अरवल में सर्पदंश से हर साल जाती हैं कई जानें, जिले में एक भी स्नेक कैचर नहीं, जागरूकता के अभाव में बढ़ रही मौतें

अरवल जिला कार्यालय
बरसात में सर्पदंश के मामले बढ़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि झाड़-फूंक के चक्कर में न पड़ें, समय पर अस्पताल पहुंचकर एंटी स्नेक वेनम लगवाएं और जान बचाएं।
Arwal News: जिले में प्रति वर्ष दर्जनों लोग सर्पदंश के शिकार होकर अपनी जान गंवा देते हैं. इनमें ज्यादातर किसान और मजदूर वर्ग के लोग शामिल होते हैं. बरसात की शुरुआत होते ही सदर अस्पताल में सर्पदंश के शिकार मरीजों की संख्या बढ़ने लगती है. बारिश के मौसम में सांपों के बिलों में पानी भर जाने के कारण वे आबादी वाले इलाकों की ओर निकल आते हैं. बीते एक माह में सर्पदंश के 15 से अधिक मामले सामने आए हैं.
चिकित्सकों के अनुसार, समय पर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को एंटी स्नेक वेनम दिया जाता है, जिससे उनकी जान बचाई जा सकती है. वहीं समय पर इलाज नहीं मिलने पर शरीर में जहर फैल जाता है और एंटी स्नेक वेनम भी प्रभावी नहीं हो पाता, जिससे पीड़ित की मौत हो जाती है.
पिछले वर्ष सात लोगों की हुई थी मौत
जिला सहायक आपदा प्रबंधन पदाधिकारी गीतांजलि ने बताया कि पिछले वर्ष जिले में सर्पदंश से सात लोगों की मौत हुई थी, जिनमें से छह मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की सहायता राशि उपलब्ध करा दी गई है. इस वर्ष अब तक सर्पदंश से एक व्यक्ति की मौत हुई है.
हालांकि आम लोगों का मानना है कि जिले में हर वर्ष 20 से अधिक लोगों की मौत सर्पदंश के कारण होती है. जागरूकता के अभाव में कई लोग अस्पताल पहुंचने के बजाय झाड़-फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिससे उनकी जान चली जाती है. पोस्टमार्टम नहीं होने के कारण ऐसे कई मामलों का सरकारी रिकॉर्ड में उल्लेख नहीं हो पाता और मृतकों के परिजन मुआवजे से भी वंचित रह जाते हैं.
सप्ताह में पांच से छह मरीजों को विषैले सांप डंसते हैं
सदर अस्पताल के डॉ. रमन आर्यभट्ट ने बताया कि प्रतिदिन सांप काटने के मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं. अधिकतर मामलों में विषहीन सांप के काटने की शिकायत होती है, लेकिन सप्ताह में पांच से छह मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें विषैले सांप ने डंसा होता है. ऐसे मामलों में समय पर इलाज बेहद जरूरी होता है.
जिले में एक भी प्रशिक्षित स्नेक कैचर नहीं
अरवल जिले में एक भी प्रशिक्षित स्नेक कैचर नहीं है. ऐसे में जब किसी के घर में सांप निकलता है तो लोग वन विभाग या डायल-112 पर सूचना देते हैं. वन विभाग के पास सांप पकड़ने के लिए आवश्यक उपकरण तो उपलब्ध हैं, लेकिन प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव में लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.
एक ओर सांप को वन्यजीव संरक्षण के तहत संरक्षित जीव घोषित किया गया है, जिसे मारना कानूनन अपराध है, वहीं दूसरी ओर जिले में स्नेक कैचर की व्यवस्था नहीं होने के कारण कई बार लोग मजबूरी में सांप को मार देते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार मुआवजे पर लाखों रुपये खर्च करती है, लेकिन सर्पदंश से बचाव और लोगों को जागरूक करने की दिशा में अपेक्षित पहल नहीं हो रही है.
क्या कहते हैं अधिकारी
वनपाल एस. के. तिवारी ने बताया कि सांप वन्यजीव संरक्षण श्रेणी में शामिल है और इसे मारना दंडनीय अपराध है. सांप पकड़ने के लिए आवश्यक छड़ी सहित अन्य संसाधन विभाग के पास उपलब्ध हैं, लेकिन जिले में एक भी प्रशिक्षित स्नेक कैचर नहीं है. ऐसे में प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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