Janmashtami: यहां जन्माष्टमी के अगले दिन हनुमान मंदिर पर चढ़ता है ध्वज, अनोखी परंपरा के पीछे वजह क्या?

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Janmashtami 2026: बिहार के दरभंगा जिले के मकरमपुर गांव में हनुमान मंदिर की करीब 200 साल पुरानी अनोखी परंपरा है. यहां रामनवमी के बजाय जन्माष्टमी के अगले दिन हजारों ध्वजाएं चढ़ाई जाती हैं.

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Janmashtami 2026: आमतौर पर बजरंगबली के मंदिरों में ध्वजा चढ़ाने की परंपरा रामनवमी और हनुमान जयंती जैसे अवसरों पर देखी जाती है. लेकिन बिहार के दरभंगा जिले के बेनीपुर प्रखंड स्थित मकरमपुर गांव में तस्वीर कुछ अलग है.यहां महावीर स्थान मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन, यानी भाद्र कृष्ण पक्ष नवमी को सामूहिक रूप से ध्वजा चढ़ाने की परंपरा है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह परंपरा करीब दो सौ साल पुरानी बताई जाती है. जहां हर साल हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर यहां ध्वजा चढ़ाने पहुंचते हैं.

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नेपाल से भी आते है श्रद्धालु

  • मकरमपुर में आज ध्वजारोहण का आयोजन बड़े धार्मिक उत्सव का रूप ले चुका है.
  • स्थानीय लोग बताते हैं कि कभी यहां सिर्फ एक ध्वजा चढ़ाई गई थी, लेकिन समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और अब हर साल करीब 8 से 10 हजार ध्वजाएं अर्पित किए जाते है.
  • मिथिलांचल के अलग-अलग हिस्सों के अलावा नेपाल से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात स्थानीय लोग बताते हैं.
  • इस दौरान मंदिर परिसर और आसपास का इलाका लाल और भगवा ध्वजाओं से भर जाता है. कई भक्त मनोकामना पूरी होने के बाद बजरंगबली को ध्वजा चढ़ाने यहां आते हैं.

जन्माष्टमी पर ही क्यों चढ़ती है ध्वजा?

इस परंपरा की शुरुआत को लेकर स्थानीय स्तर पर एक से ज्यादा कथाएं प्रचलित हैं.

  • स्थानीय मान्यता के मुताबिक, काफी समय पहले गांव में हैजा जैसी बीमारी फैल गई थी. उस दौरान मंदिर के पुजारी को स्वप्न में बजरंगबली से ध्वजा चढ़ाने का संकेत मिला.
  • जिसके बाद ग्रामीणों ने पूजा के साथ ध्वजा अर्पित की और इसके बाद यह परंपरा आगे बढ़ती चली गई.
  • वहीं, दूसरे मान्यता इसे जमीन से जुड़े पुराने विवाद में ग्रामीणों की जीत से जोड़ती है.
  • बताया जाता है कि जीत की खुशी में महावीर मंदिर में ध्वजा चढ़ाई गई और बाद में यही धार्मिक परंपरा बन गई.
  • हालांकि, इन दोनों घटनाओं की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं होती, इसलिए इन्हें स्थानीय मान्यता के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

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ध्वजा चढ़ाने की है खास विधि

  • यहां ध्वजा चढ़ाने की प्रक्रिया भी खास है, श्रद्धालु एक विशेष किस्म का बांस लेकर आते हैं, जिसे ‘चाभ’ कहा जाता है.
  • बांस को साफ करने के बाद उस पर सिंदूर और पिठार लगाया जाता है. पिठार भीगे हुए चावल से तैयार किया गया लेप होता है.
  • इसके बाद बांस पर जनेऊ बांधा जाता है और लाल ध्वजा लगाई जाती है.फिर ध्वजा की पूजा की जाती है. ध्वजा पूजा के बाद श्रद्धालु इसे मंदिर परिसर में बजरंगबली को अर्पित करते हैं.
  • ध्वजा चढ़ाने के साथ चूड़ा-दही, चीनी, केला, लड्डू, पेड़ा और दूसरी मिठाइयों का भोग भी लगाया जाता है. पूजा विधि में ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराया जाता है.

मकरमपुर का महावीर मंदिर सिर्फ एक गांव की धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है. वर्षों से चली आ रही ध्वजा अर्पित करने की परंपरा ने इसे इलाके के प्रमुख आस्था केंद्रों में जगह दिलाई है. जन्माष्टमी के अगले दिन हजारों ध्वजाओं का एक साथ अर्पित होना इस मंदिर को बाकी मंदिरों से अलग पहचान देता है.

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