प्रिय सोम,सुबह कौवों के कलरव से शुरू हुई. कोई सुबह, दोपहर, शाम और रात ऐसी नहीं गुजरती, जब एंबुलेंस की आवाज न सुनाई दे. जैसे ही एंबुलेंस की आवाज कान तक पहुंचती है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं. ब्रह्ममुहूर्त और अजान की आवाज के बीच मैं तिरुवनंतपुरम के हाईवे पर हर आती-जाती गाड़ी को रोक रही थी. बारिश हो रही थी और मेरे सात महीने का गर्भ हिल-डुल रहा था. सब मुझे पागल समझ रहे थे. मगर एक बड़ी गाड़ी मुझे देखकर रुक गई. मैं आगे-आगे और वह गाड़ी धीमे-धीमे मेरे पीछे-पीछे चलती हुई कावुलेन तक आई, मगर भीतर घुस न सकी. मैं छह फीट लंबे-चौड़े व्यक्ति को अपने कंधे पर लादकर उस लेन के मुहाने पर खड़ी कार तक नहीं ला पाई. हारकर कार चली गई. मैंने एंबुलेंस को सौ फोन लगाए और जब एंबुलेंस आई, तो मैं खुली रह गई स्लेटी आंखों को देखती रह गई. मैं चार साल के बच्चे को घर पर अकेला छोड़कर एंबुलेंस में बैठ गई और भूल गई कि मैं किसी की मां हूं और किसी की मां होने वाली हूं. मेरा देह आज भी गीला है और मेरे कलेजे की हूक से मेरा शरीर आज भी झंकृत है.भोर के साथ ही क्रोटन के विशाल पेड़ के पास सफेद तितलियां आ जाती हैं. ग्यारह से एक बजे के बीच पीली तितलियां और तीन बजे तक भूरी तितलियां आ जाती हैं. दो सफेद बिल्लियां भी घर के दो-चार चक्कर लगा जाती हैं. रोटी पकने की खुशबू दो जोड़े कौवों को रसोई की खिड़की के पास पंक्तिबद्ध खड़ा कर देती है. आंगन के आम पर टकाचोर, हॉर्नबिल, बगुले और गिलहरियों का आना-जाना दिन भर लगा रहता है.रमणी रोज आकर मंदिर का आंगन और सड़क बुहार जाती है. पिछली बारिश में आता चल बसीं और उनके चंदन और खस-खस वाले दो दर्जन साबुन आज तक अलमारी में पड़े हैं.अम्मा अब भी हर रात एक गिलास ओट पीकर सो जाती हैं और अप्पम के साथ आलू की तीखी सब्जी ही बनाती हैं.शंखुमुखम के तट पर लहरें वैसे ही उन्मुक्त होकर उछलती हैं और पुराने इंडियन कॉफी हाउस के पास तक आ जाती हैं. कंटेम्पररी आर्ट म्यूजियम बंद पड़ा है और इंडोर गेम के अहाते पर्यटकों के शोर से हिलते-डुलते रहते हैं. जलपरी अब भी लेटी है, मगर उसके सामने सेना का एक हेलिकॉप्टर लगा दिया गया है.सड़क किनारे अब मोमोज की दुकानें लगने लगी हैं और शंखुमुखम देवी का मंदिर पहले से अधिक भव्य हो गया है. कन्नदुड़ा और वेट्टुकार्ड का चर्च भी पहले से अधिक सुंदर और विस्तृत हो गया है. मेरा मन कन्नदुड़ा के कब्रगाह के पास आज भी ठहर जाता है और आज भी फीफा वर्ल्ड कप में तिरुवनंतपुरम के बच्चे ब्राजील और अर्जेंटीना की टीमों के लिए उसी तरह पागल हैं.सब कुछ ठीक चल रहा है. मीटर चाय, फिल्टर कॉफी और रसम-वड़ा और तुम आज भी मुझे अच्छे लगते हो. बाकी की चीजें उपलब्ध हैं और मैं उन्हें मोल सकती हूं. प्रेम अनुपलब्ध, अमोल चीज की तरह जिंदगी में शामिल हो चुका है.मैं सिमटती जा रही हूं. सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप सब बंद किए साल से ऊपर हो गए. अखबार और किताबों के अलावा घूमना-फिरना जारी है. जॉर्ज की पेंटिंग की प्रदर्शनी में गई थी, मैथ्यू जैस्पर ने बहुत अच्छी कविताएं सुनाईं और सड़क के किनारे बनी म्यूरल पेंटिंग के पास खड़ी होकर बस की प्रतीक्षा अब भी सुख है.अब जो घर के कामों में मदद करने आती है, वह एक कम्युनिस्ट मज़दूर नेता की बेटी है. उसने प्रेम-विवाह किया है. वह मेरी छींक से सिरदर्द तक का इलाज जानती है और स्वयं को सुगमा डॉक्टर कहती है. कच्ची हल्दी, अदरक, अजवायन और लहसुन खाने को कहती है और बताती रहती है कि आलू का पराठा बिना घी के क्यों बनाना चाहिए?वह मन्नारशाला नागराज मंदिर की महिला पुजारी की कहानियां सुनाती है. सुगमा चेची की आंखें खराब हैं. उसके पास चश्मा है, मगर वह लगाती नहीं है. चश्मा लगाने को कहो तो कहती है—मैं बूढ़ी थोड़े ही हूं.यूनिवर्सिटी गई थी और लेक्चर के बाद बड़ी देर तक मित्रों से बात करती रही. वे गालिब, मीर, खुसरो और फैज को जिस तरह से कहते हैं, वह सुनकर लगता है तुम्हारे पास पहुंच गई हूं, तुम्हारी छाती के बिल्कुल करीब, और फिर अचानक से उठकर चलने लगती हूं. सब एक साथ कहते हैं—बातचीत के बीच से अचानक कोई उठकर इस तरह जाता है?मैं उन्हें बता नहीं पाती.प्रेम भी मेरे जीवन से ऐसे ही उठकर चला गया और मैं कुछ नहीं कर सकी.सरकारी स्कूल में अब भी दूध और अंडे बड़ी ईमानदारी से बच्चों को दिए जाते हैं. सेंट्रल लाइब्रेरी में आज भी बच्चों का आना-जाना बिल्कुल पहले की तरह ही है.नोक्कू कुली अब परेशान नहीं करते. जब मन करे, फर्नीचर खरीद लो और घर बदल लो. कोई धमकाकर लोडिंग-अनलोडिंग के पैसे नहीं मांगता है.हाईवे फोरलेन हो गई है. हजारों पेड़ काट दिए गए हैं. आकुलम के नए ब्रिज के उस पार लुलु मॉल खुल चुका है और पहाड़ों को काटकर फ्लैट बना दिए गए हैं.आज भी रेस्तरां में वही रौनक और जायका जिंदा है. झींगा, केकड़ा, मजेदार मछली और बिरयानी उतने ही मन से पकाई और खिलाई जाती है. आज भी कडला पायसम की गंध से मेरा रोम-रोम खिल उठता है.बेटियां विदेश में बस गई हैं और घर किताबों से भर गया है.काली कॉफी और तुम्हारी तलब आज तक जिंदा है.बारिश रोशनी की तरह बरसती है और पानी पीकर माटी धीरे-धीरे रंभाती है. बत्तखों के झुंड-सी एक के बाद एक आ जाती हैं तुम्हारी यादें और मेरी उंगलियां थिरक उठती हैं कुछ लिखने के लिए.रात की बारिश ने नाव के पेट में पानी, नदी के गर्भ में फुहार और मेरे मन में तुम्हारी मछली तैरा दी है.मेरे गले में कांटा और मेरे हृदय में तुम्हारी आंखें धँसी हुई हैं, सांस में पम्पा महक रही है. पम्पा नदी के तट पर मैं छाती तक नदी में डूबी हुई हूं. बुलबुल, जावाकुसुम और पीली चिड़िया के टो-टो के बीच, बांस की हरी कविता के बीच, मैं तुम्हारे हृदय के लिए साहस और अपने हृदय के लिए राहत मांग रही हूं.तुमने एक दिन कहा था: कोई एक मौज है, जो तुमसे शुरू होती है…तुमने एक दिन कहा था: खुद से ज्यादा तुम्हारा हूँ….तुमने एक दिन कहा था: मैं कहां कहीं जा रहा हूँ….तुम कितनी दूर चले गए. क्या तुम्हारी नाभि अब भी मेरी आंखों के जल से लबालब है या वे सूख गई हैं? जो सूख गईं, तो दूसरी बार सूखी है तुम्हारी नाभि.मैं केवड़े के फूल को सहला रही हूं, प्रेम के दिव्य तार पर आनंद टंगा है.तुम्हारी फुसफुसाहटों की नन्ही-नन्ही पोटलियों को बुद्धि ने अभी-अभी खोला है.यह मेरे हिस्से का सुंदरतम ध्वनिकोश है,मैं बज रही हूं.ओस के जुगनूओं से पर निकल आएं हैं,दिन नील और कलफ लगी शर्ट-सा चमक उठा है.विरह प्रेम से टपका सुख है. यह विष्णु क्षेत्र का पम्पा तट है. प्रातः की अक्षुण्ण वेला और चिड़ियों के कलरव में मैंने तुम्हारी हथेलियों को नावों की तरह तैरा दिया है. तुम तट से लग रहे हो, मैं मझधार में सिसक रही हूं. आगे धार होगी, छाती से ऊपर पानी, नाभि तक तुम्हारा नाम, मृत्यु तक तुम्हारा चेहरा फैल जाएगा. तुम 'न' और 'हां' के बीच जलता हुआ जल, डूब गया मन और ठहरा हुआ समय रह जाओगे.नदी के उस पार ही कठचंदन का जंगल, कदली-फल, तेंग वृक्ष और तुम्हारी छाया है. नदी के उस पार ही वह आकाश है, जिसमें चांद से चमकीले तुम्हारे कान और उन्हें घेरकर टिमटिमाते मेरे शब्द हैं.नाम भी दुःख है… और कोई किसी का नहीं… फिर ‘तुम्हारी’ ‘आपकी’ लिखना कितना व्यर्थ…अर्थहीन और हिंसक है…