कैलिफोर्निया के ऑकलैंड शहर की संघीय अदालत में 18 अगस्त को फेसबुक-इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा के विरुद्ध एक मुकदमा शुरू हुआ, जिसमें यह जांचा जा रहा है कि सोशल मीडिया का किशोरों और बच्चों की मानसिक सेहत पर वास्तव में कैसा असर पड़ता है. इस लड़ाई की शुरुआत नवंबर, 2021 की एक राष्ट्रव्यापी जांच से हुई, जिसे कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल ने शुरू करवाया. अक्तूबर, 2023 में 33 राज्यों के अटॉर्नी जनरल के गठबंधन ने मेटा के विरुद्ध उत्तरी कैलिफोर्निया की संघीय अदालत में मुकदमा दायर किया. उसका आरोप यह था कि मेटा ने जानबूझकर ऐसी विशेषताएं डिजाइन की, जो बच्चों को लत की हद तक जोड़े रखती हैं. अक्तूबर, 2024 में अदालत ने मेटा की खारिज याचिका भी नकार दी. अभी चल रही सुनवाई में 29 राज्यों में से चार, कैलिफोर्निया, कोलोराडो, कैंटकी और न्यूजर्सी, अपना पक्ष रख रहे हैं, बाकी 25 राज्यों के मामले बाद में सुने जायेंगे. इन राज्यों का तर्क है कि मेटा ने उत्पादों को इस तरह डिजाइन किया कि वे उपयोगकर्ताओं को जकड़ें, उन्हें देर तक रोकें, डाटा इकट्ठा करें और यह सच लोगों से छिपाएं. मेटा पर संघीय बाल निजता कानून 'कोप्पा' के उल्लंघन का भी आरोप है, जो 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के डाटा संग्रह को नियंत्रित करता है. मेटा के वकीलों का कहना है कि कंपनी सुरक्षा के लिए लगातार प्रयासरत रही है. यह मुकदमा अमेरिकी अदालत में चल रहा है, लेकिन इस पर भारत सहित सभी प्रमुख देशों की नजर है.भारत में डिजिटल मंच अब बच्चों की शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं. सवाल यह नहीं कि भारत में ऐसा मुकदमा होगा या नहीं, बल्कि यह कि हमारा कानूनी और संवैधानिक ढांचा इन खतरों से हिफाजत के लिये कितना तैयार है? और क्या हम डिजिटल मंचों के प्रभावी उपयोग के लिए अपने बच्चों को तैयार कर रहे हैं? इस बहस की संवैधानिक नींव केएस पुत्तस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में मिलती है, जिसमें नौ जजों की पीठ ने निजता को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना और गरिमा-स्वायत्तता से जोड़ा. डिजिटल युग में यह सिद्धांत और व्यापक हो जाता है-बच्चे की हर ऑनलाइन गतिविधि उसके व्यक्तित्व के संकेत छोड़ती है, जिनका विश्लेषण कर एल्गोरिदम अगली सामग्री परोसता है. दूसरा प्रासंगिक मामला इन रे प्रज्वला का है. हैदराबाद की एनजीओ प्रज्वला के 2015 के पत्र पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दर्ज की, जिसमें बाल यौन शोषण सामग्री का ऑनलाइन प्रसार रोकने की मांग की गयी थी. गूगल, फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पक्षकार बनीं, विशेषज्ञ समिति गठित हुई और इसी प्रक्रिया से 2021 में आइटी कानून बने, जिसने सोशल मीडिया मंचों की जवाबदेही की नयी रूपरेखा तय की. भारत में बच्चों से जुड़े डिजिटल अधिकारों की रक्षा के लिए अब कानूनों की एक शृंखला मौजूद है. पॉक्सो एक्ट, 2012 ऑनलाइन यौन शोषण और बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार को दंडनीय अपराध मानता है. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67बी इलेक्ट्रॉनिक रूप में बच्चों से जुड़ी यौन सामग्री के प्रकाशन-प्रसारण को अपराध घोषित करती है. बाल न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 संस्थागत रूपरेखा देता है, जबकि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीआरसी) डिजिटल शिकायतों की निगरानी करता है. सबसे ताजा कदम है डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और नवंबर, 2025 में अधिसूचित डीपीडीपी रूल्स. इसकी धारा नौ और नियम 10 के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति का डाटा प्रोसेस करने से पहले अभिभावक की सत्यापन योग्य सहमति अनिवार्य है. नियम यह भी स्पष्ट करते हैं कि डाटा फिड्यूशरी बच्चों की व्यवहारगत निगरानी, प्रोफाइलिंग या लक्षित विज्ञापन नहीं दिखा सकते. पर इसकी सीमा यह है कि यह ढांचा मुख्यतः सहमति पर केंद्रित है. ऑकलैंड की सुनवाई यही रेखांकित करती है कि सारी सहमतियां मिलने के बाद भी अगर एल्गोरिदम बच्चे को लगातार वैयक्तिकृत सामग्री दिखाकर चिपकाये रखे, तो केवल सहमति की वैधता पर्याप्त नहीं. भारतीय कानून को डाटा संग्रह से आगे बढ़कर एल्गोरिदम डिजाइन और उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों तक पहुंचना होगा, बिना यह भुलाये कि अनुच्छेद 19(1)(ए) के अभिव्यक्ति-संतुलन को भी बनाये रखना है. कानून चाहे कितना भी सख्त हो, वह हर स्क्रीन के पीछे मौजूद नहीं रह सकता. असली सुरक्षा तब शुरू होती है, जब बच्चे खुद डिजिटल दुनिया को समझने के लिए तैयार हों. इसके लिए स्कूली स्तर पर मीडिया साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना जरूरी है. दूसरा यह कि इसमें अभिभावकों की भूमिका निगरानी पर नहीं, संवाद पर आधारित हो. बच्चे क्या देखते हैं, किससे बात करते हैं, यह खुलकर पूछना किसी पैरेंटल कंट्रोल एप से ज्यादा असरदार है. डीपीडीपी नियमों के तहत मिलने वाले अधिकारों का इस्तेमाल भी अभिभावकों को सक्रिय रूप से सीखना होगा. तीसरा, पूर्ण प्रतिबंध के बजाय उम्र-अनुकूल और यथार्थवादी स्क्रीन टाइम सीमाएं तय करनी होंगी. भारतीय बाल रोग अकादमी और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुझाते रहे हैं कि सोने से पहले स्क्रीन से दूरी, भोजन के समय परहेज जैसी आदतें दीर्घकालिक असर डालती हैं. चौथा, चाइल्डलाइन 1098, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और स्कूल काउंसिलर जैसी शिकायत-सुविधाओं की जानकारी बच्चों तक पहुंचनी चाहिए. नागरिक समाज व अभिभावक संगठनों को भी उतनी ही सतर्कता बरतनी होगी, जितनी अमेरिका के अटॉर्नी जनरल ने बरती. कानून बनने के बाद उसका पालन हो रहा है या नहीं, यह पूछते रहना समाज की भी जिम्मेदारी है. बच्चों को तकनीक से पूरी तरह काट देना व्यावहारिक नहीं है. असली जरूरत उन्हें तकनीक का बेहतर उपयोग कर सुरक्षित रहने लायक बनाने की है. ऑकलैंड की सुनवाई भले अभी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है, पर इसने साफ कर दिया है कि बड़ी तकनीकी कंपनियों की सामाजिक और बच्चों के प्रति जवाबदेही अब टाली नहीं जा सकती. भारत के लिए यह आत्ममंथन की घड़ी है कि क्या हमारा कानून सहमति के कागजी दस्तावेजों तक सीमित रहेगा या उस एल्गोरिदम की गहराई तक जायेगा, जो रोज लाखों भारतीय बच्चों की अगली रील तय करता है? और क्या हम बच्चों को केवल तकनीक से बचायेंगे या उन्हें इतना सक्षम बनायेंगे कि वे खुद सही-गलत पहचान सकें. जवाब जितनी जल्दी मिलेगा, बचपन उतना ही सुरक्षित रहेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं)