भारत और चीन के रिश्तों में करीब छह साल बाद फिर से गर्माहट दिखाई दे रही है. 7 साल बाद BRICS समिट में हिस्सा लेने भारत पहुंचे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम मोदी की द्विपक्षीय बैठक हुई. दोनों नेताओं के बीच यह द्विपक्षीय बैठक करीब 50 मिनट चली.चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दोनों देशों के बीच मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए. पीएम मोदी ने सीमा पर शांति, कारोबार बढ़ाने और लोगों के बीच संपर्क मजबूत करने पर भी जोर देने की बात कही.हालांकि दोनों नेताओं की मुलाकात से अलग, भारत-चीन के बीच मौजूदा हालात को लेकर अभी भी कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं. जिसमें सबसे ज्यादा इस बात की चर्चा हो रही कि क्या BRICS समिट के बाद भारत-चीन रिश्ते पूरी तरह सामान्य हो जाएंगे? 7 साल बाद जिनपिंग के दिल्ली दौरे से भारत को क्या फायदा होने वाला है.सीमा पर तनाव घटा, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के रिश्ते सबसे मुश्किल दौर में पहुंच गए थे. इसके बाद दोनों देशों ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर लगातार बातचीत की.अक्टूबर 2024 में कजान में मोदी और जिनपिंग की मुलाकात के बाद सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और तनाव कम हुआ.अब दोनों नेता रिश्तों को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं. मोदी ने साफ कहा है कि सीमावर्ती इलाकों में शांति और स्थिरता द्विपक्षीय रिश्तों के विकास की बुनियादी शर्त है, यानी भारत के लिए सीमा का मुद्दा अभी भी सबसे ऊपर है.ये भी पढ़ें: BRICS Summit : मोदी से मुलाकात के बाद डिनर से कहां गायब हो गए शी जिनपिंग? सामने आई वजहराष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की मुख्य वजह क्या है?जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच सीमा मुद्दे पर बातचीत हुई थी.अगस्त 2026 में हुई इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा विवाद के समाधान की दिशा में बातचीत आगे बढ़ाने सहित आठ बिंदुओं पर सहमति बनाई. इसमें दो नए सैन्य हॉटलाइन चैनल, दो अतिरिक्त सैन्य बैठक केंद्र और सीमा प्रबंधन को बेहतर बनाने जैसे फैसले शामिल हैं.दोनों देशों ने सीमा विवाद पर बातचीत के अगले दौर को भी आगे बढ़ाने पर सहमति जताई. यानी मोदी-जिनपिंग की बैठक में बातचीत शून्य से शुरू नहीं हुई. कई मुद्दों पर पहले ही चर्चा की जा चुकी थी.यानी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अधिकारिक तौर पर जरूर BRICS समिट में हिस्सा लेने भारत पहुंचे हैं, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों को लेकर पीएम मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी महत्वपूर्ण कारक है.सीमा विवाद को खत्म करने के साथ-साथ कारोबार पर भी फोकससीमा के साथ-साथ व्यापार भी दोनों देशों के रिश्तों का अहम हिस्सा है. चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना हुआ है और दोनों देशों के बीच कारोबार का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है. 2025-26 में भारत ने चीन से करीब 132 अरब डॉलर का सामान आयात किया.समस्या यह है कि भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बहुत बड़ा है. इसलिए बातचीत में सिर्फ कारोबार बढ़ाने की बात नहीं हो रही, बल्कि व्यापार असंतुलन, सप्लाई चेन और भारतीय कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे पर भी चर्चा की जा रही है.दोनों देशों के रिश्तों में सिर्फ सरकार और सेना ही नहीं, आम लोगों का संपर्क भी महत्वपूर्ण है. सीधी उड़ानों, वीजा सुविधा और कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसे मुद्दों पर धीरे-धीरे प्रगति हुई है. दोनों पक्ष अब कारोबारी रिश्तों और लोगों के बीच आवाजाही को और बढ़ाने की बात कर रहे हैं.क्या BRICS समिट के बाद भारत-चीन रिश्ते सामान्य हो जाएंगे?अभी इसे स्ट्रैटेजिक रीसेट कहना जल्दबाजी होगी. हां, दोनों देशों ने तनाव कम करने और संवाद बढ़ाने की दिशा में कदम जरूर बढ़ाए हैं. लेकिन सीमा विवाद का स्थायी समाधान अभी बाकी है. व्यापार असंतुलन भी बड़ी चुनौती है और दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.इसे और आसान भाषा में समझने के लिए देखिए इन्फोग्राफिकसीधी बात यह है कि भारत और चीन फिलहाल दोस्ती की नई शुरुआत से ज्यादा रिश्तों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. बातचीत बढ़ रही है, लेकिन असली परीक्षा इस बात की होगी कि सीमा, व्यापार और भरोसे जैसे मुश्किल मुद्दों पर जमीन पर कितना बदलाव आता है.दुनिया की बदलती परिस्थिति दे रही भारत-चीन को करीब आने का मौका ?भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की कोशिश को सिर्फ सीमा विवाद के नजरिए से देखना अधूरा होगा.इसके पीछे बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था भी एक बड़ी वजह है. अमेरिका की अनिश्चित व्यापार नीति, बढ़ते टैरिफ और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे युद्धों ने ग्लोबल साउथ के देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं. ऐसे समय में एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग बढ़ाना दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है.इसका असर जमीन पर भी दिख रहा है. दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुई हैं और करीब छह साल बाद नाथू ला के रास्ते सीमा व्यापार भी बहाल हुआ है. भारत ने चीन जैसे भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले विदेशी निवेश को लेकर नियमों में भी कुछ ढील दी है. ये कदम बताते हैं कि दोनों देश धीरे-धीरे आर्थिक रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं.हालांकि, यहां भारत के सामने एक बड़ी चुनौती भी है. चीन भारत के कुल आयात का करीब 19 फीसदी हिस्सा पूरा करता है. इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर उपकरण और बैटरी जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियां चीनी सामान और तकनीक पर काफी निर्भर हैं.यही वजह है कि भारतीय एमएसएमई के लिए चीन एक साथ मौका और चुनौती, दोनों है. सस्ती मशीनरी, तकनीक और कच्चे माल से उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन चीनी कंपनियों से घरेलू और विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है.इसलिए भारत की प्राथमिकता सिर्फ चीन से ज्यादा सामान खरीदना या बेचना नहीं, बल्कि अपनी कंपनियों को वैश्विक सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है। ब्रिक्स जैसे मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.ये भी पढ़ें: औपचारिक नहीं है मोदी-जिनपिंग की मुलाकात...BRICS और भारत-चीन रिश्तों को लेकर चीनी मीडिया में क्या छप रहा?