बिउर व कुड‍़ासन में बस नाम के पशु अस्पताल

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पशुओं के बीमार होने पर नहीं दिखता कोई रास्ता, एक डॉक्टर के भरोसे छह अस्पताल भभुआ (ग्रामीण) : कुड़ासन और बिउर के पशु अस्पताल भवनहीन हैं. बिउर चैनपुर प्रखंड में पड़ता है. वहीं, कुड़ासन भभुआ प्रखंड में पड़ता है. ऐसे में भवन की बात कौन कहे, डॉक्टर व कर्मी का भी दूर-दूर तक पता नहीं. […]

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पशुओं के बीमार होने पर नहीं दिखता कोई रास्ता, एक डॉक्टर के भरोसे छह अस्पताल
भभुआ (ग्रामीण) : कुड़ासन और बिउर के पशु अस्पताल भवनहीन हैं. बिउर चैनपुर प्रखंड में पड़ता है. वहीं, कुड़ासन भभुआ प्रखंड में पड़ता है. ऐसे में भवन की बात कौन कहे, डॉक्टर व कर्मी का भी दूर-दूर तक पता नहीं. दोनों अस्पतालों में एक ही डॉक्टर पदस्थापित हैं. चैनपुर प्रखंड में पदस्थापित होने की वजह से उन्हें कुछ प्रखंड के काम भी निबटाने पड़ते हैं. उनके जिम्मे में अतिरिक्त छह पशु अस्पतालों का प्रभार है. इसी प्रभार में कुड़ासन व बिउर का भी अस्पताल है.
दोनों अस्पतालों के एरिये में करीब 30-30 गांव आते हैं, जब डॉक्टर का हीं पता नहीं है तो अस्पताल होने या नहीं होने का क्या मतलब.
अस्पताल का नहीं मिलता लाभ : पशुपालकों का कहना है कि कुड़ासन व बिउर में जो किराये के मकान में अस्पताल बनाये गये हैं, उसका लाभ उन्हें नहीं मिलता है. जब पशु बीमार होते हैं, तो काफी परेशानी होती है. डॉक्टर की खोज में दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो जाते हैं. स्थिति भयावह तब हो जाती है, जब बाजार में झोलाछाप डॉक्टर पशुओं का जैसे-तैसे इलाज कर देते हैं. जीने मरने तक की नौबत आ जाती है.
यहां दवा बंटते या टीका लगते किसी पशुपालक ने नहीं देखा : स्थिति इतनी खराब है कि यहां किसी पशुपालक ने दवा बंटते या टीका लगते नहीं देखा है. ऐसे में अगर कोई पशु बीमार हो गजाये और उसकी मौत हो जाये, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.
अस्पताल में लटका रहता है ताला : पशु अस्पताल में अक्सर बंद ताले का दर्शन ही होता हैं. इसलिए पशुओं के बीमार होने पर पशुपालक लाचार होकर अन्यत्र इलाज कराना ही उचित समझते हैं. उनकी परेशानी को न ही प्रशासन समझता है और न हीं पशुपालन विभाग.
क्या कहते हैं अधिकारी : जिला पशुपालन पदाधिकारी अनूप कुमार राय का कहना है कि डॉक्टर व कर्मियों की कमी तो है ही, साथ में टीके व दवाएं समय पर उपलब्ध नहीं होने से परेशानी होती है, लेकिन उपलब्ध होने पे पशुपालकों को इसका लाभ दिया जाता है.
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