‘चारों युग परताप तुम्हारा है प्रसिद्ध जगत उजियारा’

By Prabhat Khabar Digital Desk
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सुरेश चंद्र पोद्दार
अंजनी सुत हनुमान चारों युगों (सत्, त्रेता, द्वापर व कलि) में व्याप्त माता जानकी के वरदान स्वरूप हनुमान अजर-अमर हैं. भगवान राम जब साकेत धाम प्रस्थान करने लगे तब हनुमान से कहा- वत्स तुम दिव्य स्वरूप में पृथ्वी पर वास करो- धर्म की रक्षा करते हुए जन-जन के कष्टों का निवारण करो.
यूं तो भारतवर्ष का शायद ही कोई शहर अथवा गांव हो जहां हनुमान जी का मंदिर विद्यमान न हो, पर राजस्थान के चुरू जिले में सालासर ग्राम में अवस्थित हनुमान (बालाजी) के मंदिर की स्थापना एवं कीर्ति जगत प्रसिद्ध एवं अद्भुत है. देश-विदेश में इस धाम की ख्याति के कारण ही बजरंबली का नाम सालासर हनुमान या सालासर बालाजी हुआ. यह जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर सीकर से लगभग 57 किमी व सूजानगढ़ से लगभग 24 किमी दूर स्थित है.
विक्रम संवत् 1811 को हुई थी स्थापना : इस मंदिर के संस्थापक रुल्याणी ग्राम (सालासर से 16 मील दूर) निवासी वचनसिद्ध हनुमान भक्त महात्मा श्री मोहनदास जी थे. प्रकांतर में मोहनदास जी अपनी विधवा बहन कानीबाई एवं भांजे उदयराम जी के साथ सालासर में निवास करने लगे.
एक समय इस ग्राम पर दुश्मन की फौज ने चढ़ाई कर दी, तब ग्राम के ठाकुर सालिम सिंह व्याकुल हो गये. मोहनदास जी ने कहा- एक तीर पर नीली झंडी लगा कर फौज की ओर छोड़ दो. ठाकुर के वैसा करने पर चमत्कार हुआ और फौज लौट गयी. ठाकुर सालिम सिंह ने वहां हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित कर मंदिर बनाने की प्रतिज्ञा की. लाडनूं और जसवंतगढ़ के बीच स्थित असोटा ग्राम (ठाकुर सालिम सिंह के पुत्र का ससुराल) से प्रतिमा मांगने का निर्णय हुआ. उसी समय असोटा ग्राम में एक किसान का हल जमीन में रुक गया. जब भूमि खोद कर देखा गया तो बालाजी की मनमोहक प्रतिमा मिली.
प्रतिमा की विशेषता थी उस पर हाथ फेरने से देखने में वह मूर्ति सपाट लगती. बालाजी की यह प्रतिमा अत्यंत प्रभावशाली व दाढ़ी-मूंछ से सुशोभित थी. यह घटना श्रावण शुक्ला 9 शनिवार विक्रम संवत् 1811 की है. ग्राम के ठाकुर को प्रेरणा हुई कि प्रतिमा को सालासर पहुंचायें. बैलगाड़ी पर प्रतिमा रख कर भजन-कीर्तन करते हुए जब लोग सालासर पहुंचे, तो वहां ठाकुर सालिम सिंह व मोहनदास जी सहित गांव के लोगों में उल्लास छा गया.
भक्त मोहनदास जी ने कहा- ‘इस गाड़ी के बैलों को छोड़ दो. जहां रुक जाये, वहीं प्रतिमा स्थापित करेंगे’. बैल चल पड़े और एक तिकोने टीले पर जा कर रुक गये. इस टीले पर श्रावण शुक्ला 10 रविवार विक्रम संवत् 1811 को बालाजी की प्रतिमा स्थापित की गयी. प्रतिमा स्थापना के साथ ही यहां गांव बस गया. पूर्व में यह गांव नये तालाब से उतना ही पश्चिम में था, जितना अब पूर्व में है. चूंकि इस नये गांव को ठाकुर सालिम सिंह जी ने बसाया, इसलिए इसका नाम सालमसर, बाद में अपभ्रंश होकर 'सालासर' पड़ा. मोहनदास जी का उपनाम ‘बावलिया स्वामी’ भी था.
यहां संत मोहनदास जी की रचना ‘मोहनदास वाणी’ हमेशा गूंजती रहती है -
हणमत थारे हरख पछें आये मंगलवार।
ऊंचा म्हाने राखज्यो अंजनी राजकुँमार।।
माया मोहनदास नैं दई बंकडै बीर।
मंगल जीमो मेदनी दही चूरमा खीर।।
सालासर हनुमान जी को प्रिय है 'खीर-चूरमा'
सालासर हनुमान जी को खीर-चूरमा का प्रसाद अत्यंत प्रिय है. मंदिर के चौक में जालका वृक्ष है, जिसमें लोग मनोकामना सिद्धि के लिए नारियल बांधते हैं. यहां प्रतिदिन सैकड़ों भक्त दर्शन लाभ के लिए आते हैं, लेकिन भाद्रपद, आश्विन, चैत्र व कार्तिक पूर्णिमाओं को विशाल मेले लगते हैं, जिनमें देश-विदेश से लाखों भक्त सालासर हनुमान जी की कृपा दृष्टि पाने के लिए आते हैं. भक्तों के प्रवास के लिए यहां सैकड़ों सर्व सुविधा युक्त धर्मशालाएं हैं.
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