Rajendra Arlekar Interview: मैं यहां केवल बैठने नहीं आया, कोशिश है उच्च शिक्षा की तस्वीर बदले

प्रभात खबर के संपादक (बिहार) अजय कुमार, स्थानीय संपादक रजनीश उपाध्याय और राजनीतिक संपादक मिथिलेश ने उच्च शिक्षा की स्थिति पर राज्यपाल सह कुलाधिपति से बातचीत की. पढ़िए प्रभात खबर के सवालों का राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने क्या दिया जवाब.
राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को बिहार के राज्यपाल बने करीब दो माह हुए हैं. इस दौरान कुलाधिपति के रूप में उन्होंने राज्य के विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक माहौल बनाने और परीक्षा व रिजल्ट का कैलेंडर लागू कराने से लेकर गड़बड़ी ठीक करने की मुहिम शुरू कर दी है. वह सीनेट की बैठक में खुद शामिल होते हैं. पूर्व में राजभवन की ओर से लिये गये फैसलों की भी वह समीक्षा कर रहे हैं.
राज्यपाल का कहना है- मैं यहां केवल बैठने और फाइल करने के लिए नहीं हूं, बल्कि मेरी कोशिश होगी है कि उच्च शिक्षा की तस्वीर बदले. सरकार और राजभवन मिल कर उच्च शिक्षा को पटरी पर लायेंगे. प्रभात खबर के संपादक (बिहार) अजय कुमार, स्थानीय संपादक रजनीश उपाध्याय और राजनीतिक संपादक मिथिलेश ने उच्च शिक्षा की स्थिति पर राज्यपाल सह कुलाधिपति से बातचीत की.
बिहार की विवि शिक्षा और यहां के माहौल को नजदीक से समझने का प्रयास कर रहा हूं. बहुत सारे लोगों से मिला, इनमें पूर्व कुलपति, शिक्षाविद और सामाजिक पृष्ठभूमि के भी लोग हैं. उनसे फीडबैक मिला है. यहां बहुत कुछ करने की आवश्यकता है. पहले के लोगों ने क्या किया, यह नहीं देखना है मुझे. उच्च शिक्षा को कैसे पटरी पर ला सकूं ,यह मैं देख रहा हूं. मेरी कोशिश है कि पहले बुनियादी चीजों को ठीक किया जाये. मसलन, परीक्षा समय पर हो. समय पर रिजल्ट निकले. कॉलेजों में हर स्तर पर कैलेंडर लागू हो. देखिए, मैं मानता हूं कि अभी जो हालत है, उसके लिए छात्रों को आप दोष नहीं दे सकते. पढ़ाना, परीक्षा लेना और रिजल्ट देना, यह काम तो विश्वविद्यालयों का है. इसी ठीक करने में लगा हूं.
परीक्षाएं समय पर होंगी, तो सबको लगेगा कि कुछ हो रहा है. अभी ऐसा लग रहा कि यहां कुछ नहीं है. छात्रों के पलायन करने की इस एटीट्यूड को बदलने की जरूरत है. इस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं. यह बहुत जरूरी है कि बिहार के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई-लिखाई का माहौल कायम हो. इसके चलते बिहार के लोगों को क्यूं नुकसान हो? यही नहीं, इसके चलते बिहार की छवि को लेकर भी सवाल खड़े होने लगते हैं. यह किसी को अच्छा नहीं लगता है.
एक बात साफ कर दूं कि मेरे पूर्ववर्ती ने क्या किया, केवल यह मुझे नहीं देखना. पर हां, यह भी बता दूं कि जहां कहीं गलत हुआ होगा, उसका रिव्यू करूंगा. यह कर भी रहा हूं. मैं किसी को दोष नहीं देता. कुछ गलतियां हो सकती हैं. कई चीजों को बदला भी गया है. सुधार करने की कोशिश कर रहा हूं. जेपी विवि में कार्रवाई की गयी. आनन-फानन में कोई काम करना मेरे स्वभाव में नहीं है. जो आवश्यक था, तत्काल किया. बाकी चीजों का अध्ययन कर रहे हैं. ठीक लोगों को बिठाने की भी जरूरत है. मैं सिर्फ इसलिए नहीं आया हूं कि किसी को हटा देना है.
च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (सीबीसीएस) का नयी शिक्षा नीति में प्रावधान है. हर छह महीने में एक परीक्षा हो, यह गाइडलाइन है. मान लीजिए, किसी ने दो सेमेस्टर की परीक्षाएं दीं और वह किसी कारण से आगे नहीं पढ़ पाया. पहले उसे ऐसी स्थिति में कोई डिग्री नहीं मिलती थी. अब ऐसे छात्रों को दो सेमेस्टर का क्रेडिट मिलेगा और उस आधार पर वह अपने भविष्य की राह तलाश सकेगा. यह व्यवस्था फिलहाल पटना विवि में लागू है. सभी विवि में चार साल का सीबीसीएस लागू करना है.यूजीसी ने भी इसे लागू करने को कहा है. इंजीनियरिंग जैसी तकनीकी शिक्षा में भी इसे लागू किया जायेगा.
साधारण तौर पर नियुक्तियां सरकार कर रही है. कुलाधिपति होने के नाते मेरा रोल इसमें बहुत ही कम है. मैंने सरकार को कहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया जल्द पूरी हो. इसके लिए प्रयास शुरू है. शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी कहा है. लगातार बातें हो रही है. दूसरी बात यह कि छात्र-शिक्षक के अनुपात में भी बड़ा गैप है. छात्र-शिक्षक अनुपात में शिक्षकों की नियुक्ति होगी, मेरा ऐसा प्रयास है. गेस्ट फैकल्टी से आठ से दस सालों से काम लिया जा रहा है. भाई, गेस्ट तो दो-चार महीने ही ठीक होते हैं. सालों गेस्ट रहें तो यह ठीक बात नहीं.
हां, यह सही है. एडहॉक वर्किंग (तदर्थवाद की कार्यशैली) ज्यादा समय तक नहीं चल सकता. शिक्षकों की नियुक्ति, प्राचार्चों की नियुक्ति स्थायी तौर पर हो, जो नहीं हो पा रहा. मुझे भारी हैरानी हुई कि एक ऐसा भी विवि है, जिसके 26 काॅलेजों में सिर्फ तीन में ही स्थायी प्राचार्य हैं, बाकी में प्रभार वाले हैं. यह बहुत ही घातक है. इसे बदलने की जरूरत है. यह देख-सुनकर मुझे अजीब लगा. ऐसी हालत में आप छात्रों को बेहतर भविष्य कैसे दे सकेंगे? हमारा काम उच्च शिक्षा की व्यवस्था को ठीक करना है, तो मुझे करना ही होगा. दूसरा कोई रास्ता नहीं है. मैं यहां केवल बैठक करने और कुछ फाइलें करने के लिए नहीं हूं.
मैंने कोई अनोखा काम नहीं किया. यह नियम ही है कि सीनेट की बैठक में कुलाधिपति शामिल हों. यदि किसी कारणवश खुद शामिल नहीं रहे तो अपने प्रतिनिधि भेजें. हुआ यह कि लोगों ने अपवाद को ही नियम बना डाला. मैं सभी विवि की सीनेट की बैठक में जाऊंगा. अब तक चार विवि में गया हूं. एक अभिभावक होने के नाते बैठक में जाता हूं, तो शिक्षकों व कर्मचारियों की बातों को सुनता भी हूं. ऐसा करने से उनमें विश्वास जगता है. कुलाधिपति जाते हैं तो पूरे विवि का माहौल बदल जाता है.
इसका अध्ययन कर रहा हूं. किस कारण चुनाव नहीं हुए, इसे देखा जा रहा है. अलग-अलग विवि के अलग-अलग कारण हैं. चुनाव होना चाहिए. दैट इज ए डेमोक्रेटिक सबजेक्ट. (यह कैंपस के लोकतंत्रीकरण का विषय है.
राज्य सरकार ने अभी तक काेई इंटरफेयर (हस्तक्षेप) नहीं किया है. मुख्यमंत्री ने भी कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आप बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. उच्च शिक्षा को पटरी पर लाने के लिए मैं अकेला नहीं हूं. राजभवन और सरकार दोनों मिल कर काम करेंगे और कर रहे हैं. राज्य सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश जी मेरे प्रयासों के प्रति सकारात्मक हैं और हर प्रकार से सपोर्ट करने के प्रति संवेदनशील भी हैं.
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हमारी कोशिश है कि हर चीज में पारदर्शिता हो. जब नियुक्तियां नियमित होंगी, तो पारदर्शिता खुद-ब-खुद आ जायेगी. दिक्कत तब होती है, जब आप निरंतरता में चीजों को नहीं करते हैं. अब नियुक्तियों को ही लें. अगर ये नियुक्तियां समयबद्ध तरीके से होतीं, तो इतने तरह के पेच भी नहीं फंसते. इतने तरह के सवाल नहीं उठते. जब सभी परीक्षाएं-नियुक्तियां नियमित होने लगे तो सिस्टम में पारदर्शिता आ जाती है.
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By Prabhat Khabar News Desk
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