जमुई के जंगलों का गायब होता खजाना अब खेतों में लहलहाएगा, 50 से अधिक महिलाओं को मिला औषधीय पौधों का तोहफा
औषधीय पौधों की खेती से बढ़ेगी आदिवासी महिलाओं की आमदनी, पूसा के वैज्ञानिक दे रहे प्रशिक्षण | Prabhat Khabar Network
पूसा के वैज्ञानिक जमुई की महिलाओं को औषधीय पौधों की खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं. आमदनी बढ़ाने और लुप्तप्राय पौधों के संरक्षण का यह प्रयास अनोखा है.
Jamui Tribal Women Medicinal Farming: जमुई जिले की सुरम्य वादियों और घने जंगलों में कभी ऐसी जड़ी-बूटियां लहलहाती थीं जो सदियों से प्राकृतिक इलाज का मुख्य आधार रही हैं. लेकिन मानवीय लापरवाही और अनियंत्रित दोहन ने इन अनमोल औषधीय पौधों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. आज जब ये जंगल अपने प्राकृतिक स्वरूप को खो रहे हैं, तब चकाई प्रखंड के दूर-दराज आदिवासी गांवों से उम्मीद की एक बेहद सुखद तस्वीर उभरकर सामने आई है.
समस्तीपुर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने जंगलों के इस हरित खजाने को बचाने और स्थानीय महिलाओं की आजीविका संवारने का बीड़ा उठाया है. वैज्ञानिकों की इस अनूठी मुहिम से न सिर्फ विलुप्त होती जड़ी-बूटियों का संरक्षण होगा, बल्कि बरसों से आर्थिक तंगी झेल रही आदिवासी महिलाओं की किस्मत भी बदलने वाली है.
सतपोखरा के आदिवासी गांवों में उम्मीद की नई भोर
चकाई प्रखंड अंतर्गत ठाड़ी पंचायत के सतपोखरा और आसपास के आदिवासी बहुल गांवों में इन दिनों एक नया उत्साह देखने को मिल रहा है. पूसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने गांव में पहुंचकर 50 से अधिक जरूरतमंद आदिवासी महिलाओं को औषधीय पौधे बांटे हैं. केवल पौधे बांटना ही इस अभियान का मकसद नहीं है, बल्कि महिलाओं को इन पौधों की रोपाई, सही देखभाल, नियमित सिंचाई और जैविक तरीकों से कीट प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. घर के काम-काज तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं अब जड़ी-बूटियों की वैज्ञानिक खेती कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह पर कदम बढ़ा चुकी हैं.
जंगलों के अंधाधुंध दोहन के बीच संरक्षण का बड़ा प्रयास
परियोजना प्रमुख और विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दिनेश राय ने इस पहल के पीछे की गंभीर वजह साझा की. उन्होंने बताया कि जमुई के घने जंगल किसी जमाने में दुर्लभ औषधीय पौधों के प्राकृतिक भंडार हुआ करते थे. लेकिन लोगों द्वारा किए गए अंधाधुंध दोहन के कारण प्राकृतिक रूप से उगने वाले ये पौधे तेजी से गायब होने लगे. इसी संकट को देखते हुए वैज्ञानिकों ने रणनीति बनाई कि इन औषधीय पौधों को जंगलों से निकालकर किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाए. खेतों में इनकी व्यावसायिक खेती होने से दुर्लभ पौधों का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा और स्थानीय परिवारों को आमदनी का एक स्थायी जरिया भी मिल जाएगा.
शतावरी से लेकर तुलसी तक, घर-घर पहुंचेगा हरित खजाना
इस महत्वाकांक्षी अभियान में परियोजना प्रमुख डॉ. दिनेश राय के साथ विश्वविद्यालय के जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. शंकर झा और डॉ. शिव शंकर प्रसाद भी पूरी निष्ठा से जुटे हुए हैं. वैज्ञानिकों की यह टीम ग्रामीण महिलाओं के बीच शतावरी, अश्वगंधा, तुलसी, बेल और आंवला जैसे बहुमूल्य और औषधीय गुणों से भरपूर पौधों के प्रति जागरूकता फैला रही है. गांव की महिलाओं को समझाया जा रहा है कि किस तरह ये पौधे आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में काम आते हैं और बाजार में इनकी मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है.
बाजार की गारंटी और महिलाओं के लिए रोजगार का स्वर्णिम अवसर
इस नई पहल से गांव के आम लोगों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों में भारी खुशी का माहौल है. पूर्व पंचायत समिति सदस्य रमेश हेम्ब्रम ने वैज्ञानिकों की इस सोच की सराहना करते हुए कहा कि यह योजना आदिवासी परिवारों के लिए वरदान साबित हो सकती है. उन्होंने कहा कि औषधीय खेती से ग्रामीण परिवारों को पारंपरिक खेती से अलग अतिरिक्त कमाई का मजबूत जरिया मिलेगा. हालांकि, उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि खेती के साथ-साथ महिलाओं को तैयार फसल बेचने के लिए उचित बाजार उपलब्ध कराना सबसे जरूरी है, ताकि उन्हें उनकी मेहनत का पूरा मूल्य मिल सके.
Jamui Tribal Women Medicinal Farming: निगरानी की मजबूत योजना और आगे का रोडमैप
वैज्ञानिकों ने इस परियोजना को सिर्फ पौधे बांटने तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसकी सतत निगरानी की पूरी योजना तैयार की है. आगामी नवंबर और दिसंबर महीने में वैज्ञानिकों की विशेष टीम दोबारा इन गांवों का दौरा करेगी. इस दौरान वे पौधों की शारीरिक वृद्धि, सिंचाई व्यवस्था, जैविक खाद के इस्तेमाल और कीट नियंत्रण का जमीनी स्तर पर निरीक्षण करेंगे. इसके साथ ही आने वाले समय में एलोवेरा, कालमेघ, करंज और अशोक जैसे अन्य महत्वपूर्ण पौधों को भी इस योजना में शामिल किया जाएगा. आगे चलकर महिलाओं को इन औषधीय पौधों के प्रसंस्करण यानी प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, जिससे वे अपने गांव में ही उत्पाद बनाकर बाजार में बेच सकेंगी और अधिक मुनाफा कमा सकेंगी.

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