वाल्मीकिनगर में बरना पर्व पर 48 घंटे का ‘ग्रीन लॉकडाउन’, प्रकृति संरक्षण के लिए थमी गांव की रफ्तार

Updated:
विज्ञापन

प्रकृति की पूजा करता थारू समाज

वाल्मीकिनगर में थारू समाज ने प्रकृति संरक्षण के लिए 48 घंटे का 'ग्रीन लॉकडाउन' लागू किया है. बरना पर्व के दौरान गांव की सभी गतिविधियां थम गई हैं, जिसमें खेतों में हल चलाना और बाहरी लोगों का प्रवेश शामिल है. यह परंपरा सामुदायिक अनुशासन और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एक अद्भुत उदाहरण है.

विज्ञापन

Valmikinagar News: संतपुर-सोहरिया पंचायत में थारू समाज ने पारंपरिक बरना पर्व के तहत 48 घंटे का ‘ग्रीन लॉकडाउन’ लागू किया है. इस दौरान गांव की रोजमर्रा की गतिविधियां पूरी तरह रोक दी गई हैं. न खेतों में हल चल रहा है, न मजदूरी हो रही है और न ही अनावश्यक आवाजाही. बाहरी लोगों के प्रवेश पर भी रोक है. ग्रामीण घरों में रहकर प्रकृति को दो दिनों का ‘आराम’ दे रहे हैं.

आपके शहर में

विज्ञापन

प्रकृति के लिए 48 घंटे थम गई गांव की रफ्तार

थारू समाज की मान्यता है कि मानसून के दौरान धरती पर हरियाली का नवसृजन होता है. नई वनस्पतियों, घास और पौधों को नुकसान से बचाने के लिए बरना पर्व के दौरान ग्रामीण खुद को घरों तक सीमित रखते हैं.

इस अवधि में पेड़ की पत्ती, घास या तिनका तोड़ना भी वर्जित है. सामुदायिक नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने का भी प्रावधान है.

वनदेवी और ‘बरखाना’ की पूजा से हुई शुरुआत

बरना पर्व की शुरुआत गांव के ब्रह्मस्थान पर वनदेवी की पूजा-अर्चना से हुई. इसके बाद पीपल के पेड़ यानी ‘बरखाना’ की विशेष पूजा की गई.

गुरु या सोखा ने मंत्रोच्चार किया, जबकि महिलाओं ने भोग अर्पित कर परिवार और समुदाय की सुख-समृद्धि की कामना की. संतपुर निवासी किसान केदारनाथ काजी ने बताया कि भंडारी द्वारा बरना लगने की घोषणा के साथ ही गांव की सभी गतिविधियां बंद कर दी गई हैं.

गांव की सीमा पर आठ डेंगवाहक दे रहे पहरा

बरना पर्व के दौरान ग्रामीण पहले से ही भोजन और मवेशियों के चारे की व्यवस्था कर लेते हैं. गांव की चारों दिशाओं और चारों कोनों की निगरानी के लिए आठ डेंगवाहक तैनात किए गए हैं.

डेंगवाहक हाथों में लाठी लेकर गांव की सीमाओं पर पहरा दे रहे हैं. मान्यता के अनुसार अभिमंत्रित अक्षत से गांव की सीमा बांधी गई है. नियम तोड़कर पत्ता या वनस्पति तोड़ने पर 500 रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है.

48 घंटे बाद लौटेगी सामान्य दिनचर्या

बरना की अवधि पूरी होने के बाद पीपल के पेड़ की दोबारा पूजा की जाएगी. इसके बाद खर-पतवार हटाकर गांव में सामान्य गतिविधियां शुरू होंगी.

पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के साथ पर्व का समापन किया जाएगा. थारू समाज की यह परंपरा प्रकृति संरक्षण के साथ सामुदायिक अनुशासन और जिम्मेदारी की मिसाल भी पेश करती है.

यह भी पढ़ें: बाढ़ में बदहाल मुसहर टोली, गंडक से लकड़ी छानकर चूल्हा जलाने को मजबूर हैं परिवार

विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन