आधुनिक जीवनशैली किस तरह इंसान को रोबोट बना रही है पढ़ें कथाकार कमल की कहानी ‘प्यार के दो-चार पल’

By Prabhat Khabar Digital Desk
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आधुनिक जीवनशैली में किस तरह अधिक पैसों की चाह में इंसान रोबोट बनता जा रहा है और उसकी खुशी इस भंवर में उलझ सी गयी है. इंसान इतना मशीनी हो गया है कि उसे प्रेम के लिए भी वक्त नहीं मिलता, जिसके कारण वह दिमागी रूप से परेशान रहता है. ऐसे ही एक पति-पत्नी की जद्दोहद की कहानी है ‘प्यार के दो-चार पल’. पढ़ें कथाकार कमल की यह कहानी

कथाकार कमल का जन्म : 1964, शिक्षा : एमएससी (वनस्पतिशास्त्र). सृजन : उपन्यास : आखर चैरासी (नवंबर 1984 की सिख विरोधी हिंसा पर आधारित), उपन्यास का पंजाबी अनुवाद प्रकाशित. कहानी संग्रह : उस पार की आवाज़ें, प्यार के दो चार पल.
हिंदी समय, प्रतिलिपि, स्टोरी मिरर आदि वेबसाइट पर कहानियां प्रकाशित. कहानियां, नाटक व व्यंग्य लेख हंस, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य, वर्तमान साहित्य, वागर्थ, कथन, कथादेश, शब्दवर आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.आकाशवाणी व दूरदर्शन के रांची तथा जमशेदपुर केंद्रों से कहानियां व नाटक प्रसारित.कहानियों के अनुवाद मराठी, गुजराती, तेलुगू, पंजाबी, बांग्ला, अंग्रेजी आदि भाषाओं में.वर्ष 2015 में एक माह के लिए स्वीट्जरलैण्ड के अंतरराष्ट्रीय लेखक आवास में फ्रेंच, अमेरिकन, अर्जेंटीनियन और न्यूजीलेंड के लेखकों के साथ आमंत्रित.
पुरस्कार
प्रोजेक्ट आक्सीजन नामक कहानी को वर्ष 2007 में कमलेश्वर द्वारा स्थापित प्रेमचंद: वर्तमान साहित्य कहानी का प्रथम पुरस्कार.
संप्रति : प्रांतीय सेवा में.
संपर्कः- डी- 1/1 मेघदूत अपार्टमेंट्स, मैरीन ड्राईव रोड, पो.- कदमा, जमशेदपुर-831005 (झारखंड).
दूरभाष- 8709766471 , 0657-2310149
e-mail- kamal8tata@gmail.com



आधुनिक जीवनशैली किस तरह इंसान को रोबोट बना रही है पढ़ें कथाकार कमल की कहानी ‘प्यार के दो-चार पल’
कहानी
प्यार के दो-चार पल
- कमल
चांदनी रात के जादुर्इ और मोहक वातावरण में अनुभव बड़ी देर से उस सुंदर, सुनहरी हिरणी के पीछे पूरी ताकत से दौड़ा जा रहा था. हिरणी की कमर, जांघ, सीना, गर्दन पूरा का पूरा जिस्म ही सांचे में ढला हुआ था. त्वचा चिकनी और चुंधियाती चमकदार थी. लगातार दौड़ते रहने के कारण वह पसीने से सराबोर हो चुका था. जोरों से धड़क रहे दिल और तेजी से फूल पिचक रहे फेफड़ों से निकलने वाली सांस नथुनों से, भाप की तरह निकल रही थी. बुरी तरह थकान से चूर होने के बावजूद वह उस सुंदर और कामुक हिरणी का पीछा छोड़ने को कतर्इ तैयार न था. उस सुंदरता के मोहपाश में फंसा वह, मुक्त अर्थव्यवस्था में नित नयी ऊंचाइयां छूने वाले शेयर मार्केट की तेजी और कर्इ जगहों पर भूख से हो रही इंसानी-मौतें वाली कंट्रास्ट भरी दुनिया से अनजान, बदहवास भागा जा रहा था. वह किसी भी कीमत पर उस मस्त-मस्त हिरणी को हासिल कर लेना चाहता था, चाहे इसके लिए उसे ब्रहमांड के दूसरे छोर तक ही क्यों न दौड़ना पड़े. धीरे-धीरे कम होते फासले से उनके बीच की दूरी केवल छलांग भर ही रह गयी थी. अनुभव ने अपने शरीर को चीते की तरह सिकोड़ा. नजरें हिरणी की खूबसूरत कमर पर जमायीं और जोरदार झपट्टा मारा. लेकिन हिरणी उससे कहीं ज्यादा तेज निकली, उसे पुन: चकमा दे, दांयी ओर छिटक गयी और झपट्टा मारने के उस प्रयास में वह पलट कर खाट से नीचे जा गिरा.
एकाएक ही सपने का तिलिस्म उसकी आंखों से ओझल हो गया. बाहर की तेज धूप से अंदर कमरे में आने के बाद आंखों को देर तक चुंधियाती रोशनी की तरह, हिरणी का उत्तेजक बदन उसके रोम-रोम पर छाया हुआ था. सपना भले ही टूट गया हो परंतु कामुक उत्तेजना से अभी भी उसका शरीर बुरी तरह तप रहा था.
उन दिनों, जाड़े के अंतिम पड़ाव और गर्मी-प्रारंभ के बीच, वसंत ऋतु अपने पूरे यौवन पर थी. रातों में रजार्इ लेने पर गर्मी और पंखा तेज करने पर ठंड लगती थी. अपनी आंखें पूरी तरह खोल, उसने छत पर धीरे-धीरे घूम रहे पंखे को देखा. फिर उठ कर पानी पिया, पंखे की स्पीड बढ़ार्इ और बिस्तर पर आ लेटा. चार-छ: महीने तो नयी नौकरी और नयी जगह पर सेट होने की गतिविधियों में ही गुजर गये. लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनी की उत्सुकता का उफान उसके साथ ज़रा जल्द ही खत्म होने लगा था. पंखे की हवा ने बाहर की गर्मी तो कुछ कम कर दी, लेकिन शरीर की भीतरी गर्मी से उसका बदन अभी भी तप रहा था. उसने बांयी तरफ देखा, बगल वाली दूसरी खाट पर पत्नी से चिपक कर छोटा बेटा सोया हुआ था. दोनों खाटों के बीच चार-छ: इंच की जगह थी. दिन में दोनों फोल्डिंग खाटें आंगन में निकाल कर जापानी स्टाइल से कमरे को बैठक बना लिया जाता है.
पिछले सप्ताह नाइट शिफ्ट होने के कारण उसकी रातें खान की अंधेरी गहराइयों में बीती थीं. नाइट शिफ्ट न भी होती तो क्या कोर्इ खास फर्क पड़ सकता था ? दो छोटे-छोटे कमरों, एक बरामदे और छोटे से आंगन वाले कंपनी क्वार्टर के साथ एक बड़ी-सी बगान तो है, लेकिन...
दूसरे कमरे में सामान और लिखने-पढ़ने की टेबल के बाद बमुश्किल बड़ी बेटी का पलंग लग पाता है. अगल-बगल बने दो कमरों वाले घर के सामने बगान में पत्नी ने अपनी मेहनत से, फूलों की क्यारियों के बीच, हरी मखमली घास वाला एक लॉन भी सहेज रखा है. भीतर की तरफ दोनों कमरों के सामने दस बार्इ पांच के बरामदे में एक तरफ रसोर्इ तो दूसरी तरफ अलग-अलग लैट्रिन-बाथरूम बने हुए हैं. दोनों के बीच वाली जगह को डाइनिंग स्पेस की तरह प्रयोग किया जाता है. अब इस तरह ठूसमठूस बने घर में प्रेम के लिए स्पेस कहां बचता है ? उसका बदन अभी भी कमर के आस-पास बुरी तरह तप रहा था. मन नहीं माना तो उसने हाथ बढ़ा कर मानवी के बदन को सहलाना शुरू कर दिया. एक दो बार इधर-उधर हिलने के बाद उसने कुनमुना कर आंखें खोलीं. उनींदी आंखों और नाइट बल्ब की नीली रोशनी में उसे वह हिरणी-सी सुंदर लग रही थी.
'ऊं! क्या हुआ ?'
'बड़ी सुंदर लग रही हो.'
'ऊं...हुं... सोने दो ना.' मानवी ने उसे टालते हुए कहा और करवट बदल, अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया. वह अपना बदन सहलाते उसके हाथों का अर्थ बखूबी समझ रही थी. कुछ देर उसने पत्नी के वापस पलटने की प्रतीक्षा की. परंतु उसके न पलटने पर उसने सोचा शायद मानवी को जोरों की नींद आ रही है. अपने मन को समझाते हुए उसने भी आंखें बंद कर सोने का प्रयत्न किया, परंतु असफल रहा. नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी. ज्यों ही वह आंखें बंद करता वही सांचे में ढली सुंदर, सुनहरी और कामुक हिरणी उसकी आंखों में आकार लेने लगती. उसका बदन ठंडा होने की बजाय और भी गर्म होने लगा. रोकते-रोकते भी हाथ पुन: पत्नी के बदन पर चला गया. कुछ देर बाद, इस बार मानवी ने धीरे से करवट बदली. अब उसका हाथ अनुभव के हाथों पर था. मुलायम और कांपता हुआ मानवी का नर्म हाथ, अनुभव के हाथों से बह कर आती बदन की गर्मी पा कर, धीरे-धीरे गर्म होने लगा था.
'क्या बात है, शैतानी क्यों सूझ रही है ?' मानवी की फुसफुसाहट उसके कानों में पड़ी. अनुभव ने कोर्इ उत्तर नहीं दिया, अपना काम पूर्ववत जारी रखा. कुछ दिनों से उसे अपने पैतृक शहर वाली पिछली नौकरी काफी याद आ रही थी. जब नये निर्णयों के परिणामस्वरूप नयी कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं तभी पूर्व की स्थितियों के असल महत्व का पता चलता है. तब तो और भी ज्यादा जब कृत्रिम रंगीनियों एवं चकाचौंध के कारण लिए गये नये निर्णय बाद में वीभत्स नजर आने लगते हैं. परन्तु उन दिनों तो दोनों को बहुराष्ट्रीय कंपनी की बड़ी-सी तनख्वाह और तमाम तरह की घोषित-अघोषित सुविधाएं नजर आ रही थीं. इन कंपनियों के अपने पत्ते इतनी चालाकी से फेंटे रहते हैं कि खुलते-खुलते बड़ी देर हो जाती है... और समझते-समझते तो उससे भी ज्यादा देर. अघोषित तो अघोषित थीं ही, घोषित सुविधाएं भी कर्इ-कर्इ परदों के पीछे से झांकती रहतीं. कुछ वैसे ही जैसे बाज़ार की सबसे बड़ी दुकान पर पचास प्रतिशत की छूट का विज्ञापन देख कर विंडो शॉपिंग करने वाले आप यह सोच उसमें घुस जायें कि कम से कम आज तो महंगी दुकान से सस्ती चीज खरीदने का परम आनंद प्राप्त कर लें. मगर घुसने के बाद पता चले कि छूट पचास प्रतिशत की नहीं एक से पचास प्रतिशत तक की है और इसके अंतर्गत आप जिस चीज को लेना चाह रहे हैं, उस पर कुल छूट केवल दस प्रतिशत है. तब आपके ठिसुवा कर दुकान से बाहर निकल जाने अथवा इज्जत बचाने के लिए वही महंगी चीज़ लेने के अलावा दूसरा कोर्इ रास्ता नहीं बचता. क्योंकि तब तक उस लुभावने विज्ञापन का सच आपको छल चुका होता है.
ठीक-ठाक पिछली नौकरी छोड़ कर जब से उस बहुराष्ट्रीय कंपनी की खान में ज्यादा वेतन वाली अपनी नयी नौकरी पर वह आया है, उसने तीव्रता से महसूस किया है कि प्रेम करने का एकांत उन्हें पहले के दिनों जैसा नहीं मिल पाता. यहां वेतन बड़ा था लेकिन मकान छोटा. उसने बड़े वेतन वाली नौकरी लपकने में बड़ी तीव्रता की थी. इस भय से कि विलंब हो जाने पर कोर्इ दूसरा न लपक ले. बड़ी नौकरी, बहुराष्ट्रीय कंपनी, कर्इ देशों में फैली ब्रांचेज. क्या पता कब फौरन ट्रिप लग जाये ? इस दौड़ में वह किसी भी कारण पिछड़ना नहीं चाहता था. सच तो यह है कि बड़े वेतन के एक ही झटके ने उसे अपनी जगह से उखाड़ कर दूर-दराज की उस बियावान जगह पर ला पटका था. पहले वाली जगह पर वेतन भले ही कम था, मगर प्रेम के लिए काफी जगह थी. अब नयी जगह पर बहुत सारी सुविधाएं हैं, मगर इससे क्या होता है? बियावान में बड़ा महल मिलने से अच्छा तो अपने शहर का छोटा-सा मकान होता है. जीवन की और सब चीजों की तरह प्रेम भी तो अपनी जगह पर आवश्यक हैं न ! वह गुनगुनाने लगा, "सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं, प्यार के दो-चार पल...'
उसकी उत्तेजक हरकतों से तब तक मानवी भी एक सुनहरे हिरण का पीछा करने के लिए तैयार हो चुकी थी. 'यहां नहीं, मुन्ना जग जायेगा. बरामदे में चलते हैं.' उसने प्रस्ताव किया, 'मगर ध्यान से, आहट बिल्कुल न हो, बिट्टी उठ जाएगी.' अनुभव की संक्रमित गर्मी अब मानवी के स्वर में भी दिखने लगी थी.
पत्नी की बात उसे जंची. दोनों ने सावधानी से प्रयत्न किया और बेआवाज कमरे से बाहर निकल आये. मकान में भीतर की तरफ दोनों कमरों के दरवाजे बरामदे में अगल-बगल खुलते हैं. बरामदे की पांच फुट चौड़ार्इ के बाद सामने वाली दीवार के बीच में बना दरवाजा खुले आंगन में खुलता है. इस प्रकार लगभग दस बार्इ पांच का बरामदा भी एक कमरे की तरह प्रयोग में आ जाता है. एक कोने में बड़ा ट्रंक और फ्रिज रखने के बाद भी इतनी जगह है, जिसमें दो जने चटार्इ बिछा कर आसानी से लेट सकें. चटार्इ बिछते ही अपनी मंजिल तक पहुंचने के अहसास ने दोनों के भीतर गुलाबी-गुलाबी, नशीली उमंग का संचार किया.
रात की खामोशी में अब दोनों को अपने-अपने मृगों की तलाश थी. लेकिन न जाने क्यों उनकी सुनहरी यात्रा का टेक-आफ ही नहीं हो पा रहा था. मानवी के कदम बार-बार किसी कंटीले झाड़ में उलझ जाते. 'क्या बात है ? ' अनुभव की उलझन ने पूछा.
'बिट्टी जग गर्इ तो, हम सीधे उसके सामने पड़ेंगे!' उसकी गर्म सांसों पर आशंका की नमी भारी पड़ रही थी.
'...तो फिर ? '
'यहां नहीं, रसोर्इ में चलते हैं.' मानवी बोली.
वह चौंका, भोजन बनाने वाली रसोर्इ का वैसा अनूठा उपयोग! उसने चुटकी ली, 'ऐसे मामलों में तुम स्त्रियों का दिमाग काफी तेज चलता है! '
'प्रशंसा कर रहे हो या व्यंग्य ? ' मानवी ने उसके स्वर को पकड़ते हुए कहा.
'...देखा, मेरी बात की स्वत: पुष्टि हो गर्इ न.'
' वो इसलिए कि जहां तुम पुरुषों का ध्यान केवल प्राप्ति की ओर रहता है. हमारा प्राप्ति और समाप्ति दोनों ओर यानी प्राप्ति के पूर्व की आशंकाओं और पश्चात के परिणामों, दोनों ओर रहता है.'
फुसफुसाते हुए दम साधे चौकन्ने कदमों से दोनों उठे. तृप्त होने की इच्छा ने चार बार्इ छह की रसोर्इ में उनका रसोर्इ-प्रवेश कराया. वहां सामने और बांयी तरफ वाली दीवार के साथ आटा-चावल, मसालों आदि के कनस्तर तथा सब्जी वाली टोकरी से डेढ़-दो फीट की जगह छेंकी हुर्इ थी. अब बाकी बची जगह में किसी प्रकार अंटने की कोशिश कर उन्होंने दरवाजा भीतर से बंद किया. भौतिक वज्ञिान के नियमानुसार गर्मी पा कर वस्तुओं में प्रसार होता है. लेकिन सजीवों का देह विज्ञान इस नियम को नहीं मानता, देह गर्मी पा कर इसके ठीक उलट, सिकुड़ने लगती है. ...और दो देहें तो बिलकुल गुत्थम-गुत्था हो जाना चाहती हैं. सारी सीमाएं, वर्जनाएं तोड़ कर एक दूसरे में समा जाने को आतुर.
परंतु उस छोटे से रसोर्इघर में कितना भी सिकुड़-सिमट जाने के बावजूद उनकी सहज क्रियाओं के लिए जगह कम पड़ रही थी. कभी किसी का सिर कनस्तर से जा टकराता तो कभी पैर दरवाजे से. फलत: वैसी टकराहटें सुनहरे मृगों के पीछे उनकी सतरंगी दौड़ को बार-बार बाधित कर रही थीं.
'आह ! क्या मुसीबत है? ' अनुभव के स्वर में झुंझलाहट थी.
' क्या हुआ? ' मानवी ने उसकी तपती देह पर अपनी नर्म हथेली फेरी.
'मेरा घुटना दीवार से टकरा गया, दर्द हो रहा है.'
'अरे...रे ' मानवी ने उसका घुटना सहलाने का उपक्रम किया.
'कभी-कभी लगता है, पिछली नौकरी को छोड़ इस नयी को चुनने का निर्णय सही नहीं था. उस नौकरी में नजर आने वाली सुख-सुविधाएं भले ही कम थीं, लेकिन नजर न आने वाली कर्इ सुविधाएं साथ में जुड़ी हुर्इ थीं. वहां हम मां-पापा के साथ, अपने विशाल पैतृक आवास में रहते थे. तुम्हारा मायका भी बस इतनी दूर कि एक फोन काल पर तैयार हो, आधे घंटे में पहुंचा जा सके. ...कुछ भी हो. अपना गांव हो या शहर, आखिर होता अपना है. अनुभव को आज कुछ ज्यादा ही पश्चाताप हो रहा था, 'ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनी और बस दो ही कमरों का घर बनाने की क्या घासलेटी कांसेप्ट है! क्या वे चाहते हैं कि हम केवल उनका काम करें, खायें और सो जाएं ?

क्या वे हमें रोबोट बना देना चाहते हैं ? क्या कंपनी ने जान-बूझ कर घरों को छोटा बनाया है ? यहां किचेन, लैट्रिन, बाथरूम सब हैं. लेकिन नहीं है तो बस काम के लिए भयमुक्त मिलन का अलग कमरा. मेरा मानना है, हर घर में सबसे पहला कमरा वही होना चाहिए. निर्बाध और उन्मुक्त मिलन का, तृप्तिदायक 'पहला कमरा!'
पत्नी कुछ कहती उससे पहले ही बगल वाले बिट्टी के कमरे में आहट उभरी. फिर उसका दरवाजा खुला.
'श्...श...' मानवी ने उसके मुंह पर हाथ रखा.
दोनों के कान खड़े हो गये. कमरे से आहट बरामदे में आयी. उफ... थोड़ी देर पूर्व वे वहीं लेटे थे, अगर उठ कर रसोर्इ में न आ गये होते तो! इस ख्याल से ही दोनों के हाथ-पांव सुन्न हो गये. वे दोनों दम साधे पड़े रहे. बरामदे में फ्रिज खुलने के बाद बोतल निकलने की आवाज आयी. कहीं बिट्टी ग्लास लेने रसोर्इ में तो नहीं आयेगी ? तब वे क्या कहेंगे ? उनकी उत्तेजना पर मानों ढेर सारी बर्फबारी हो गर्इ थी. उनके शरीर की सारी गर्मी छू-मंतर हो गर्इ. लेकिन बिट्टी ने अच्छे बच्चे की तरह बोतल से ही पानी पी लिया. फ्रिज बंद हुआ. फिर बाथरूम का दरवाजा भी खुला और बंद हुआ. उसके बाद जल्द ही बिट्टी के कमरे वाली आहट वापस अपने कमरे में लौट गर्इ. कुछ देर आहट लेने के बाद उन दोनों ने राहत की सांस ली.
'बाल-बाल बचे.' अनुभव बोला.
'हां, लेकिन अब मुझे यहां सेफ नहीं लग रहा.' मानवी ने निर्णय सुनाया.
'क्यों अब क्या हुआ ?'
'नहीं-नहीं, यहां नहीं होगा.'
'तुम आज इतनी पेसिमस्टि (निराशावादी) क्यों हो रही हो ? केवल टालने की बातें कर रही हो.' वह बुरी तरह झुंझलाया.
'...और तुम इतना ज्यादा ओवर कानिफडेंट (अति-विश्वासी) क्यों बन रहे हो ? ज़रा-सी देर हो गर्इ तो कुछ बिगड़ नहीं जाएगा. सब्र करो सब कुछ फुल प्रूफ होना चाहिए.'
'तब ?' उसने पूछा, वह आश्वस्त हुआ कि मानवी भी स्वर्ण मृग का पीछा छोड़ने वाली नहीं है.
'यहां नहीं आंगन में चलते हैं.' मानवी ने सुझाया.
वे दोनों उठ खड़े हुए. लेकिन आंगन में पहुंच कर भी उनकी बात नहीं बनी और तब उन्हें सलाह-मशविरे के बाद बाहर बगान में लान का रुख करना पड़ा. और इस बार वे दोनों अपने निर्णय से प्रसन्न थे. वहां पहुंचते ही उन्हें लगा, मानों सारा जहां मिल गया हो. मंद-मंद चलती हवा, आस-पास बिखरी फूलों की महक, चांदनी रात में ऊपर आसमान पर छिटके ढेरों तारे. उन्हें पहली बार अफसोस हुआ कि अब तक वे घर के भीतर क्यों थे? बगान को घेरे खड़ी ऊंची हेज कटिंग उनके चारों तरफ एक सुरक्षित दीवार बना रही थी. ऊपर रात का तारों भरा टिमटिमाता आकाश मजबूत छत का आभास दे रहा था.
'कितना अच्छा लग रहा है. है न !' मानवी हर्षित थी.
उसने पत्नी का हाथ सहलाते हुए कहा, 'मुझे तो पता ही नहीं था, हमारे घर का 'पहला कमरा' घर के ठीक बाहर और इतना खूबसूरत है.'
'कोर्इ आ तो नहीं जाएगा ? इसकी दीवारें छोटी हैं और छत भी खुली हुर्इ.' इस बार मानवी की शंकालू आवाज में मदहोशी पूर्णत: घुली हुर्इ थी.
अनुभव को उसकी आवाज गज़ल सी लगी-
'...हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है,.... मेरे घर का दरवाजा कोर्इ नहीं है...
'जिंदगी... मेरे घर आना... आना जिंदगी...जिंदगी...'
उसने मानवी को बांहों में भर कर चूम लिया, 'नहीं, इतनी रात को यहां कोर्इ नहीं आयेगा.'
अचानक मानवी को कुछ याद आया, 'एक मिनट ठहरना, प्लीज.'
वैसे टोके जाने पर बादलों में गुम होने को तैयार अनुभव को वह प्लीज पांवों में बबूल के कांटे सा चुभा, 'क्यों, अब क्या हुआ ? सब कुछ तो ठीक है.'
'बस एक मिनट. चटार्इ भीतर रह गर्इ.'
'अब रहने दो चटार्इ-वटार्इ.'
'ह...ह...ह...वटार्इ नहीं चटार्इ !' उसे छेड़ती हंसी बिखेरती, मानवी तेजी से आंगन में घुस गर्इ.
अनुभव के जी में आया, एक झटके से मानवी को नीचे गिरा ले. अब इतना सब्र उसमें बिल्कुल न बचा था कि हिरणी का दूर से मात्र पीछा करता रहे. वह उसे किसी शेर की तरह झपट लेना चाहता था, झिंझोड़ना चाहता था, तृप्त होना चाहता था. लेकिन चटार्इ की जरूरत समझ में आते ही अनुभव के होठों पर मुस्कान फैल गर्इ.
इस बार उसको ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. जल्द ही मानवी ने लौट कर चटार्इ बिछा दी. अब दोनों निश्चिंत थे. कर्इ-कर्इ बाधाओं को पार कर, वे दोनों अंततर्‍ अपने 'पहले कमरे' तक आ पहुंचे थे. उनकी वह 'पहले कमरे' की खोज जहां समाप्त हो रही थी, ठीक वहीं से उनके स्वर्ण मृगों की खोज प्रारंभ होने वाली थी. अपने-अपने मृगों को तलाशने के लिए दोनों तैयार थे. अब दोनों में से कोर्इ भी अपने स्वर्ण मृग को यूं ही जाने देने वाला न था. एक दूसरे से सट कर उनके बदन तपने लगे. बाहर खुले में स्थित वह 'पहला कमरा' उनकी रगों में कुछ ज्यादा ही आग झोंक रहा था. कुछ ही पलों में उन दोनों के अपने-अपने मृग रगों की राह मुंदी पलकों में दौड़ रहे थे, जो एक पल दिखते तो अगले ही पल ओझल हो जाते. मृगों को झपट लेने की उनकी बहु-प्रतीक्षित दौड़ प्रारंभ हो चुकी थी.
उनकी आंख-मिचौली और भाग-दौड़ बस अपनी राह मुड़ने को ही थी, तभी मानों उनके लिए धरती फट पड़ी हो या धधकता ज्वालामुखी उबल पड़ा हो. भीतर से धड़ाम की जोरदार आवाज आयी. जिसके तुरंत पीछे एक चीख के साथ, बेटे के रोने की आवाज खिड़की से बाहर उन तक पहुंचने लगी. अपने-अपने मृगों के पीछे तेजी से दौड़ते, वे दोनों मानों अचानक खुरदुरे पत्थर से ठोकर खा कंटीली झाडि़यों में मुंह के बल औंधे जा गिरे. सारा कुछ एकाएक फ्रीज हो गया. एक ही पल में 'पहले कमरे' का समूचा तिलिस्म टूट कर माला के मनकों-सा चारों ओर बिखरा और ' ब्लैक होल' के अनंत अंधेरों में खो गया. मानवी मछली की तरह फिसल कर नीचे से निकली और बिजली की गति से भीतर की ओर झपटी. मुन्ना खाट से गिर कर रो रहा था. उसे गोद में उठा चूमते हुए, वह चुप कराने लगी. खैर है कि शोर से बिट्टी नहीं जगी थी. उसे अपने पास पा कर मुन्ने की रुलार्इ तो थम गर्इ, लेकिन उसका सुबकना रुकने का नाम नहीं ले रहा था.
बाहर हरे, मखमली लान वाले अपने पहले कमरे में अनुभव काफी देर झुंझलाहट भरी प्रतीक्षा करने के बाद उठ कर भीतर आया. भीतर की स्थिति देख वह चुपचाप पानी पी, अपनी खाट पर जा बैठा.
'बस जरा-सा ठहरो, मुन्ना अभी सो जाएगा.' मानवी की आवाज में अजीब-सा मनुहार था. अनुभव को यूं बैठे देख अपनी सुनहरी दौड़ अधूरी रह जाने की आशंका से उसकी आवाज कांप रही थी.
वह भी मुन्ने का सुबकना रुकने की प्रतीक्षा में बैठ गया. कुछ देर और लगी मुन्ना पूरी तरह सो चुका था. दोनों एक बार फिर से अपने पहले कमरे में जाने के लिए उठ खड़े हुए.
'देखो, इस बार कोर्इ गड़बड़ न करना.' अनुभव का शिकायती स्वर मानो अब तक की हर बात के लिए पत्नी को ही जिम्मेवार ठहरा रहा था.
'अच्छा...अच्छा, अब जल्दी भी करो, यहीं बातें बनाते रहोगे क्या?' मानवी ने उसे बाहर ढकेलते हुए कहा.वे दोनों फिर से लान में आ पहुंचे. लेकिन तब तक लान पहले वाला न रहा था. कर्इ तरह की खूबसूरत रंग-बिरंगी चिडि़यों ने चहचहाना शुरू कर दिया था, भोर के उगते सूरज की लालिमा रात के अंधेरे पर छिटकने लगी थी, तारे भी आसमान में छुपने लगे थे. धीरे-धीरे 'पहले कमरे' की छत अपना अस्तित्व खो रही थी. और तो और हरी चहारदीवारी की तरह उन्हें ढंके, खड़ी हेज कटिंग भी अब साफ नजर आने लगी थी. वे दोनों समझ गये, अब कितना भी प्रयास क्यों न कर लें, आज उन्हें स्वर्ण मृग नहीं दिखेंगे. दोनों ने अतृप्त आंखों से एक दूसरे को देखा.
'सुबह कितनी खूबसूरत है न !' मानवी मुस्कराते हुए बोली.
'हां, बिल्कुल तुम्हारी तरह !' अनुभव के होंठों पर भी मुस्कान थी.
'चाय पीओगे न ! मानवी ने हंसते हुए कहा, बेटर लक एट नाइट (आज रात अच्छे भाग्य की शुभकामनाएं ).'
'हां चाय बना लो. बट नो... आर्इ डोन्ट थिंक आफ बेटर लक टु-नाइट एट आल, नाऊ वेट फार ए होल वीक (आज की रात तो अच्छा भाग्य हो ही नहीं सकता, अब सप्ताह भर प्रतीक्षा करो). आज से मेरी नाइट शिफ्ट चलेगी.'
कोर्इ बात नहीं, अगली बार के लिए गुड लक. मानवी की शोखी उसके होंठों पर अठखेलियां कर रही थी.
अचानक ही अनुभव संजीदा हो गया, 'एक बात पूछूं ? हमारे जीवन की ये बनावटी चीजें इतनी जादुर्इ और आकर्षक क्यों लगती हैं कि हम इनके लिए हर तरह की पराधीनता स्वीकार कर लेते हैं ? आगे चल कर वही पराधीनता हमारे सहज, स्वाभाविक जीवन पर ही भारी पड़ने लगती है! इतनी अधिक भारी कि हम अपनी जड़ों से भी उखाड़ जाते हैं. क्या हम सारी चीजों से सचमुच अनजान होते हैं ?' कहते-कहते उसकी आंखें गीली हो गर्इ थीं. गीली आंखों वाला अनुभव उस वक्त रात वाली हिरणी के बारे में बिलकुल नहीं सोच रहा था.
मानवी ने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा, 'अच्छा एक बात बताओ, यदि इस कंपनी को ज्वाइन करने के समय तक, तुम्हें अतीत में लौटने का अवसर मिले तो क्या तुम दुबारा इसे ज्वाइन करना चाहोगे ?'
'नहीं ! बिल्कुल नहीं !' बिना एक पल की देर किये उसने दृढ़ता से उत्तर दिया.
तभी कंपनी-फोन की घंटी घनघनार्इ.
'सर, सात नंबर फेज में एक्सीडेंट हो गया है.'
'ठीक है मैं दस मिनट में आता हूं.' अनुभव का उत्तर सधा हुआ था, मानो कोर्इ रोबोट बोल रहा हो.
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