सिमट रहा काव नदी का दायरा
Updated at : 18 Dec 2014 10:21 AM (IST)
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डुमरांव : अवैध खनन व अतिक्रमण से काव नदी का अस्तित्व खतरे में आ गया है. कई नहरों का संगम बना काव नदी में पानी नहीं आने से इलाके के हजारों किसानों के समक्ष सिंचाई की समस्या उत्पन्न हो गयी है. खेतों में पैदावार की कमी हो गयी है. रोहतास के मलियाबाग से लेकर बक्सर […]
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डुमरांव : अवैध खनन व अतिक्रमण से काव नदी का अस्तित्व खतरे में आ गया है. कई नहरों का संगम बना काव नदी में पानी नहीं आने से इलाके के हजारों किसानों के समक्ष सिंचाई की समस्या उत्पन्न हो गयी है. खेतों में पैदावार की कमी हो गयी है. रोहतास के मलियाबाग से लेकर बक्सर के नया भोजपुर ताल तक काव नदी के दोनों तटों पर अतिक्रमण का सिलसिला जारी है.
विगत एक दशक के अंदर यह नदी संकीर्ण हो कर अपनी पहचान बनाये रखने में नाकाम साबित हो रही है. दो दशक पूर्व काव नदी में पानी भरा रहता था, जिससे किसान अपने खेतों की सिंचाई कर पैदावार बढ़ाते थे. जैसे-जैसे समय गुजरता गया, नदी का पानी भी सूखता चला गया. आज इस नदी में पानी का कहीं अता-पता नहीं है. काव नदी के गर्भ से कहीं मिट्टी तो कहीं बालू के लालच में अवैध खनन जारी है. अनुमंडल के सैकड़ों गांव के किसान पानी सुख जाने से परेशान हैं. क्षेत्र के किसानों को अब बारिश पर निर्भर करना पड़ रहा है या फिर ट्यूबवेल के भरोसे रहना पड़ रहा है.
काव नदी रोहतास के भभुआ-मोहनिया के बीच कैमूर की पहाड़ी से निकल कर मलियाबाग के समीप रूप सागर गांव में ठोरा नदी में मिलती है. अब दो नदियों का संगम बक्सर व रोहतास के किसानों के खेतों को हरियाली देकर बक्सर सेंट्रल जेल के समीप गंगा में समाहित हो जाती है. आज भी सेंट्रल जेल के पीछे काव ठोरा और कर्मनाशा नदी के मिलन होने से यह स्थान त्रिवेणी संगम के रूप में चर्चित है. काव ठोरा नदी के मिलन के बाद वर्ष भर रोहतास के रूप सागर, दिनारा, लिलवछ, गुमसेज के बड़े इलाके एवं बक्सर के नावानगर, मनहथा, बेलाव व सिकरौल के लाखों किसानों को खेती के लिए पर्याप्त मात्र में पानी मिलता था.
महाराजा ने करायी थी खुदाई
अंगरेजी हुकूमत व राज परिवार के प्रयासों से डुमरांव अनुमंडल में वर्ष 1900 में खेतों की सिंचाई व्यवस्था को लेकर नदी व नहरों का जाल बिछाना शुरू किया गया था. महाराजा स्व रामरण विजय प्रसाद सिंह ने रोहतास के मलियाबाग स्थित कवई धवई गांव के समीप काव नदी की खुदाई करा कर पांच धाराओं में जल को मोड़ा था. इसी से यह गांव पचधरवा गांव से विख्यात है. राज परिवार ने किसानों के लिए काव नदी की खुदाई करा कर नया भोजपुर में गंगा से मिलाया था. वहीं, अन्य क्षेत्रों के किसानों के लिए महाराजा बहादुर कमल सिंह ने गहरी रुचि दिखा कर वर्ष 1948-49 में भोजपुर रजवाहा, डुमरांव रजवाहा, केसठ वितरणी सहित छोटी-छोटी संयोजक नहरों की खुदाई करा कर काव नदी से जोड़ा था.
नदी की बदौलत ही बने सांसद
इलाके के छोटे-छोटे किसानों के खेतों में भी काव नदी व नहरों का पानी भरपूर मात्र में मिलने लगा. इधर किसानों की मेहनत रंग ला रही थी. उधर लोगों के दिल में महाराजा कमल सिंह के प्रयासों के प्रति गहरी आस्था पैठ करती चली गयी. आजाद भारत के पहले लोकसभा चुनाव में महाराजा श्री सिंह ने क्षेत्र के विकास व समस्याओं के समाधान में रुचि लेना शुरू किया और वर्ष 1952 के चुनाव में विजयी हो कर प्रथम सांसद के रूप में दिल्ली में पहुंच कर अपना परचम लहराया.
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