नियमों की हो रही अनदेखी सड़क पार करना भी कठिन

Updated at : 10 Aug 2017 8:44 AM (IST)
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नियमों की हो रही अनदेखी सड़क पार करना भी कठिन

नवादा : एक ओर जहां इ-रिक्शा से बेरोजगारों को रोजगार मिला है वहीं दूसरी ओर जानकारी के अभाव में चालक यातायात नियमों को तोड़ रहे हैं़ इससे आमलोगाें के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारियों व अन्य लोगों को दिक्कत होती है. हाल यह है कि सड़क पार करने में भी उलझन होती है. सड़क पार करने के […]

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नवादा : एक ओर जहां इ-रिक्शा से बेरोजगारों को रोजगार मिला है वहीं दूसरी ओर जानकारी के अभाव में चालक यातायात नियमों को तोड़ रहे हैं़ इससे आमलोगाें के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारियों व अन्य लोगों को दिक्कत होती है. हाल यह है कि सड़क पार करने में भी उलझन होती है. सड़क पार करने के लिए लोगों को इंतजार करना पड़ता है़ चालकों को रांग साइड की भी जानकारी नहीं है़ कभी दायें तो कभी बायें साइड से गाड़ियां चला कर लोगों को ये लोग परेशान करते हैं.
जी तोड़ मेहनत करने के बाद जब शिक्षा की डिग्री लेकर रोजगार के लिए भटकना पड़ जाये, तो ग्लानी महसूस होती है़ यह उन बेरोजगारों की जुबानी है जिन्होंने मां-बाप के अरमानों को पढ़-लिख कर पूरा नहीं कर पाये, और बेरोजगारी का दाग लिए दर-दर भटकते रहे़ जहां भी रोजगार के लिए अर्जी दाखिल की गयी, वहां से डोनेशन ने निराश कर दिया़ ऐसे में उम्मीद का किरण लेकर आये इ-रिक्शा आज उन पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए वरदान सबित होने लगा है़ महज एक वर्ष पूर्व मार्केट में आये इ-रिक्शा को बेरोजगार शिक्षित युवाओं ने काफी पसंद किया और नौकरी की लालसा छोड़ कर इ-रिक्शा को अपना रोजगार बना लिया़ शुरुआती दौर में इन पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए थोड़ी-बहुत परेशानी आयी पर बाद में अभ्यस्त हो गये़
शहर में चल रहे 1200 इ-रिक्शा ़
शहर में करीब 1200 इ-रिक्शा चल रहे हैं़ इसमें से तीन हिस्से ऐसे लोग हैं जो पढ़े-लिखे बेरोजगार हैं. वैसे, तो रिक्शा चलाने के नाम पर हिचकिचाहट महसूस होती थी, पर अब वही बेरोजगार आज गर्व से रिक्शा चला रहे हैं. कल तक जिन बेरोजगार युवकों को अपने ही घर में रोजगार के लिए उलाहना मिला करता था, अब वही बेरोजगार पूरे परिवार के लिए आय का साधन बने है़ं
डीलर के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी
इ-रिक्शा से यातायात की समस्या बढ़ी है़ पार्किंग की व्यवस्था नहीं दी गयी है़ डीलर को भी यह निर्देश दिया गया है कि वह इ-रिक्शा खरीदनेवालों को एक सप्ताह की ट्रेनिंग दें़ ऐसा नहीं किया जा रहा है़ इस बिंदु पर कार्रवाई करने की तैयारी की जा रही है़ ड्राइविंग लाइसेंस लेनेवालों को एमवीआइ के द्वारा ट्रेनिंग देकर यातायात के नियमों से अवगत कराया जाता है़ यातायात व्यवस्था में दिक्कत आने का कारण यह है कि लोग पैसेंजर के लिए इधर-उधर इ-रिक्शे को खड़ा कर देते हैं़
ब्रजेश कुमार, जिला परिवहन पदाधिकारी नवादा
नौकरी में डोनेशन की चर्चा ने तोड़ा मनोबल
वर्ष 1996 में बीए ऑनर्स करने के बाद जब नौकरी के लिए बैंकिग, टीचर, और दारोगा के लिए आवेदन दिया, तो किसी कारणवश इसमें सफल नहीं हो सका़
हर तरफ डोनेशन की चर्चा रही़ इसे मनोबल टूट गया़ उसके बाद रोजगार के लिए भटकने लगे, ऐसे में हाथ रिक्शा चलाना शुरू किया़ किसी तरह से परिवार का पालन पोषण करने के बाद जब इ-रिक्शा बाजार में आया, तो वहां भी आर्थिक समस्या उत्पन्न हो गयी और उसे खरीदने के लिये राशि नहीं रहने पर भाड़ा पर लेकर इसे चलाना शुरू किया़ अब पारिवारिक स्थिति काफी सुधरने लगी है़ परिवार के तमाम लोग खुश हैं़ समय से गाड़ी निकालता हूं व समय से घर चला आता हूं़ नाैकरी में डोनेशन लेने की चर्चा ने मनोबल तोड़ दिया था. इसके बाद स्वरोजगार की राह अपनायी.
चंद्रिका मांझी, भदौनी शोभनाथ मंदिर, इ-रिक्शाचालक
क्या कहते हैं शिक्षित बेरोजगार इ-रिक्शा चालक
वर्ष 1988 में मैट्रिक पास करने के बाद 89 में आर्मी के लिएआवेदन किया पर, सेलेक्ट नहीं हो सका़ उसके बाद पढ़ाई जारी रखी़ अंगरेजी में बीए ऑनर्स करने के बाद एसएससी की तैयारी के बाद बीपीएससी की तैयारी की, पर आर्थिक परिस्थिति सामने आ गयी़ नौकरी के नाम पर डोनेशन का डर सताने लगा़ बावजूद पढ़ाई नहीं छोड़ी़ वर्ष 1997 में एमए करने की़
इसके बाद यह समझ में आ गया कि बगैर डोनेशन दिये नौकरी नहीं मिल सकती है, तब नौकरी का ख्याल दिल से निकाल दिया, और फिर स्वरोजगार की तलाश में भटकने लगे़ उन दिनों परिवार के दायित्व के बोझ से आत्महत्या करने का मन करने लगा़ लेकिन, इसे चुनौती मान कर कोलकाता में काम करने गया़ इसी दौरान इ-रिक्शा का रोजगार ध्यान में आते ही कर्ज लेकर खरीदने के बाद उसे चलाना शुरू कर दिया़ अब आलम यह है कि चार रिक्शे का मालिक हूं़ परिवार भी खुश है़ इसी इ-रिक्शे की कमाई से एक बेटी की शादी भी की है़
मनोज कुमार, कदमकुआं, गोला रोड नवादा
पकरीबरावां धेवधा कॉलेज से जब ग्रेजुएशन किया, तो नौकरी की लालसा थी़ नौकरी की उम्मीद लगाये आर्मी में अप्लाइ किया, पर किसी कारणवश नहीं हो सकी़ उसके बाद दारोगा बहाली में भी आवेदन किया़ मेहनत कर उसकी तैयारी भी की़ उसके बाद यह सुनने में आया कि दारोगा के लिए डोनेशन ली जा रही है़
इसके बाद नौकरी के नाम से नफरत होने लगी़ ऐसी हालत में हमने कई पढ़े-लिखे मित्रों को इ-रिक्शा चलाते देखा, तो उससे प्रेरणा लेकर इ-रिक्शा का सहारा लिया़ अब इसके माध्यम से पूरे परिवार को खुशियां दे रहे हैं़ परिवार के बीच रह कर रोजगार भी कर रहे हैं़
कविरंजन कुमार, राम नगर नवादा
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