली की कहानी सिर्फ एक बाजार की कहानी नहीं है. यह उस पूरे इलाके की कहानी है, जहां नदी के साथ-साथ सड़कें बनीं, ऊर्जा परियोजनाएं आयीं, व्यापार बढ़ा और पर्यटन का विस्तार हुआ.

यानी नदी जीवन भी थी और खतरा भी.

यही आधुनिक विकास की सबसे बड़ी चुनौती है. हम नदी से बिजली चाहते हैं. नदी के किनारे सड़क चाहते हैं. नदी के आसपास पर्यटन चाहते हैं. लेकिन जब वही नदी अपनी सीमा से बाहर आती है, तो हम उसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर आगे बढ़ जाते हैं.

सवाल यह नहीं है कि नदी दोषी है या इंसान. सवाल यह है कि क्या हमने नदी को समझकर अपना विकास किया?

पाकिस्तान और लीबिया की त्रासदियों से भी मिलती है सीख

वर्ष 2022 में पाकिस्तान की विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर जनजीवन को प्रभावित किया. घर, फसल, पशु और लोगों की आजीविका सबकुछ बाढ़ की चपेट में आया.

बारिश प्राकृतिक घटना थी, लेकिन नुकसान की मात्रा सिर्फ बारिश से तय नहीं हुई. लोग कहां रहते थे, बाढ़ का पानी कहां फैल सकता था, इंफ्रास्ट्रक्चर कितना मजबूत था, गरीबी कितनी थी और बदलते मौसम का प्रभाव कितना था, इन सभी कारकों ने आपदा को बड़ी त्रासदी में बदलने में भूमिका निभायी.

वर्ष 2023 में लीबिया के डेरना शहर में तूफान डेनियल के बाद भारी बारिश हुई. दो बांध टूट गये और बाढ़ का पानी शहर में घुस गया. हजारों लोगों की जान गयी. बाद की जांचों में बांधों के रखरखाव, प्रशासनिक व्यवस्था और चेतावनी प्रणाली को लेकर भी गंभीर सवाल उठे.

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है. प्रकृति खतरा पैदा करती है, लेकिन समाज और उसकी व्यवस्था यह तय करती है कि वह खतरा कितनी बड़ी तबाही में बदलेगा.

आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ी होती है इंसानी त्रासदी

दुनिया की किसी भी आपदा को आंकड़ों में देखना आसान है. कितने लोग मरे, कितने घर टूटे, कितनी सड़कें बहीं और कितना आर्थिक नुकसान हुआ.

लेकिन त्रिशूली के मलबे के बीच खड़े होकर तस्वीर कुछ और दिखाई देती है.

हर मलबे के पीछे एक परिवार है. हर टूटी दुकान के पीछे एक कर्ज है. हर ढहे घर के पीछे एक अधूरा भविष्य है.

आपदा की सबसे बड़ी तस्वीर हमेशा सेटेलाइट से नहीं मिलती. वह उस व्यक्ति के चेहरे पर दिखाई देती है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी एक जगह लगा दी और एक सुबह उठकर पाया कि उसका सबकुछ खत्म हो चुका है.

क्या हर आपदा को जलवायु परिवर्तन से जोड़ना सही है?

यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या हर प्राकृतिक आपदा को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ देना वैज्ञानिक रूप से सही होगा. इसका जवाब हमेशा सीधा नहीं है.

लेकिन वैज्ञानिक चेतावनियां यह जरूर बताती हैं कि गर्म होती दुनिया में कई तरह की चरम मौसम घटनाओं के जोखिम और उनके प्रभाव बढ़ सकते हैं. हिमालय जैसे संवेदनशील इलाकों में ग्लेशियर, बर्फ, चट्टान और पानी में बदलाव नए जोखिम पैदा कर सकते हैं.

नेपाल की मौजूदा त्रासदी के बाद संभावित दूसरी बाढ़ को लेकर भी चिंताएं सामने आयी हैं. किसी झीलनुमा जलाशय के बनने और उसके टूटने की आशंका इस बात की ओर इशारा करती है कि खतरा केवल वही नहीं है, जो इस समय हमारी आंखों के सामने दिखाई दे रहा है.

क्या विकास रोक देना चाहिए?

बड़ा सवाल यह भी उठेगा कि अगर विकास से खतरा बढ़ता है, तो क्या विकास रोक दिया जाए?

बिल्कुल नहीं.

किसी गरीब या विकासशील देश से यह कहना कि सड़क मत बनाइए, बिजली मत बनाइए, पर्यटन मत बढ़ाइए, उचित नहीं होगा. सवाल विकास रोकने का नहीं, बल्कि विकास की सीमा और दिशा तय करने का है.

कहां सड़क बनेगी? कहां घर बनेंगे? कहां होटल बन सकता है? नदी से कितनी दूरी पर निर्माण सुरक्षित है? किस पहाड़ में सुरंग बनाई जा सकती है? किस इलाके में बांध नहीं बनाया जाना चाहिए?

इन सवालों के जवाब विकास की हर योजना का हिस्सा होने चाहिए.

क्या विकास की कीमत में आपदा का जोखिम भी शामिल है?

मान लीजिए आज एक सड़क बनाने में 100 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. लेकिन उसी सड़क को बचाने और बार-बार मरम्मत करने में अगले दस वर्षों में 1000 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं.

तो क्या यह सस्ता विकास है?

इसी तरह अगर नदी के किनारे बाजार बसाने से आज व्यापार बढ़ता है, लेकिन अगली बड़ी बाढ़ में पूरा बाजार बह जाता है, तो सवाल उठेगा कि हमने वास्तव में विकास किया था या आपदा का जोखिम आने वाली पीढ़ी के खाते में डाल दिया था?

त्रिशूली फिर बसेगा, लेकिन क्या इस बार तरीका बदलेगा?

कुछ समय बाद शायद त्रिशूली में फिर दुकानें खुलेंगी. सड़कें बनेंगी. नये घर तैयार होंगे. बाजार दोबारा आबाद होगा.

लेकिन तब सबसे जरूरी सवाल होगा कि क्या हम उसी जगह को उसी तरीके से फिर से बसायेंगे?

या इस बार नदी को भी जगह देंगे? पहाड़ को भी सांस लेने देंगे? खतरे को विकास की फाइल में शामिल करेंगे?

जिन लोगों की जिंदगी यहां बसी थी, उनसे सिर्फ यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि उन्हें घर चाहिए या दुकान. उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि वे ऐसा घर और ऐसा बाजार चाहते हैं, जो अगली बाढ़ के सामने ज्यादा सुरक्षित हो.

त्रिशूली की तस्वीर भविष्य के लिए चेतावनी है

त्रिशूली की तबाही हमें प्रकृति से लड़ने का संदेश नहीं देती. यह हमें अपनी सीमाएं समझने का संदेश देती है.

जब नदी का रास्ता रोका जाता है, जब पहाड़ की क्षमता से ज्यादा उस पर बोझ डाला जाता है, जब जंगल की जगह कंक्रीट ले लेता है और जब बदलते मौसम के बावजूद विकास की सोच नहीं बदलती, तब आपदा सिर्फ प्रकृति की गलती नहीं रह जाती.

वह हमारी तैयारी, हमारी योजना और हमारी प्राथमिकताओं का आईना बन जाती है.

इसीलिए त्रिशूली बाजार की यह तस्वीर केवल नेपाल की तस्वीर नहीं है. यह उस संभावित भविष्य की तस्वीर भी हो सकती है, जिससे दुनिया का कोई भी शहर पूरी तरह सुरक्षित नहीं है.

अगर हमने विकास और प्रकृति के बीच संतुलन का सवाल आज नहीं पूछा, तो कल शायद हमारे पास सवाल पूछने के लिए भी बहुत कम बचे.

और शायद त्रिशूली की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि उसका बाजार उजड़ गया. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इसे दोबारा बसाया जायेगा, तो क्या हम वही गलती दोबारा करेंगे?

सोचिए. अपने आसपास देखिए और यह सवाल जरूर पूछिए कि हम प्रकृति के साथ विकास कर रहे हैं या प्रकृति की कीमत पर.

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